वो 60, 70 और 80 की उम्र के हैं... आपको भी पता है क्या होगा? लालू से जुड़े केस में CBI से क्यों बोला SC
ASG एसवी राजू ने कहा कि यह कानून का सवाल है। इसे लागू किया जाना चाहिए। यह इस बात का उल्लंघन है कि सजा सस्पेंड की गई है। ऐसा नहीं किया जा सकता। यह एक गैर-कानूनी आदेश है। इस पर SC की यह टिप्पणी आई है।

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (17 फरवरी) को केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) की उस अर्जी पर सुनवाई 22 अप्रैल तक के लिए टाल दी, जिसमें देवघर कोषागार से जुड़े चारा घोटाले के एक मामले में बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद को झारखंड हाई कोर्ट से मिली जमानत को चुनौती दी गई थी। जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने यह कहते हुए मामले को टाल दिया कि दलीलें पूरी नहीं हुई हैं और मामले से जुड़े कुछ आरोपियों की मौत हो चुकी है। सुनवाई के दौरान, सीबीआई की ओर से पेश हुए अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) एसवी राजू ने दलील दी कि हाई कोर्ट ने एक गैर-कानूनी आदेश पारित किया है और कानून का उल्लंघन करते हुए दोषियों की सजा निलंबित की गई है।
राजू ने कहा, "यह कानून का सवाल है। इसे लागू किया जाना चाहिए। यह इस बात का उल्लंघन है कि सजा सस्पेंड की गई है। ऐसा नहीं किया जा सकता। यह एक गैर-कानूनी आदेश है।" वहीं लालू यादव की तरफ से पेश हुए वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने कहा कि मामले में एक से ज्यादा आरोपी हैं और कुछ आरोपियों ने अभी तक CBI की अपील पर अपने जवाब दाखिल नहीं किए हैं। सिब्बल ने कहा, “दूसरे आरोपी भी हैं, उनमें से कुछ को सजा नहीं मिली है, कुछ ने जवाब नहीं दिए हैं। इतनी एक्साइटमेंट की कोई जरूरत नहीं है।”
यह कैसी विशेष अनुमति याचिका?
इस पर अदालत ने कहा, ''हम दोनों (जज) ही जानते हैं कि यह कैसी विशेष अनुमति याचिका (SLP) है। हमें लगता है कि आप दोनों भी जानते हैं कि इसका नतीजा क्या होगा। हम सभी जानते हैं कि कानून का सवाल क्या है। लोग 60, 70 और 80 की उम्र के हैं।'' इस पर ASG ने कहा, "वे सभी गैर-कानूनी तरीके से बाहर हैं। यह (बेल) सजा के बाद है।" इसके बाद कोर्ट ने आखिरकार मामले की सुनवाई अप्रैल में टाल दी। कोर्ट ने निर्देश दिया, “फाइलें बस पड़ी हैं। हम अप्रैल में तारीख देंगे। जिन मामलों में रेस्पोंडेंट की मौत हो गई है, हम उन्हें बंद कर देंगे।”
क्या है मामला?
बता दें कि झारखंड हाई कोर्ट ने दिसंबर 2017 में लालू प्रसाद यादव को IPC की धारा 120B के साथ सेक्शन 420,467,468,471,477(A) और प्रिवेंशन ऑफ़ करप्शन एक्ट के सेक्शन 13(i)(c)(d) के तहत अपराधों के लिए दोषी पाए जाने के बाद कुल सात साल की जेल की सजा सुनाई थी। रांची की एक स्पेशल CBI कोर्ट ने इस मामले में अपना फैसला सुनाते हुए लालू प्रसाद को दोषी ठहराया था। यह मामला 1991 और 1994 के बीच देवघर ट्रेजरी से 89 लाख रुपये के गबन से जुड़ा था। जब यह घोटाला हुआ था, तब लालू प्रसाद बिहार के मुख्यमंत्री थे। इसके बाद, जुलाई 2019 में, झारखंड हाई कोर्ट ने बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री को चारा स्कैम के एक मामले में जमानत दे दी, जिसमें उन्हें दोषी ठहराया गया था, और सजा भी सस्पेंड कर दी थी।
CBI ने SC का दरवाजा खटखटाया
इसके बाद CBI ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, जिसने फरवरी 2020 में इस मामले में नोटिस जारी किया। यह मामला तब से सुप्रीम कोर्ट में पेंडिंग है। सुप्रीम कोर्ट में अपनी अपील में CBI ने तर्क दिया है कि हाई कोर्ट ने हालात में कोई बड़ा बदलाव किए बिना गलती से प्रसाद के खिलाफ सजा सस्पेंड कर दी। सीबीआई ने आदेश के खिलाफ अपील करते हुए कहा कि यादव उस समय पशुधन विभाग का कामकाज देख रहे थे। घोटाला सामने आने के समय झारखंड अविभाजित बिहार का हिस्सा था।




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