केमिकल से पका केला! खरीदने से पहले ही कर लें पहचान, ये तरीका आएगा काम how to identify banana chemically ripened or natural fssai guidelines to artificial ripening process, खाना - Hindustan
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केमिकल से पका केला! खरीदने से पहले ही कर लें पहचान, ये तरीका आएगा काम

Identify Banana Chemical Ripened  Or Naturally: मार्केट में केला खरीदने से पहले ही देखकर चेक कर लें कहीं ये बनाना केमिकल से तो नहीं पकाया गया है। नेचुरल पके केले की पहचान के साथ ही जानें किस तरह से केले को नेचुरली पकाया जा सकता है। 

Sat, 11 April 2026 06:20 PMAparajita लाइव हिन्दुस्तान
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केमिकल से पका केला! खरीदने से पहले ही कर लें पहचान, ये तरीका आएगा काम

केला सबसे सस्ता और आसान फल है। जो लगभग सारे मौसम में होता है और मार्केट में बड़े आसानी से मिल जाता है। पोटैशियम, मैग्नीशियम, कॉपर और जरूरी मिनरल्स के साथ इसमे फाइबर भी ज्यादा होता है। इसलिए केला हर उम्र के लोगों को खाने की सलाह मिलती है। मसल्स गेन करना हो या फिर वजन बढ़ाना हो, छोटे बच्चे से लेकर बढ़ती उम्र में केला फायदेमंद होता है। लेकिन मार्केट में मिल रहा केला कई बार जहर से कम नहीं होता क्योंकि इन केलों को पकाने के लिए केमिकल का इस्तेमाल किया जाता है। बाजार में मिल रहा केला केमिकल से पका है या नेचुरल, ये पहचाने का तरीका जरूर जान लें। साथ ही जान लें कि FSSAI ने केमिकल से पकाने की क्या गाइडलाइन बना रखी है। यहीं नहीं केले को नेचुरल तरीके से पकाने का तरीका भी सीख जाएं।

कैसे पहचाने केला केमिकल से पका है नेचुरल

  • केला नेचुरल तरीके से पका है या फिर केमिकल से इसे पहचानने के लिए केले के गुच्छे के डंठल (क्राउन एरिया) को देखें। अगर ये डंठल वाला हिस्सा और केले का निचला सिरा हरा रंग सा दिख रहा और बीच का हिस्सा पीला दिख रहा तो इसका मतलब है कि केला केमिकल से पका है। केले को जब केमिकल में डुबोकर पकाया जाता है तो अधिकतर बीच का हिस्सा तेजी से पीला हो जाता है और ऊपरी-नीचे का हिस्सा हरा ही रह जाता है।
  • वहीं नेचुरल तरीके से पके केले की डंठल और नीचे का हिस्सा काला रंग का दिखाई देता है।
  • नेचुरल पके केले में भूरे-काले रंग के धब्बे दिखाई देते हैं।
  • जिस केले को नेचुरल तरीके से पकाया गया होगा उसका छिलका ऊपर से गल जाता है लेकिन केला अंदर से पूरी तरह गला हुआ नहीं रहता।

क्या कहता है FSSAI नियम

FSSAI के अनुसार, केला बेचने वाले अक्सर आम, केला और पपीता जैसे फलों को आर्टिफिशियल तरीके से पकाने के लिए एसिटिलीन गैस छोड़ने के लिए इंडस्ट्रियल-ग्रेड कैल्शियम कार्बाइड, जिसे आमतौर पर “मसाला” के नाम से जाना जाता है, का इस्तेमाल करते हैं। कैल्शियम कार्बाइड में आर्सेनिक और फॉस्फोरस होता है जो इंसानों के लिए नुकसानदायक होता है। जिससे चक्कर आना, जलन, कमजोरी और कई बीमारियों होने का खतरा रहता है। इसलिए, भारत में फलों को पकाने के लिए इस केमिकल का इस्तेमाल बैन है। बैन कैल्शियम कार्बाइड के बड़े पैमाने पर इस्तेमाल और इसकी कमी को देखते हुए एफएसएसएआई ने 2016 में नोटिस जारी कर फलों को पकाने के लिए एक अल्टरनेटिव एजेंट के तौर पर एथिलीन गैस के यूज की इजाजत दी है।

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कितनी मात्रा में कर सकते हैं एथिलीन गैस का यूज

फलों को पकाने के लिए एथिलीन गैस को सेफ माना जाता है। इस गैस के केला पकाने के लिए केले को 24-28 घंटे तक एथिलीन गैस के संपंर्क में रखा जाता है। इस दौरान टेंपरेचर 15-18 डिग्री सेल्सियस और नमी 90-95 प्रतिशत तक होनी चाहिए। इस प्रोसेस से जब केला पकाया जाता है तो ये सेफ तरीके से पकता है और इसकी क्वालिटी भी बनी रहती है।

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केले को नेचुरल तरीके से कैसे पकाएं

केले को नेचुरल तरीके से पकाने के लिए ये प्रोसेस फॉलो किए जाते हैं।

अखबार में लपेटकर

केला, आम और पपीता जैसे फलों को नेचुरल तरीके से पकाने के लिए न्यूजपेपर का इस्तेमाल किया जाता है। इन अखबार में फलों को लपेटकर रख देने पर ये पक जल्दी पक जाते हैं।

भूसी का इस्तेमाल कर

केले को पकाने के लिए किसी लकड़ी के बॉक्स में धान या गेंहू की भूंसी को रखकर केले को ढंक दिया जाता है। इससे भी केले और बाकी फल जल्दी से पक जाते हैं।

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