MGR, जयललिता, विजय हुए हिट; पर कैसे फेल हुए गणेशन? अधूरी रह गई विजयकांत की क्रांति
परदे से निकलकर पॉलिटिक्स में छा जाना तमिलनाडु में नया नहीं है। वहां कलाकार अगर लोगों के दिलों में उतर जाए, तो लोग उन्हें सिर पर बिठाते हैं। थलापति विजय की हालिया जीत और ताजपोशी तमिलनाडु की इसी पुरानी परंपरा को दिखाती है।

दक्षिणी राज्य तमिलनाडु ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि वहां सिनेमा सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि सत्ता तक पहुंचने का सबसे बड़ा, असरदार और लोकप्रिय रास्ता है। 4 मई को जब विधानसभा चुनाव के नतीजे आए तब सबसे बड़े दल के रूप में उभरी नई नवेली पार्टी TVK और उसके संस्थापक अभिनेता से नेता बने थलापति विजय ने इस धारणा को न सिर्फ फिर से मजबूत किया बल्कि 10 मई को मुख्यमंत्री पद की शपथ लेकर इसे साकार कर दिया। हालांकि, थलापति विजय का सत्ता में आना कोई इकलौता चमत्कार नहीं है। उनके इस शीर्ष पद पर पहुंचने से पहले भी तमिलनाडु ने करीब छह दशकों तक अभिनेताओं को राजनीतिक प्रतीक बनते देखा है।
सिनेमा और राजनीति का गहरा नाता
दरअसल, तमिलनाडु में विजय का सत्ता तक पहुँचना केवल एक राजनीतिक परिवर्तन नहीं है, बल्कि तमिलनाडु की उस अनूठी और छह दशक पुरानी परंपरा का यह नया अध्याय है, जहाँ फिल्मी सितारे जन-नेताओं के रूप में उभरते हैं। तमिलनाडु में सिनेमा और राजनीति का जुड़ाव केवल सेलिब्रिटी पूजा तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि इसकी जड़ें विचारधारा में गहरी हैं। 1940 और 50 के दशक के दौरान, द्रविड़ आंदोलन ने सिनेमा की शक्ति को जन-एकत्रीकरण के माध्यम के रूप में पहचाना था। तब सी.एन. अन्नादुरई और एम. करुणानिधि जैसे पटकथा लेखकों ने सामाजिक न्याय, तर्कवाद और तमिल गौरव को फिल्मों के माध्यम से जनता तक पहुँचाया था।
MGR का करिश्माई चेहरा और नेतृत्व
विजय का उत्थान उन्हीं महान सितारों की याद दिलाता है जिन्होंने तमिल राजनीति की दिशा बदली है। इनमें सबसे बड़ा नाम एम.जी. रामचंद्रन का है, जिन्हें प्यार से (MGR) कहा जाता रहा है। एमजीआर ने अभिनेता-राजनेता के लिए एक ब्लूप्रिंट तैयार किया था। पर्दे पर 'दीन-दुखियों के मसीहा' की उनकी छवि ने उन्हें 1977 में मुख्यमंत्री बनाया, जहाँ उन्होंने अपनी कल्याणकारी नीतियों से राज्य की राजनीति को नया आकार दिया था।
हालाँकि, शुरुआत में वे DMK के स्टार प्रचारक थे, लेकिन MGR के करिश्मे की बदौलत पार्टी 1967 में भारी बहुमत से सत्ता में आई। हालाँकि, करुणानिधि के साथ मतभेदों के चलते उन्होंने 1972 में AIADMK की स्थापना की; 1977 में वे मुख्यमंत्री बने और 1987 में अपनी मृत्यु तक राज्य पर शासन किया। 'मक्कल थिलागम' (लोगों का रत्न) और 'पुरची थलाइवर' (क्रांतिकारी नेता) के नाम से मशहूर MGR ने लगातार तीन बार चुनाव जीता, और उनकी जन-कल्याणकारी राजनीति ने तमिलनाडु की राजनीतिक संस्कृति को एक नया रूप दिया।
MGR की विरासत को आगे बढ़ाने वालीं जयललिता
दिसंबर 1987 में जब MGR की मौत हुई तो कई लोगों को लगा कि AIADMK बिखर जाएगी लेकिन तब उनकी राजनीतिक विरासत को संभालने के लिए एक और अभिनेत्री सामने आई। वह अभिनेत्री थीं जे. जललिता, जिनका उदय MGR के मुकाबले कहीं ज़्यादा मुश्किल भरा था। उस समय वह तमिल सिनेमा की सबसे बड़ी स्टार थीं और MGR की सबसे मशहूर सह-कलाकार भी, फिर भी उन्होंने एक ऐसे राजनीतिक माहौल में कदम रखा जो पूरी तरह से पुरुष-प्रधानता में डूबा हुआ था। कड़े विरोध और पार्टी के भीतर ही बगावत का सामना करने के बावजूद, जयललिता ने न केवल राजनीति में खुद को एक बेहद मज़बूत राजनेता के तौर पर साबित किया; बल्कि एक ग्लैमरस अभिनेत्री से खुद को 'अम्मा' के रूप में अपना सबसे बड़ा रूपांतरण किया। उनके इस रूपांतरण ने तमिलनाडु की राजनीति में उन्हें एक माँ जैसी सबसे प्रमुख हस्ती बना दिया।
विजयकांत: अधूरी लेकिन असरदार क्रांति
अपनी हिट फिल्म 'कैप्टन प्रभाकरन' (1991) के बाद 'कैप्टन' के नाम से मशहूर विजयराज अलगारस्वामी भी उसी विरासत का हिस्सा हैं, जिन्होंने अभिनेता से नेता के रूप में अपना रूपांतरण किया। उन्होंने 2005 में 'देसिया मुरपोक्कु द्रविड़ कज़गम' (DMDK) के साथ राजनीति में कदम रखा और DMK-AIADMK के द्वंद्व के बीच एक मजबूत तीसरे विकल्प के रूप में उभरे। उनकी सत्ता-विरोधी अपील और 'बाहरी' वाली छवि ने उन मतदाताओं को जबरदस्त रूप से प्रभावित किया, जो DMK और AIADMK के दोहरे वर्चस्व वाली नीतियों से खुद को जोड़कर नहीं देख पाते थे। इसका असर ये हुआ कि 2006 के चुनाव में कैप्टन विजयकांत और उनकी पार्टी को वोटों का अच्छा-खासा हिस्सा मिला, और 2011 तक DMDK तमिलनाडु की मुख्य विपक्षी पार्टी बन गई। हालांकि, वे मुख्यमंत्री नहीं बन पाए, लेकिन विजयकांत का सत्ता तक पहुँचना इस बात का एक और सबूत था कि MGR के दशकों बाद भी, कोई अभिनेता तमिलनाडु की राजनीति में हलचल मचा सकता है।
कमल हासन, शिवाजी गणेशन का भी सफर अधूरा
हालांकि, शीर्ष पद तक नहीं पहुंचने वाले कैप्टन विजयकांत अकेले नहीं हैं। दिग्गज अभिनेता कमल हासन ने 2018 में अपनी पार्टी 'मक्कल निधि मय्यम' लॉन्च की, जबकि उदयनिधि स्टालिन ने एक फिल्म निर्माता/अभिनेता से उप मुख्यमंत्री तक का सफर सफलतापूर्वक तय किया। वहीं, दिग्गज अभिनेता शिवाजी गणेशन ने भी राजनीति में कदम रखा था, हालाँकि उन्हें जनता के बीच वैसी चुनावी सफलता कभी नहीं मिली जैसी MGR या जयललिता को मिली थी।
डिजिटल युग में विजय का स्टारडम और प्रभाव
अब वही पुरानी परंपरा डिजिटल युग में सुपुरस्टार विजय के साथ लौटी है। जब उन्होंने TVK पार्टी बनाई, तो उनका अभियान फिल्मों, सोशल मीडिया, मीम्स और एंटी-एस्टैब्लिशमेंट राजनीति का विस्फोटक मिश्रण बन गया। यानी थलापति विजय का मुख्यमंत्री बनना कोई अचानक हुआ चमत्कार नहीं है बल्तक उनकी फिल्में जैसे कथ्थी, मार्शल, सरकार और मास्टर लंबे समय से भ्रष्टाचार विरोधी, सामाजिक न्याय और राजनीतिक बदलाव के संदेश दे रही थीं, जिसने उनकी राजनीतिक छवि को बड़ी मजबूती प्रदान की।
इतना ही नहीं डिजिटल युग का सहारा लेकर विजय ने अपने Fan Clubs को कुशलतापूर्वक पार्टी कार्यकर्ताओं में बदल दिया, जिससे उन्हें जमीनी स्तर पर एक तैयार राजनीतिक मशीनरी मिल गई। अब विजय के शपथ ग्रहण के साथ ही तमिलनाडु में 'मास-हीरो' की राजनीति में फिर वापसी हुई है। सरकारी भवनों के बाहर प्रशंसकों द्वारा अपने नायक की ताजपोशी का जश्न मनाना एक बार फिर यह साबित करता है कि तमिलनाडु में सिनेमा केवल मनोरंजन नहीं है, बल्कि "सिनेमा ही राजनीति का दूसरा नाम है"।




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