'जब डायबिटीज में भूख से मर जाते थे लोग', एक इंजेक्शन ने बचाई थी लोगों की जान, जानें कैसे हुई थी इंसुलिन की खोज interesting history of insulin discovery reverse death due to diabetes type 1 blood sugar insulin injection, हेल्थ टिप्स - Hindustan
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'जब डायबिटीज में भूख से मर जाते थे लोग', एक इंजेक्शन ने बचाई थी लोगों की जान, जानें कैसे हुई थी इंसुलिन की खोज

When was insulin first used to treat diabetes: सौ साल से भी ज्यादा वक्त पहले जब किसी बच्चे को डायबिटीज हो जाती थी तो उसका मतलब केवल मौत होता था। क्योंकि शरीर में इंसुलिन नहीं बनता था और शरीर को जरूरी एनर्जी नहीं मिल पाती थी। ऐसे में एक इंजेक्शन की खोज ने लाखों लोगों को जिंदगी दी थी।

Thu, 5 March 2026 02:52 PMAparajita लाइव हिन्दुस्तान
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'जब डायबिटीज में भूख से मर जाते थे लोग', एक इंजेक्शन ने बचाई थी लोगों की जान, जानें कैसे हुई थी इंसुलिन की खोज

आमतौर पर डायबिटीज को लाइफस्टाइल की बीमारी माना जाता है। लेकिन ये बीमारी जेनेटिक भी होती है। जिसमे बच्चे के पैदा होने के साथ ही उसे डायबिटीज होता है। जिसे टाइप 1 डायबिटीज बोला जाता है। इस बीमारी में शरीर में ब्लड शुगर काफी हाई होता है। सौ साल पहले जब कोई बच्चा डायबिटीज की बीमारी के साथ पैदा होता था तो उसे लोग मौत ही समझते थे क्योंकि शरीर में इंसुलिन बनता ही नहीं जो कि एनर्जी के लिए ग्लूकोज का उपयोग करने के लिए जरूरी होता है। जिससे धीरे-धीरे शरीर सूखने लगता और बच्चे की मौत हो जाती। जनवरी 1922 में पहली बार एक 14 साल के लड़के को इंसुलिन का इंजेक्शन लगाया गया। जिसके बाद डायबिटीज का मतलब मौत नहीं रह गया।

इंसुलिन की खोज से पहले डायबिटीज का मतलब था मौत

1921 में इंसुलिन इंजेक्शन की खोज से पहले डायबिटीज के साथ पैदा लोग ज्यादा दिन जिंदा नहीं रह पाते थे। डायबिटीज का एकमात्र ट्रीटमेंट था कि मरीज को मिनिमम कार्बोहाइड्रेट के साथ ही सख्त डाइट पर रखा जाए। इससे मरीज कुछ साल तो जी लेते थे लेकिन बच नहीं पाते थे। बेहद सख्त डाइट की वजह से कई बार पेशेंट भूख से मर जाते थे।

14 साल के लड़के पर किया गया था इंसुलिन इंजेक्शन का ट्रायल

पहली बार इंसुलिन इंजेक्शन का ट्रायल एक 14 साल के लड़के पर किया गया था। टोरंटो के एक मजदूर परिवार में जन्मे लियानार्डो के परिवार में माता-पिता, एक भाई और दो बहनें शामिल थी। 11 साल की उम्र में उस बच्चे में डायबिटीज का पता चला। जिसके बाद डायबिटीज के लक्षणों को मैनेज करने के लिए उसे सख्त डाइट पर रखा गया। लेकिन समय के साथ 14 की उम्र में भी वो काफी दुबला-पतला और कमजोर था, अपने बाकी हम उम्र बच्चों से काफी कमजोर। बच्चे का वजन मात्र 29 किलो था और बार-बार बेहोश होने की स्थिति में उसे अस्पताल में भर्ती किया गया। अपने बच्चे की जान को बचाने के लिए लियानार्डो के माता-पिता ने नए ट्रीटमेंट के टेस्ट के लिए हामी भर दी।

पहले इंजेक्शन का नहीं दिखा खास असर

पहली बार 11 जनवरी 1922 को लियानार्डो को पहला इंसुलिन का इंजेक्शन लगाया गया। लेकिन इस इंजेक्शन ने शरीर पर काम नहीं किया, हालांकि बाद में लगाए गए इंजेक्शन से उसके शरीर में इंप्रूवमेंट देखने को मिली। अब वो लड़का ज्यादा एक्टिव था, पहले से बेहतर दिख रहा था और खुद को स्ट्रांग फील कर पा रहा था। उसके मेडिकल रिकॉर्ड्स के मुताबिक कुछ महीनों के बाद उस बच्चे ने इतना रिकवर किया कि उसे वापस घर भेज दिया गया।

टाइप 1 डायबिटीज को मैनेज करने के लिए बना इंसुलिन इंजेक्शन

द नोबल प्राइज वेबसाइट के मुताबिक यूनिवर्सिटी ऑफ टोरंटो के रिसर्चर ने एक साल के अंदर तेजी से काम करते हुए इंसुलिन हार्मोन को अलग कर इंजेक्शन बनाया।

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पहली बार पता किया गया पैंक्रियाज में बनने वाला इंसुलिन

1889 में दो जर्मनी के रिसर्चर, ऑस्कर मिंकोव्स्की और जोसेफ वॉन मेरिंग ने रिसर्च किया और पाया कि जब कुत्तों से पैंक्रियास ग्लैंड निकाल दी गई, तो जानवरों में डायबिटीज के लक्षण दिखे और वो जानवर जल्दी ही मर गए। इससे यह आइडिया आया कि पैंक्रियाज शरीर की वो जगह थी जहां पर 'पैंक्रियाटिक सब्सटेंस' यानि कि इंसुलिन बनता था। इस आइडिया के मिलने के बाद इंसानों के शरीर के लिए इंसुलिन बनाने के काम पर रिसर्च किया गया।

पहली बार इस तरह बना इंसुलिन

1921 में, फ्रेडरिक बैंटिंग नाम के एक युवा सर्जन और उनके असिस्टेंट चार्ल्स बेस्ट ने कुत्ते के पैंक्रियाज से इंसुलिन निकालने का तरीका निकाला। बैंटिंग ने यूनिवर्सिटी ऑफ टोरंटो में फिजियोलॉजी के प्रोफेसर और डिपार्टमेंट हेड जॉन मैकलियोड से संपर्क किया। 1921 में जॉन मैकलियोड की लैब में, फ्रेडरिक बैंटिंग और उनके रिसर्च असिस्टेंट चार्ल्स बेस्ट ने कुत्तों का इलाज किया ताकि वे ट्रिप्सिन न बनाएं। फिर इंसुलिन निकालकर डायबिटीज के इलाज में इस्तेमाल किया जा सकता था। जब वे कुत्तों से इंसुलिन अलग करने में कामयाब हुए, तो उनके साथियों ने कहा कि यह “गाढ़े भूरे रंग के मैल” जैसा दिखता है। बायोकेमिस्ट जेम्स कोलिप इंसुलिन को शुद्ध करने पर काम करने के लिए ग्रुप में शामिल हो गए ताकि यह इंसानों में टेस्ट करने के लिए काफी सुरक्षित हो, और साथ मिलकर उन्होंने उस चीज को इस तरह से रिफाइन किया कि लाखों डायबिटीज से पीड़ित मरीजों के लिए नया जीवन बन सके।

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