चीन से दोस्ती बढ़ा रहा अमेरिका, ट्रंप-जिनपिंग की मुलाकात से भारत को खतरा? इनसाइड स्टोरी
डोनाल्ड ट्रंप और शी जिनपिंग के बीच 14 मई को बहुप्रतिक्षित बैठक होने वाली है। इस बैठक से पहले अमेरिका ने चीन की पांच तेल रिफाइनरियों पर प्रतिबंध लगा दिया है। चीन ने इसका जवाब देते हुए इन प्रतिबंधों को मानने से इनकार कर दिया है। इस बैठक का भारत पर क्या असर होगा? पढ़िए पूरी रिपोर्ट…

Donald Trump: अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के सत्ता में आने के बाद वैश्विक राजनीति में बड़े बदलाव देखने को मिले हैं। भारत के करीब होने वाला अमेरिका अब पाकिस्तान के साथ नजदीकी रिश्ता बनाए हुए है, तो नाटो के साथ उसकी लड़ाई सरेआम हो चुकी है। चीन के साथ उसकी तना तनी फिर भी जारी है। लेकिन अब इस मुद्दे को सुलझाने के लिए ट्रंप अगले तीन दिनों में दो दिवसीय शिखर सम्मेलन के लिए बीजिंग की यात्रा पर जाने वाले हैं। आगामी तीन दिन में होने वाली ट्रंप और जिनपिंग की मुलाकात में क्या निकलकर सामने आता है। इस पर भारत की गहरी नजर होगी। क्योंकि विशेषज्ञों की मानें तो अमेरिका और चीन के बीच चाहे दोस्ती हो या दुश्मनी... दोनों ही भारत के लिए परेशानी खड़ी करने वाली हैं।
दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के राष्ट्राध्यक्षों के बीच होने वाली इस मुलाकात के मुद्दों को निर्धारित करने के लिए अमेरिका ने अपनी चाल चल दी है। वाशिंगटन 2 मई को ईरानी तेल का उपयोग करने की वजह से चीन की 5 तेल रिफानरियों के ऊपर प्रतिबंध लगा दिया है। हालांकि चीन ने तुरंत ही इसका जवाब देते हुए रिफाइनरियों से इस प्रतिबंध को न मानने का आदेश दे दिया है। इस घटनाक्रम से दोनों देशों के बीच में टकराव की स्थिति पैदा हो गई है। ऐसी स्थिति में ट्रंप और जिनपिंग की मुलाकात पर दुनियाभर की नजर टिकी हुई है, क्योंकि इस मुलाकात का नतीजा कुछ भी हो सकता है।
भारत के लिए क्यों है खतरे की घंटी
अमेरिका और चीन के संबंध पिछले दो दशकों में तना तनी वाले ही रहे हैं। भारत की दृष्टि से देखें तो नई दिल्ली के लिए यही सबसे सही स्थिति है। पिछले दो दशकों में भारत की विदेश नीति ने अमेरिका और चीन की तना तनी से फायदा ही उठाता रहा है। चाहे वह क्वाड हो, अमेरिका के साथ टेक्नोलॉजी ट्रांसफर हो या फिर चीन को निशाना बनाकर बनाई गई चिप प्रणाली हो। चीन के सामने भारत हमेशा से ही अमेरिका की पहली प्राथमिकता रहा है। चीन को काउंटर करने की अमेरिकी नीति में भारत हमेशा से एक बड़ा खिलाड़ी बनकर उभरा है। लेकिन ट्रंप के आने के बाद स्थिति बदल गई है। ट्रंप ने पहले पाकिस्तान के साथ हाथ मिलाया और अब वह चीन के साथ नजदीकी बढ़ाने की कोशिश में हैं। नई दिल्ली के लिए यह बड़ी चिंता का विषय है। क्योंकि अगर ट्रंप और जिनपिंग की इस बैठक के दौरान अमेरिका और चीन दोस्ती पर पहुंचते हैं, तो भारत के लिए यह एक बड़ा खतरा होगा। क्योंकि फिर उसे पाकिस्तान, चीन और अमेरिका के त्रिगुट का सामना करना होगा। वहीं, दूसरी तरफ अगर इनकी यह बैठक दुश्मनी पर खत्म होती है, तब भी भारत को एक बेहद संकटपूर्ण स्थिति का सामना करते हुए पूरी तरह से किसी एक पक्ष को चुनना पड़ेगा। भारत को व्यापारिक और आर्थिक स्तर पर तमाम विकल्पों को भी देखना होगा।
भारत के खिलाफ खुलकर आया अमेरिका
पिछले दो दशकों से तुलना करें तो अमेरिका का रुख भारत के प्रति दोस्ताना ही रहा है। जॉर्ज बुश के बाद से बाइडन तक सभी अमेरिकी राष्ट्रपतियों ने भारत के साथ संबंधों को मजबूत करने की ही कोशिश की है। अपने पहले कार्यकाल के दौरान ट्रंप ने भी इसी कोशिश को दोहराया है। लेकिन दूसरे कार्यकाल के बाद स्थिति बदली है। हकीकत को देखें, तो वर्तमान स्थिति में भारत और अमेरिका के संबंध सबसे निचले दौर में हैं। भारतीय जनता के बीच में भी अमेरिका को लेकर अविश्वास की स्थिति है। ट्रंप प्रशासन का अप्रत्याशित रुख अगर वाशिंगटन को बीजिंग के करीब भी ले जाता है, तो इस पर भी किसी को आश्चर्य नहीं होगा। लेकिन भारत के लिए यह एक खतरे की घंटी होगा।
पाकिस्तान की मदद को चीन ने स्वीकारा
दूसरी तरफ अगर चीन और भारत के पिछले दो दशक के रिश्तों को देखें, तो बीजिंग ने नई दिल्ली को एलएसी और पाकिस्तान के मुद्दों में उलझाए रखा है। इसी दौरान उसने अपने आर्थिक विकास को सुनिश्चित किया। भारत के लिए परेशानी यह है कि पाकिस्तान और एलएसी के मुद्दे अभी भी वैसे ही बने हुए हैं, जबकि चीन भी कहीं आगे निकल चुका है। चीन पिछले दो दशक में भारत के विरोध में ही काम करता हुआ और नई दिल्ली पर दबाव बनाता हुआ नजर आया है। हालांकि, उसने कभी खुलकर इस बात को स्वीकार नहीं किया। वह भारत के साथ रिश्तों को सुधारने की बात करते हुए ही नजर आया। लेकिन ऑपरेशन सिंदूर के एक वर्ष पूरे होने के दौरान चीन ने अब इस बात को खुलकर स्वीकार किया है कि उसने इस युद्ध के दौरान पाकिस्तान की मदद की थी। यह हाल के समय में पहली बार है जब चीन खुलकर भारत के विरोध में काम करने की बात को स्वीकार कर रहा है।
मानें, 14 मई को बीजिंग में जो दो राष्ट्राध्यक्ष मिल रहे हैं, उनमें से एक भारत का तथाकथित दोस्त है, जो अब दुश्मन की तरह नजर आ रहा है। दूसरा तथाकथित दुश्मन है, जो पहले बिना सामने आए काम करता था, लेकिन अब खुलकर बयान बाजी करने लगा है। सीधा मतलब है कि भारत के लिए स्थिति विकट है।
विशेषज्ञों की मानें, तो भारत ने अमेरिका की चीन विरोधी नीति का पिछले दो दशक में भरपूर फायदा उठाया है। लेकिन अब स्थिति बदल गई है। 14 मई को होने वाली बैठक में अगर ट्रंप और जिनपिंग के बीच में दोस्ती बढ़ती है, तो भारत एक बार फिर से अपने आप को साइडलाइन महसूस करेगा। वहीं अगर इनकी दुश्मनी बढ़ती है, तो भारत के ऊपर दोनों में से किसी एक व्यापारिक केंद्र को चुनने के लिए दबाव का सामना करना होगा। वर्तमान में अमेरिका की चीन नीति ऐसी है, जिसके आधार पर भारत के लिए अपनी विदेश नीति तय करना आसान नहीं है। भारत के लिए सर्वोत्तम यही है कि अमेरिका और चीन के बीच एक संतुलित प्रतिस्पर्धा बनी रहे, जिससे भारत को अपनी स्थिति को और भी ज्यादा मजबूत करने का समय मिले।




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