मुस्लिम पक्ष ने दिया 1935 के गजट नोटिफिकेशन का हवाला, भोजशाला मामले में सोमवार को हुई जोरदार बहस
सुनवाई के दौरान एएसआई ने यह संकेत भी दिया कि हालिया सर्वे रिपोर्ट में ऐसे कई तथ्य सामने आए हैं, जो परिसर के ऐतिहासिक स्वरूप को लेकर महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं। एएसआई के इस पक्ष के बाद कोर्ट में मामला और गंभीर हो गया।

मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित बहुचर्चित इमारत 'भोजशाला' को लेकर सोमवार को मध्यप्रदेश हाई कोर्ट में सुनवाई के दौरान जबरदस्त कानूनी टकराव देखने को मिला। एक तरफ भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने कोर्ट में ऐतिहासिक साक्ष्यों के आधार पर अपना पक्ष मजबूती से रखा, तो दूसरी ओर मुस्लिम पक्ष और इंटरविनर ने भोजशाला को मस्जिद बताते हुए अपना दावा दोहराकर बहस को और गर्मा दिया। सुनवाई के दौरान कोर्ट में दलीलों और दस्तावेजों के आधार पर ऐसा माहौल बना, जिसने इस संवेदनशील विवाद को फिर सुर्खियों में ला दिया। सोमवार को एएसआई की ओर से भी अपनी दलील पेश की गईं, जिसमें वरिष्ठ अधिवक्ता सुनील जैन ने अपने तथ्य पेश किए लेकिन समय पूरा होने पर सुनवाई मंगलवार को की जाएगी।
एएसआई की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सुनील जैन ने कोर्ट को बताया कि भोजशाला का सर्वे पहली बार नहीं हुआ है, बल्कि वर्ष 1902-03 में भी यहां पर एएसआई सर्वे कर चुका है। इसके अलावा अलग-अलग समय में हुए अन्य सर्वेक्षणों में भी परिसर के भीतर मूर्तियां, प्राकृत व संस्कृत में लिखे श्लोक और कई पुरातात्विक अवशेष मिले हैं। एएसआई ने दावा किया कि हर सर्वे में मिले साक्ष्य एक ही दिशा की ओर इशारा करते हैं। कोर्ट को यह भी बताया गया कि वर्ष 2024 में हाई कोर्ट के आदेश के बाद अत्याधुनिक तकनीकों के जरिए कराया गया विस्तृत सर्वे भी इन्हीं तथ्यों की पुष्टि करता है।
आपत्ति हो तो दीवानी वाद दायर करें: मुस्लिम पक्ष
सुनवाई के दौरान एएसआई ने यह संकेत भी दिया कि हालिया सर्वे रिपोर्ट में ऐसे कई तथ्य सामने आए हैं, जो परिसर के ऐतिहासिक स्वरूप को लेकर महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं। एएसआई के इस पक्ष के बाद कोर्ट में मामला और गंभीर हो गया। वहीं दूसरी ओर मुस्लिम पक्ष और इंटरविनर ने भी जोरदार तरीके से अपनी दलीलें पेश कीं। उन्होंने भोजशाला परिसर को मस्जिद बताते हुए कहा कि उनका दावा विधिक रूप से कायम है और यदि किसी पक्ष को इस पर आपत्ति है तो उसे कानूनी प्रक्रिया के तहत दीवानी वाद दायर करना चाहिए।
'यह PIL का मामला नहीं, बल्कि सिविल सूट'
अधिवक्ता वारसी ने दलील दी कि सन 1935 के गजट नोटिफिकेशन में भी इस स्थल को मस्जिद मानते हुए अन्य गतिविधियों की अनुमति न देने की बात स्पष्ट रूप से दर्ज है। उन्होंने कोर्ट को अवगत कराया कि याचिकाकर्ता द्वारा यह मामला जनहित याचिका (PIL) की तरह पेश किया गया है, जबकि यह विषय सिविल सूट के अंतर्गत आता है, इसलिए इसे उपयुक्त सिविल कोर्ट में भेजा जाना चाहिए। मुस्लिम पक्ष ने कुरान, हदीस तथा अन्य धार्मिक दस्तावेजों के साथ सरकारी रिकॉर्ड को आधार बनाते हुए अपने दावे दोहराए।
मंगलवार को सलमान खुर्शीद रखेंगे दलील
सुनवाई के दौरान इंटरवेंशन पक्षों की दलीलें अभी लंबित हैं। मंगलवार को होने वाली अगली सुनवाई में मुस्लिम पक्ष की और से देश के प्रसिद्ध वकील सलमान खुर्शीद अपने तथ्य पेश करेंगे। वहीं अन्य मुस्लिम प्रतिवादियों के जवाब पेश होने की संभावना है। अदालत ने सभी पक्षों से दस्तावेजी साक्ष्यों के साथ अपने दावे स्पष्ट करने को कहा है।
दोनों पक्षों की दलीलों के बाद हाई कोर्ट में भोजशाला को लेकर कानूनी घमासान और तेज हो गया है। एक ओर एएसआई ऐतिहासिक साक्ष्यों के आधार पर अपना पक्ष मजबूत बता रहा है, तो दूसरी ओर मुस्लिम पक्ष मस्जिद के दावे पर अडिग नजर आ रहा है। अब इस मामले में कोर्ट की अगली सुनवाई और संभावित फैसले पर सबकी नजरें टिकी हैं, क्योंकि यह विवाद सिर्फ कानूनी नहीं बल्कि ऐतिहासिक, धार्मिक और सामाजिक दृष्टि से भी बेहद संवेदनशील माना जा रहा है।
रिपोर्ट - हेमंत




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