शराब घोटाले में विनय सिंह को जमानत, SC ने झारखंड पुलिस से कहा- जानबूझकर केस किया
शराब घोटाले व उसके बाद कई केस में आईएसएस विनय चौबे के खास सहयोगी के तौर पर आरोपी बनाए गए विनय सिंह के मामले में गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट की जमानत संबंधी टिप्पणी से एसीबी व झारखंड पुलिस की कार्यशैली पर गंभीर सवाला उठे हैं।

शराब घोटाले व उसके बाद कई केस में आईएसएस विनय चौबे के खास सहयोगी के तौर पर आरोपी बनाए गए विनय सिंह के मामले में गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट की जमानत संबंधी टिप्पणी से एसीबी व झारखंड पुलिस की कार्यशैली पर गंभीर सवाला उठे हैं। कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि राज्य एजेंसियों द्वारा दायर दो अगली एफआईआर सिर्फ यह पक्का करने के लिए थी कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा दी गई अंतरिम जमानत के आदेश के बावजूद उन्हें लगातार हिरासत में रखा जाए और उस आदेश को आगे बढ़ाया जाए।
नेक्सजेन संचालक विनय सिंह और उनकी पत्नी स्निग्धा सिंह, शराब घोटाले के मामले में सह-आरोपी हैं। राज्य एजेंसियों द्वारा हजारीबाग में वन भूमि और रांची के जगन्नाथपुर पुलिस स्टेशन में धोखाधड़ी के एक मामले से जुड़े दो और केस में भी उन्हें आरोपी बनाया गया है। शराब घोटाले से जुड़े केस में सुप्रीम कोर्ट ने 17 दिसंबर, 2025 को विनय सिंह को अंतरिम जमानत दी थी।
जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस प्रसन्ना बी वराले की डिवीजन बेंच ने गुरुवार को सिंह को इन मामलों में नियमित जमानत दे दी, साथ ही स्निग्धा सिंह के खिलाफ कोई जबरदस्ती की कार्रवाई न करने का निर्देश भी दिया। इसके बाद शुक्रवार को विनय सिंह को हजारीबाग जेल से रिहा कर दिया गया।
कोर्ट ने टिप्पणी की है कि यह काफी दिलचस्प और हैरान करने वाला है कि जब 17 दिसंबर, 2025 को उनके सामने दलीलें दी जा रही थीं, तो आरोपी के खिलाफ एफआईआर संख्या 20/2025 या जगन्नाथपुर थाने में दर्ज केस संख्या 458/2025 के बारे में कोई खबर तक नहीं थी। अंतरिम जमानत के बाद दो अलग-अलग एफआईआर, यानी एसीबी का केस 20/2025 और झारखंड पुलिस का केस 458/2025, 24 नवंबर, 2025 और 26 नवंबर, 2025 को रजिस्टर की गईं।
कोर्ट की क्या है टिप्पणी
कोर्ट ने टिप्पणी की है कि विनय सिंह के खिलाफ लगातार एफआईआर इसलिए दर्ज की गई, ताकि उनको हिरासत में रखा जा सके। कोर्ट ने कहा है कि हमें इस बात से भी बल मिलता है कि इस कोर्ट (सुप्रीम कोर्ट) द्वारा 17 दिसंबर 2025 को जमानत दिए जाने पर, विनय सिंह को 458/2025 में मजिस्ट्रेट के 19 दिसंबर 2025 के ऑर्डर से कस्टडी में पूछताछ के लिए रिमांड पर लिया गया था और फिर से सात दिनों के लिए और रिमांड दिया गया, जबकि ज्यूरिस्डिक्शनल मजिस्ट्रेट द्वारा केस नंबर 20/2025 में 20 दिसंबर 2025 के ऑर्डर से चौदह दिनों की रिमांड मांगी गई थी। प्रॉसिक्यूशन के इन कामों और व्यवहार से यह साफ पता चलता है कि रेस्पोंडेंट्स ने जानबूझकर यह पक्का किया है कि पिटीशनर नंबर 1 को कस्टडी में रखा जाए।




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