ममता बनर्जी का 36 साल पुराना 'हथियार' निकाल लाए अभिषेक, 2026 में 1990 जैसा करेगा काम?
West Bengal Politics: तृणमूल कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी पर कथित पत्थर और अंडे फेंके जाने की घटना के बाद पश्चिम बंगाल की राजनीति में सियासी बवाल तेज हो गया है। TMC इसे राजनीतिक हमला बताते हुए पूरे संगठन के स्तर पर मुद्दा बनाने की कोशिश कर रही है।

तृणमूल कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी पर कथित पत्थर और अंडे फेंके जाने की घटना के बाद पश्चिम बंगाल की राजनीति में सियासी बवाल तेज हो गया है। TMC इसे राजनीतिक हमला बताते हुए पूरे संगठन के स्तर पर मुद्दा बनाने की कोशिश कर रही है। ममता बनर्जी खुद अस्पताल पहुंचीं और घटना को गंभीरता से लेते हुए विपक्ष पर हमला बोला। लेकिन सवाल यह है कि क्या 36 साल पहले अपनी बुआ ममता बनर्जी के साथ हुए हाजरा मोड़ हमले की तरह अभिषेक भी इस घटना को अपनी राजनीतिक ताकत बढ़ाने का मौका बना पाएंगे?
ममता की छवि का टर्निंग पॉइंट
दरअसल, 1990 में कांग्रेस नेता के रूप में आंदोलन कर रही युवा ममता बनर्जी पर कोलकाता के हाजरा मोड़ पर हमला हुआ था। उस घटना ने उन्हें सत्ता से टकराने वाली जुझारू नेता के रूप में स्थापित कर दिया। टीएमसी कार्यालय की दीवारों पर आज भी उन तस्वीरों को प्रमुखता से प्रदर्शित किया जाता है। इस हमले के बाद ममता को कांग्रेस से समर्थन न मिलने पर अलग होकर तृणमूल कांग्रेस बनाने का मौका मिला और बाकी इतिहास है। व्यक्तिगत चोट को राजनीतिक लाभ में बदलने की यह रणनीति ममता की राजनीति का अहम हिस्सा रही है। 2021 के विधानसभा चुनाव में व्हीलचेयर पर प्रचार और भाजपा पर जानलेवा हमले का आरोप भी उनके लिए कारगर साबित हुआ था।
क्या 1990 दोहराया जा सकेगा?
बताया जा रहा है कि शनिवार को हुई घटना के बाद TMC इस बार भी उसी फॉर्मूले को आजमाने की कोशिश में है। लेकिन सियासी पंडित इसे 1990 जैसा आसान नहीं मान रहे हैं। इसकी वजह भी साफ है...
सत्ता से हटने के बाद संघर्ष की छवि बनाना मुश्किल: कुछ दिन पहले तक ममता बनर्जी मुख्यमंत्री थीं और TMC डेढ़ दशक से राज्य में सत्ता में थी। अब विपक्षी नेता की तरह सड़क पर संघर्ष करने वाली छवि बनाना जनता के लिए विश्वसनीय नहीं लग रहा है।
अभिषेक की छवि अलग: ममता बनर्जी ने अपनी छवि आंदोलनों और जनसंघर्षों से बनाई, जबकि अभिषेक बनर्जी पर विपक्ष लगातार वंशवाद, परिवारवाद और भ्रष्टाचार के आरोप लगाता रहा है। इन आरोपों ने उनकी सार्वजनिक छवि को काफी नुकसान पहुंचाया है। उन्हें अक्सर अहंकारी बताया जाता है, जिससे 1990 वाली जनसहानुभूति हासिल करना चुनौतीपूर्ण है।
बदल गया राजनीतिक परिदृश्य: 1990 में बंगाल कांग्रेस और वाम मोर्चे के बीच द्विध्रुवीय था। तीसरे विकल्प की गुंजाइश थी, जिसका ममता ने फायदा उठाया। 2026 में भाजपा एक शक्तिशाली राष्ट्रीय पार्टी के रूप में मजबूत उपस्थिति रखती है, जिसके पास संसाधन और संगठन दोनों हैं। वाम दल अब पहले जैसे प्रभावी नहीं रहे।
ममता का दांव और चुनौती
ममता बनर्जी अभिषेक बनर्जी को अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी बनाने की कोशिश में हैं। अस्पताल पहुंचकर उन्होंने इस घटना को पार्टी के भावी नेतृत्व के लिए इस्तेमाल करने की कोशिश की है। इंडिया ब्लॉक के समर्थन के साथ वे इस मुद्दे को भुनाना चाहती हैं। लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि अभिषेक ममता नहीं हैं और 2026 का बंगाल 1990 जैसा बिल्कुल नहीं है।
दूसरी ओर भाजपा पहले ही इस तुलना को खारिज करते हुए इसे टीएमसी की पुरानी चाल बता रही है। अब देखना होगा कि बंगाल की जनता इस 'हमला राजनीति' को कितना विश्वास करते हैं।




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