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दिल्ली के अक्षरधाम मंदिर में स्थापित 108 फिट ऊंची मू्र्ति, आखिर क्यों बन गई है चर्चा का कारण?

Why Akshardham temple's 108 feet statue was so special: दिल्ली के अक्षरधाम मंदिर में 108 फिट ऊंची नई प्रतिमा स्थापित की गई है। जो काफी स्पेशल है और लोगों के बीच चर्चा का विषय बनी हुई है। जानें इस मूर्ति की खासियत।

Sat, 4 April 2026 06:09 PMAparajita लाइव हिन्दुस्तान
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दिल्ली के अक्षरधाम मंदिर में स्थापित 108 फिट ऊंची मू्र्ति, आखिर क्यों बन गई है चर्चा का कारण?

दिल्ली के अक्षरधाम मंदिर में स्थापित मूर्ति इन दिनों काफी ज्यादा चर्चा का विषय बनी हुई है। लोगों के दिमाग में सवाल है कि आखिर ये मूर्ति है किसकी और इसका साइज भी लोगों को काफी हैरान कर रहा है। 108 फिट ऊंची ये मूर्ति एक पैर पर टिकी है और दोनों हाथों को ऊपर तरफ किया गया है। मूर्ति के इतने सारे एंगल इसे आखिर किस तरह हवा में टिकने में मदद कर रहे, ये सवाल भी लोगों के मन में है। तो चलिए जानते हैं कि आखिर ये मूर्ति किसकी है और किस साइंस से इसे खड़ा किया गया है।

भगवान स्वामीनारायण की है ये मूर्ति

अक्षरधाम मंदिर का पूरा नाम स्वामीनारायण अक्षरधाम मंदिर है। स्वामीनारायण संत थे जिन्होंने 11 वर्ष की उम्र में घर छोड़ दिया था और सात साल तक लगातार नंगे पैरों से एक जगह से दूसरी जगह की धार्मिक यात्रा करते रहे। ये मूर्ति उसी 11 साल के बालयोगी रूप नीलकंठ वर्णी की है। जिन्होंने 1792 में घर छोड़कर नंगे पैर 12 हजार किमी का सफर तय किया। फिर नेपाल के मुक्तिनाथ में हड्डियों को जमा देने वाली ठंड में दोनों हाथों को ऊपर कर एक पैर पर खड़े होकर कई महीनों तक घोर तपस्या की थी। ये मूर्ति उसी तपो मुद्रा के रूप में हैं। इसलिए ये मूर्ति बेहद खास है। अब जानें आखिर इतनी ऊंचाई की मूर्ति के इतने सारे एंगल होने के बाद इसे खड़ा कैसे किया गया है।

108 फिट ऊंची कई किलो वजन की मूर्ति को कैसे खड़ा किया गया है?

ये सवाल मन में इसलिए आ रहा क्योंकि जब भी ऊंची मूर्तियां बनाई जाती हैं तो उनके बेस को चौड़ा रखा जाता है। लेकिन इस मूर्ति का सारा भार एक पैर के एंगल पर आ रहा है। जिसे सांइस की लैंग्वेज में वर्टिकल कैंटी लिवर कहते हैं। इस मूर्ति को पंच धातु से बनाया गया है। जिसमे तांबे का इस्तेमाल ज्यादा हुआ है। वहीं मूर्ति को एक पैर पर टिकाने के लिए अंदर स्ट्रांग मेटल से ढांचा बनाया गया है। जो कि जमीन के अंदर कंक्रीट के ढांचे से डायरेक्ट जुड़ा है। जिसकी वजह से ये मूर्ति इतने एंगल पर होने के बाद भी हवा में हिलती नही है।

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मंदिर का स्ट्रक्चर है इस मूर्ति के लिए खास

100 एकड़ परिसर में फैले इस मंदिर को सबसे पुराने मारु गुर्जर आर्किटेक्चर की मदद से तैयार किया गया है। वास्तुशास्त्र और पंचशास्त्र के नियमों के मुताबिक इस मंदिर को तैयार किया गया है। जिसमे सैंड पत्थर और मार्बल को इस तरह के डिजाइन बनाकर जोड़ा गया है कि वो एक दूसरे में पजल की तरह सेट हो जाते हैं या इंटरलॉक हो जाते हैं। वहीं इस मंदिर की नींव में पत्थरों और रेत की लेयर बिछाकर वायर से बांधा गया है। फिर उसके ऊपर डेढ़ मीटर कंक्रीट बिछाया गया है और फिर उसके ऊपर साढ़े छह मीटर तक पकी हुई ईंटों को बिछाया गया है। इस नींव में पूरे 5 मिलियन ईटों को लगाया गया है। इतने सॉलिड नींव के ऊपर पूरा मंदिर खड़ा है। जिसमे बीस से भी ज्यादा भारी-भरकम मूर्ति है और साथ ही नई मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा भी इसी मंदिर के प्रांगण में की गई है। तो मूर्ति से पहले इस मंदिर के नींव के बारे में जानना भी जरूरी है। जो बेहद मजूबत है।

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