सीयूजे में नई शिक्षा नीति में भारतीयता के समावेशन पर मंथन
रांची में केंद्रीय विश्वविद्यालय झारखंड द्वारा आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का समापन हुआ। मुख्य विषय भारतीय शिक्षा व्यवस्था में व्यावहारिक सुधार और पाठ्यक्रम में भारतीयता का समावेश था। शिक्षाविदों ने शिक्षा के समग्र विकास और नई शिक्षा नीति-2020 की महत्वपूर्णता पर चर्चा की। सभी प्रतिभागियों को प्रमाण पत्र प्रदान किए गए।

रांची, विशेष संवाददाता। केंद्रीय विश्वविद्यालय झारखंड (सीयूजे) के शिक्षा विभाग की ओर से आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का समापन मंगलवार को हुआ। दूसरे दिन का मुख्य विषय- भारतीय शिक्षा व्यवस्था में व्यावहारिक सुधार और पाठ्यक्रम में भारतीयता का समावेश रहा, जिसमें देशभर से आए शिक्षाविदों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों ने हिस्सा लिया। इसमें मुख्य वक्ता केंद्रीय विश्वविद्यालय, जम्मू के शिक्षा विभाग के प्रोफेसर डॉ ज्योति नारायण वालिया ने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य सिर्फ बौद्धिक विकास तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि व्यक्ति के समग्र विकास-शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक, बौद्धिक और आध्यात्मिक-को सुनिश्चित करना चाहिए। उन्होंने कोठारी आयोग से लेकर राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी)-2020, तक की यात्रा का उल्लेख करते हुए कहा कि नई शिक्षा नीति सिर्फ पाठ्यक्रम में बदलाव नहीं, बल्कि शिक्षा प्रणाली में एक व्यापक संरचनात्मक परिवर्तन का संकेत है।
यूडायस के आंकड़ों का हवाला देते हुए उन्होंने बताया कि देश के विद्यार्थियों के लिए एसीएफएसई-2023 एक नई दिशा प्रदान कर रहा है। डॉ वालिया ने एनाीईआरटी की नई पुस्तकों में भारतीयता के समावेश को रेखांकित करते हुए कहा कि अब अंग्रेजी और विज्ञान जैसे विषयों में भी भारतीय संदर्भों को प्रमुखता दी जा रही है। उन्होंने कक्षा 7 की विज्ञान पुस्तक- जिज्ञासा का उदाहरण देते हुए कथा तकनीक और कहानी कथन के माध्यम से शिक्षण को अधिक प्रभावी बनाने पर जोर दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि शिक्षा को कंटेंट आधारित से क्षमता आधारित बनाना समय की आवश्यकता है।विशिष्ट वक्ता डॉ सुभाष मिश्रा ने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 भारतीय शिक्षा प्रणाली के पुनरुत्थान का एक ऐतिहासिक अवसर प्रदान करती है। उन्होंने भारतीय संस्कृति की मूल अवधारणा व्यष्टि से समष्टि को रेखांकित करते हुए कहा कि शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति को समाज और राष्ट्र के प्रति उत्तरदायी बनाना है। उन्होंने शिक्षकों की भूमिका को अत्यंत महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि शिक्षक सिर्फ ज्ञान के संप्रेषक नहीं, बल्कि मूल्यों और संस्कारों के संवाहक होते हैं। उन्होंने आह्वान किया कि शिक्षक विद्यार्थियों के चित्त में भारतीय मूल्यों, नैतिकता और सांस्कृतिक चेतना का विकास करें, ताकि वे ज्ञानवान ही नहीं, बल्कि संवेदनशील और जिम्मेदार नागरिक बन सकें।मौके पर शिक्षक शिक्षा में हो रहे परिवर्तनों और सीबीएसई के शैक्षिक ढांचे में भारतीय मूल्यों के समावेश पर भी विस्तृत चर्चा की गई। तकनीकी सत्र में देशभर से आए विद्यार्थियों, शोधार्थियों व प्राध्यापकों ने ऑनलाइन और ऑफलाइन माध्यम से अपने शोध पत्र प्रस्तुत किए। इन प्रस्तुतियों में भारतीय शिक्षा पद्धति, समग्र विकास और नवाचार आधारित शिक्षण पर महत्वपूर्ण विचार सामने आए।समापन सत्र में मुख्य अतिथि प्रो जेवी मधुसूदन (केंद्रीय विश्वविद्यालय, हैदराबाद), प्रो सुरेंद्र कुमार शर्मा (हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय, शिमला एवं क्षेत्रीय समन्वयक, विद्या भारती उच्च शिक्षा संस्थान) आदि ने हिस्सा लिया। डॉ विजय कुमार यादव ने संगोष्ठी की समग्र रिपोर्ट प्रस्तुत करते हुए दोनों दिनों की गतिविधियों का विस्तृत विवरण दिया। मौके पर प्रोफेसर जेवी मधुसूदन ने कहा कि एनईपी-2020 पारंपरिक और आधुनिक शिक्षा प्रणाली के बीच एक सशक्त सेतु का कार्य कर रही है और इसमें भारतीय संस्कृति के समावेश का प्रयास अत्यंत सराहनीय है। उन्होंने कोठारी आयोग के प्रसिद्ध कथन- कक्षा में ही नियति का निर्माण होता है, का उल्लेख करते हुए शिक्षा की भूमिका को रेखांकित किया। वहीं, प्रो सुरेंद्र कुमार शर्मा ने विद्यार्थियों को देश का भविष्य बताते हुए उनके समग्र विकास और मूल्य-आधारित शिक्षा पर विशेष जोर दिया। सभी प्रतिभागियों को प्रमाणपत्र भी प्रदान किए गए।
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