नागरिकों का थोड़ा सम्मान कीजिए मैडम, सरकारी वकील पर बरस पड़े CJI सूर्यकांत; क्यों लगाई फटकार
इससे पहले 24 अप्रैल को जस्टिस बी. वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ ने 30 सप्ताह की प्रेगनेंसी खत्म करने की इजाजत दी थी। कोर्ट ने कहा था कि नाबालिग ने अपनी मर्जी से यह गुहार लगाई है और वह मां बनने के लिए तैयार नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट ने नाबालिग लड़की के गर्भपात से जुड़े एक मामले में सरकार को कड़ी फटकार लगाई है। SC में कोर्ट के एक हालिया आदेश को चुनौती दी गई थी जिसमें 15 साल की एक रेप पीड़िता को 31 हफ्ते की प्रेग्नेंसी को खत्म करने की इजाजत दे दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका को खारिज करते हुए कहा कि सरकार को नागरिकों के चुनाव का सम्मान करना चाहिए और समय के हिसाब से कानून को बदलने के लिए भी तैयार रहना चाहिए। SC ने यह भी कहा कि रेप के मामलों में गर्भपात के लिए कोई समय सीमा नहीं होनी चाहिए।
इससे पहले 24 अप्रैल को न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां की पीठ ने नाबालिग को गर्भपात की अनुमति दी थी। इस फैसले के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायधीश जस्टिस सूर्यकांत ने एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी को फटकार लगाते हुए कड़े शब्दों में कहा, "रेप के बाद उस बच्ची ने जो तकलीफ झेली है, उसकी भरपाई कोई नहीं कर सकता।" उन्होंने सरकारी वकील से कहा, “नागरिकों का सम्मान करें, मैडम। आपके पास चुनौती देने का कोई अधिकार नहीं है। केवल पीड़िता या उसका परिवार ही चुनौती दे सकता है।”
सरकार की क्या दलील?
इससे पहले ऐश्वर्या भाटी ने सरकार की ओर से तर्क देते हुए कहा था कि अब गर्भ को खत्म करना संभव नहीं है। उन्होंने कहा, ''बच्चा जीवित जन्म ले सकता है, जिसमें गंभीर दिक्कतें होंगी। नाबालिग मां को जीवनभर स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं हो सकती हैं और वह भविष्य में मां नहीं बन पाएगी। इस बच्चे को गोद दिया जा सकता है। अब 30 सप्ताह हो चुके हैं। अब बच्चा जीवन जीने की स्थिति में है।''
मां-बाप लेंगे फैसला- जस्टिस बागची
हालांकि जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने इन तर्कों को दरकिनार करते हुए फटकार लगाई। उन्होंने कहा कि फैसला पीड़िता और उसके माता-पिता की मर्जी पर ही निर्भर करेगा और एम्स उन्हें सोच-समझकर फैसला लेने में मदद कर सकता है। जस्टिस बागची ने कहा, “हम व्यक्तिगत विकल्पों का सम्मान करते हैं, और आपको भी करना चाहिए। माता-पिता को दिखाइए, और अगर वे बच्चे को रखने का फैसला करते हैं, तो करिए। लेकिन अगर उन्हें लगता है कि बच्ची का मानसिक स्वास्थ्य खतरे में है, तो वे फैसला लेंगे। तब कृपया अपनी क्यूरेटिव याचिका को यहां ना लाएं।”
ना हो कोई समयसीमा
इस दौरान कोर्ट ने यह सुझाव भी दिया कि रेप से जुड़े मामलों में गर्भपात की इजाजत के लिए कोई समयसीमा तय ना हो। कोर्ट ने कहा कि जब गर्भधारण बलात्कार के कारण हुआ हो, तो उसके लिए कोई समय सीमा नहीं होनी चाहिए। SC ने जोर देकर कहा कि ऐसे मामलों में पीड़ितों को गहरा आघात होता है और इसीलिए ऐसे मामलों में मां बनने के लिए मजबूर करना पीड़ित के साथ अन्याय होगा।




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