सरकार को आखिरी मौका देने पर क्यों मजबूर हुए CJI सूर्यकांत? भोदू शेख की बेटी का दिलचस्प मामला
सुप्रीम कोर्ट के CJI सूर्यकांत ने भोदू शेख की गर्भवती बेटी सुनाली खातून के अवैध डिपोर्टेशन मामले में केंद्र सरकार को सख्त चेतावनी देते हुए 'आखिरी मौका' दिया है। इस दिलचस्प और अमानवीय मामले की पूरी जानकारी पढ़ें।

पश्चिम बंगाल के बीरभूम निवासी भोदू शेख की गर्भवती बेटी सुनाली खातून को पिछले साल 'बांग्लादेशी' बताकर बिना किसी ठोस सबूत के देश से निर्वासित कर दिया गया था। अब इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार के प्रति बेहद सख्त रुख अपनाया है। भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस संवेदनशील मामले में केंद्र सरकार को अपना पक्ष रखने और आदेशों का पालन करने के लिए 'अंतिम अवसर' दिया है। यह पूरा मामला न केवल नागरिकता और मानवाधिकारों से जुड़ा है, बल्कि नौकरशाही की उस लापरवाही को भी उजागर करता है जिसके तहत एक गर्भवती भारतीय महिला को जबरन दूसरे देश भेज दिया गया था।
क्या है भोदू शेख और उनकी बेटी का पूरा मामला?
दिल्ली से हिरासत और निर्वासन: जून 2025 में, दिल्ली पुलिस और विदेशी क्षेत्रीय पंजीकरण कार्यालय (FRRO) ने एक 'पहचान सत्यापन अभियान' के दौरान भोदू शेख की 25 वर्षीय बेटी सुनाली खातून, उनके पति दानिश, उनके 8 साल के बेटे और एक अन्य परिवार को हिरासत में लिया था।
बिना जांच के डिपोर्टेशन: इन सभी को 'अवैध बांग्लादेशी प्रवासी' बताकर हिरासत में लिए जाने के महज तीन दिन के भीतर (26 जून 2025 को) असम के रास्ते बांग्लादेश सीमा पर छोड़ दिया गया। सबसे अमानवीय बात यह थी कि उस समय सुनाली खातून गर्भवती थीं।
नागरिकता का प्रमाण: बीरभूम (पश्चिम बंगाल) में रहने वाले सुनाली के पिता भोदू शेख ने कलकत्ता हाई कोर्ट में अपनी बेटी की वापसी के लिए बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की। उन्होंने अदालत में 1952 से अपने परिवार के जमीन के रिकॉर्ड और नागरिकता के अन्य दस्तावेज पेश किए, जिससे साबित हुआ कि सुनाली जन्म से ही भारतीय नागरिक हैं। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि प्रशासन ने सिर्फ 'बंगाली भाषा' बोलने के आधार पर उन्हें विदेशी मान लिया।
सुप्रीम कोर्ट तक कैसे पहुंचा मामला?
कलकत्ता हाई कोर्ट ने सभी सबूतों को देखते हुए राज्य सरकार और केंद्र को उन सभी 6 लोगों को तुरंत भारत वापस लाने का आदेश दिया था। साथ ही यह टिप्पणी की थी कि बिना 30 दिन की गृह मंत्रालय की अनिवार्य सत्यापन प्रक्रिया के उन्हें डिपोर्ट करना पूरी तरह से गैरकानूनी था। हालांकि, हाई कोर्ट के इस आदेश को मानने के बजाय केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
दिसंबर 2025 में, सुप्रीम कोर्ट ने मानवीय आधार पर गर्भवती सुनाली और उनके 8 वर्षीय बच्चे को भारत वापस लाने का आदेश दिया था। कोर्ट ने टिप्पणी की थी कि 'कानून को कभी-कभी इंसानियत के आगे झुकना पड़ता है।' इसके साथ ही पश्चिम बंगाल सरकार को बीरभूम में उनकी मेडिकल देखभाल सुनिश्चित करने का निर्देश दिया गया था।
शीर्ष अदालत ने पश्चिम बंगाल सरकार को भी नाबालिग की देखभाल करने का निर्देश दिया था और बीरभूम जिले के मुख्य चिकित्सा अधिकारी को गर्भवती महिला सुनाली खातून को प्रसव सहित सभी आवश्यक चिकित्सा सहायता निःशुल्क उपलब्ध कराने को कहा था। न्यायालय ने केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की इस दलील को भी दर्ज किया कि सक्षम प्राधिकारी ने केवल मानवीय आधार पर महिला और उसके बच्चे को देश में प्रवेश की अनुमति देने पर सहमति जताई है और उन्हें निगरानी में रखा जाएगा।
CJI सूर्यकांत ने क्यों दिया 'आखिरी मौका'?
हालिया सुनवाई में यह मामला एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट की बेंच के सामने आया। शीर्ष अदालत ने बांग्लादेश प्रत्यर्पित किए गए कुछ लोगों को वापस लाने संबंधी एक याचिका पर रुख स्पष्ट करने के लिए केंद्र सरकार को शुक्रवार को अंतिम अवसर दिया। प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ ने केंद्र की ओर से पेश वकील से इस मुद्दे पर निर्देश लेकर शीर्ष अदालत को अवगत कराने को कहा।
कपिल सिब्बल की दलील: भोदू शेख की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल और संजय हेगड़े ने कोर्ट को बताया कि केंद्र सरकार का इस मामले में अदालत को अपने विचारों और जवाबों से अवगत न कराना पूरी तरह से "अनुचित" है।
CJI की सख्त चेतावनी: सरकार के टालमटोल वाले रवैए को देखते हुए चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने सख्त लहजे में कहा कि वह केंद्र सरकार को यह 'आखिरी मौका' दे रहे हैं। यदि अदालत के आदेशों का पूरी तरह से पालन नहीं किया गया और सरकार अपना रुख साफ नहीं करती है, तो पीठ बिना किसी और देरी के मामले की अंतिम सुनवाई करेगी। जस्टिस सूर्यकांत ने स्पष्ट किया कि इस याचिका को अब बिना किसी देरी के शीघ्र सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया जाएगा। अब सबकी नजरें सुप्रीम कोर्ट की अगली सुनवाई पर टिकी हैं, जहां यह तय होगा कि केंद्र सरकार इस 'आखिरी मौके' का इस्तेमाल कैसे करती है और क्या निर्वासित किए गए परिवार के बाकी सदस्यों को भी न्याय मिल पाएगा।




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