dangal me utarne aaye hai CJI suryakant pulls up lawyer for seeking FIR against PM Modi and Home Minister Shah over CAA दंगल में उतरने आए हैं? वकील पर क्यों भड़क गए CJI सूर्यकांत; PM मोदी और HM शाह से क्या नाता, India News in Hindi - Hindustan
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दंगल में उतरने आए हैं? वकील पर क्यों भड़क गए CJI सूर्यकांत; PM मोदी और HM शाह से क्या नाता

CJI Suryakant: जब याचिकाकर्ता वकील ने आइडियोलॉजिकल ऑब्जेक्शन का जिक्र किया, तो जस्टिस बागची ने उसे चेतावनी दी कि पॉलिटिक्स या आइडियोलॉजी से असहमति को क्रिमिनल ऑफेंस में नहीं बदला जा सकता।

Fri, 27 Feb 2026 02:55 PMPramod Praveen लाइव हिन्दुस्तान, नई दिल्ली
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दंगल में उतरने आए हैं? वकील पर क्यों भड़क गए CJI सूर्यकांत; PM मोदी और HM शाह से क्या नाता

CJI Suryakant: देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच राजस्थान राजस्थान हाई कोर्ट के उस आदेश के खिलाफ एक वकील की अपील पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें उसकी याचिका न केवल बेकार और प्रोसेस का गलत इस्तेमाल बताते हुए खारिज कर दी गई थी बल्कि याचिकाकर्ता वकील पर 50,000 रुपये का जुर्माना लगा दिया था। पूरन चंद्र सेन नामक इस वकील ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और अन्य के खिलाफ नागरिकता संशोधन अधिनियम 2019 (CAA) के मामले में FIR दर्ज करने की मांग की थी।

जब यह मामला शुक्रवार को CJI की अगुवाई वाली बेंच के पास सुनवाई के लिए पहुंचा तो CJI सूर्यकांत उस पर भड़क गए। शीर्ष अदालत ने इस याचिका को न केवल अनुचित बताया बल्कि इसे न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग भी माना। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता वकील, जो खुद पेश हुए थे, को देखकर CJI कांत तब और भड़क गए, जब उन्होंने देखा कि याचिकाकर्ता वकील ने गले में बैंड नहीं पहना है। इसे देखते हुए CJI सूर्यकांत ने पूछा, “इन पर जुर्माना नहीं लगाया हाई कोर्ट ने? बैंड- वैंड पहने नहीं है.. लगा कोई दंगल में उतरने आए हैं।”

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"कितने साल हो गए वकालत करते आपको?"

बार एंड बेंच के मुताबिक, इस पर जस्टिस बागची ने कहा, हां, हाई कोर्ट ने जुर्माना लगाया है।" इस पर CJI ने पूछा, "कितने साल हो गए वकालत करते आपको?" इसके जवाब में एडवोकेट ने कहा: "1995 से...।" इस पर CJI ने पूछा, "आपको लाइसेंस देने की गलती किसने की। प्लीज़ ऐसी पिटीशन फाइल न करें। लोग आप पर विश्वास करते हैं.. अगर आप यह सब फाइल करेंगे तो लोग आप पर कैसे विश्वास करेंगे? इस पर याचिकाकर्ता एडवोकेट ने कहा: "RSS के आदर्श संविधान के खिलाफ हैं।"

अगर आप और जोर देंगे.. तो हम…

इतना सुनकर जस्टिस बागची और भड़क गए और कहा, “अगर आप और ज़ोर देंगे.. तो हमें जुर्माने की राशि बढ़ानी पड़ेगी। आपकी आइडियोलॉजी या पॉलिटिक्स वगैरह से राय अलग हो सकती है, लेकिन इससे कोई ऑफेंस नहीं होता या आप किसी अथॉरिटी के खिलाफ FIR के लिए नहीं कह सकते। बहस के लिए अगर पार्लियामेंट कोई गैर-कानूनी कानून पास करती है.. तो क्या यह क्राइम है?? प्लीज़ इसे वापस ले लें, खुद को शर्मिंदा न करें।”

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फिलहाल जुर्माने पर रोक

पीठ ने वकील से सख्त शब्दों में कहा कि वैचारिक या राजनीतिक असहमति को आपराधिक अपराध में नहीं बदला जा सकता। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि ऐसे मामलों से लोगों का न्यायपालिका पर विश्वास कमजोर हो सकता है। सुनवाई के दौरान अदालत ने वकील की याचिका को “फ्रिवोलस” बताते हुए पहले से राजस्थान हाई कोर्ट द्वारा लगाए गए ₹50,000 के जुर्माने का जिक्र किया। हालांकि, वकील द्वारा अपनी गलती स्वीकार करने और भविष्य में ऐसी याचिका न दायर करने का आश्वासन देने पर सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल इस जुर्माने को स्थगित (होल्ड) कर दिया।

पिटीशनर को हुआ गलती का एहसास

कोर्ट की टिप्पणी के बाद, पिटीशनर ने कहा कि अपनी गलती का एहसास होने के बाद, वह पिटीशन को आगे नहीं बढ़ाना चाहता। उसने आगे यह भी वादा किया कि SHO, अलवर को भेजी गई 2020 की कंप्लेंट के संबंध में वह किसी भी कोर्ट में या किसी और तरीके से ऐसी कोई कंप्लेंट, एप्लीकेशन या पिटीशन फाइल नहीं करेगा। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि वकील अपने वचन का उल्लंघन करता है, तो यह जुर्माना स्वतः लागू हो जाएगा। इस मामले में कोर्ट का रुख यह दर्शाता है कि न्यायपालिका बिना ठोस आधार के दायर याचिकाओं को गंभीरता से नहीं लेती और ऐसे प्रयासों पर सख्ती बरतती है।

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