नवजोत कौर सिद्धू ने कैंसर के इलाज के दौरान पीने-नहाने के लिए किया गौमूत्र का इस्तेमाल, डॉक्टरों ने दी सख्त चेतावनी navjot kaur sidhu admits using cow urine for drinking and bathing since cancer journey here is what oncologists warning, हेल्थ टिप्स - Hindustan
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नवजोत कौर सिद्धू ने कैंसर के इलाज के दौरान पीने-नहाने के लिए किया गौमूत्र का इस्तेमाल, डॉक्टरों ने दी सख्त चेतावनी

डॉ. शेट्टी कहते हैं कि, 'इस तरह की बातों को बढ़ावा देने का असली खतरा यह है कि वे पीड़ित को झूठी उम्मीद देने के साथ इलाज में देरी का कारण या बीच में ही इलाज छोड़ने के लिए प्रोत्साहित करने का कारण बन सकती है।

Fri, 6 Feb 2026 11:02 AMManju Mamgain लाइव हिन्दुस्तान
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नवजोत कौर सिद्धू ने कैंसर के इलाज के दौरान पीने-नहाने के लिए किया गौमूत्र का इस्तेमाल, डॉक्टरों ने दी सख्त चेतावनी

नवजोत कौर सिद्धू का हालिया खुलासा कि उन्होंने अपने कैंसर के इलाज के दौरान गौमूत्र का उपयोग पीने और नहाने के लिए किया, स्वास्थ्य जगत में एक नई बहस की वजह बन गया है। एक तरफ जहां व्यक्तिगत आस्था और पारंपरिक उपचारों पर भरोसे की बात है, वहीं दूसरी ओर आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के विशेषज्ञ इसे एक जोखिम भरा कदम मान रहे हैं। कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे किसी व्यक्ति के अनुभव निश्चित रूप से सहानुभूति के पात्र होते हैं, लेकिन जब बात सार्वजनिक स्वास्थ्य और वैज्ञानिक प्रमाणों की आती है, तो ऑन्कोलॉजिस्ट्स की चेतावनी को नजरअंदाज करना जानलेवा साबित हो सकता है।

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हिंदू धर्म में गाय को पवित्र (गोमाता) मानकर उसके मूत्र (गौमूत्र) का उपयोग 'पंचगव्य' (दूध, दही, घी, गोबर, मूत्र) चिकित्सा पद्धति में किया जाता है। इसे कैंसर, मधुमेह, त्वचा रोगों, और पाचन समस्याओं के लिए एक पारंपरिक औषधि माना जाता है, जो रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में सहायक हो सकती है। हालांकि, इन पारंपरिक मान्यताओं और प्रथाओं को कठोर वैज्ञानिक प्रमाणों से मान्यता प्राप्त नहीं है। यह साबित करने वाला कोई वैज्ञानिक प्रमाण या चिकित्सा सहमति उपलब्ध नहीं है कि गौमूत्र कैंसर को ठीक कर सकता है।

क्या कहते हैं ऑन्कोलॉजिस्ट

फोर्टिस (नोएडा) के ऑन्कोलॉजिस्ट डॉ. ज्योति आनंद कहते हैं कि कई पशु अध्ययनों में कुछ संभावित कैंसर-रोधी या प्रतिरक्षा-संशोधित (immune-modulatory) गुण देखे गए हैं, लेकिन इन्हें अभी तक सुरक्षित और प्रभावी मानव उपचार के रूप में विकसित या प्रमाणित नहीं किया गया है। कुछ अध्ययनों में यह संकेत मिला है कि गौमूत्र के कुछ घटक कुछ कीमोथेरेपी दवाओं की प्रभावशीलता बढ़ा सकते हैं। लेकिन गैर-स्टेराइल (अस्वच्छ) गौमूत्र का सेवन स्वास्थ्य जोखिम पैदा कर सकता है, जिसमें संक्रमणों (जूनोटिक रोगों) का प्रसार शामिल है।

तनाव और प्रतिरक्षा

आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में मानसिक तनाव और कमजोर इम्यूनिटी ही अधिकांश बीमारियों की जड़ हैं। गौमूत्र को एक 'इम्यूनो-मॉड्यूलेटर' माना जाता है, जो शरीर के रक्षा तंत्र को मजबूत बनाकर रोगों को पनपने से रोकने में मदद करता है।

कैंसर-रोधी क्षमता और कोशिका सुरक्षा

वैज्ञानिक शोधों (जैसे लिम्फोसाइट्स पर अध्ययन) के अनुसार, गौमूत्र में मौजूद यूरिक एसिड और एलैंटोइन जैसे तत्व महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यह शरीर में मौजूद 'फ्री रेडिकल्स' (हानिकारक कणों) को खत्म कर ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस को कम करता है। इसके अलावा यह स्वस्थ कोशिकाओं (लिम्फोसाइट्स) को समय से पहले मरने से रोकता है और उन्हें अधिक सक्रिय बनाता है। सबसे प्रभावी बात यह है कि इसमें क्षतिग्रस्त डीएनए को रिपेयर करने और बढ़ती उम्र के असर को धीमा करने की क्षमता देखी गई है।

झूठी उम्मीद स खतरा

नवी मुंबई के फोर्टिस हीरानंदानी हॉस्पिटल में सर्जिकल ऑन्कोलॉजी के डायरेक्टर डॉ. शिशिर शेट्टी ने गौमूत्र से जुड़े इन दावों को 'वैज्ञानिक रूप से गलत और संभावित रूप से खतरनाक बताया है। डॉ. शेट्टी ने एचटी लाइफस्टाइल से बातचीत के दौरान कहा, 'इस तरह की बातों को बढ़ावा देने का असली खतरा यह है कि वे पीड़ित को झूठी उम्मीद देने के साथ इलाज में देरी का कारण या बीच में ही इलाज छोड़ने के लिए प्रोत्साहित करने का कारण बन सकती है। जिससे रोगी की सेहत के लिए खतरा पैदा हो सकता है। डॉ. शेट्टी कहते हैं कि ऑन्कोलॉजी का इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है जहां अप्रमाणित उपायों ने स्टैंडर्ड केयर की जगह लेने पर नुकसान पहुंचाया है।

डॉ. शेट्टी की स्पष्ट चेतावनी

डॉ. शेट्टी ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि सार्वजनिक हस्तियों को सोशल मीडिया पर चिकित्सा संबंधी दावे करते समय बेहद सावधान रहना चाहिए। उनका कहना है कि गंभीर बीमारियों से जूझ रहे मरीज अक्सर 'चमत्कार' की उम्मीद करते हैं, और ऐसे में सुनी-सुनाई बातों को बढ़ावा देना उनकी जान के लिए जोखिम भरा साबित हो सकता है।

सिद्धू बनाम मेडिकल साइंस

एक तरफ जहां नवजोत कौर सिद्धू ने कैंसर से अपनी जंग में 'लाइफस्टाइल बदलाव' और 'सकारात्मक नजरिए' को श्रेय दिया, वहीं चिकित्सा जगत ने इस पर कड़ा रुख अपनाया है। सिद्धू के अनुसार, खान-पान और जीवनशैली में बदलाव रिकवरी की कुंजी है। जबकि डॉक्टरों का मानना है कि कैंसर से रिकवरी केवल और केवल 'एविडेंस-बेस्ड मेडिकल ट्रीटमेंट' का परिणाम होती है। ऑन्कोलॉजिस्ट्स ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि मरीज केवल क्वालिफाइड विशेषज्ञों और वैज्ञानिक डेटा पर ही भरोसा करें। कैंसर के निदान में लाइफस्टाइल सप्लीमेंट्री हो सकती है, लेकिन वैज्ञानिक इलाज का विकल्प कतई नहीं।

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