झारखंड के अस्पतालों के लिए मेडिकल उपकरण की खरीद में करोड़ों रुपए की गड़बड़ी, ऑडिट में खुलासा
झारखंड में सरकारी अस्पतालों के लिए डायग्नोस्टिक उपकरणों की खरीद में बड़ी गड़बड़ी का खुलासा हुआ है। ऑडिट के दौरान खरीद में नियमों की अनदेखी, तकनीकी गड़बड़ी, वित्तीय हेरफेर और एक खास कंपनी को लाभ पहुंचाने का खुलासा हुआ है।

झारखंड में 15वें वित्त आयोग के तहत सरकारी अस्पतालों के लिए 7 प्रकार के डायग्नोस्टिक उपकरणों की खरीद प्रक्रिया में महालेखाकार ने व्यापक अनियमितता का खुलासा किया है। ऑडिट में खुलासा हुआ है कि झारखंड मेडिकल एंड हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट एंड प्रोक्योरमेंट कॉरपोरेशन लिमिटेड (जेएमएचआईडीपीसीएल) द्वारा की गई खरीद में नियमों की अनदेखी, तकनीकी गड़बड़ी, वित्तीय हेरफेर और एक खास कंपनी को लाभ पहुंचाने के आरोप सामने आए हैं।
ऑडिट के अनुसार, इस पूरी प्रक्रिया से सरकारी खजाने को 8.67 करोड़ से अधिक का नुकसान हुआ। टेंडर 01/12/23 को जारी हुआ, जिसमें 16 कंपनियां शामिल हुईं। नौ शुद्धिपत्र जारी हुए। बाद में मेरिल डायग्नोस्टिक प्राइवेट लिमिटेड को हीमेटोलॉजी एनालाइजर पार्ट -5, हीमेटोलॉजी एनालाईजर पार्ट -3 और सेमी ऑटोमेटेड बायोकेमिस्ट्री एनालाईजर की आपूर्ति का ठेका दे दिया गया।
डेमो में फेल मशीन को कर दिया ‘क्वालिफाई’
रिपोर्ट के अनुसार, 6 अगस्त 2024 को डेमो में मेरिल डायग्नोस्टक की मशीन जरूरी मानकों में फेल हो गई। मशीन में एचएल-7 प्रोटोकॉल आधारित लैन पोर्ट और बाईडायरेक्शनल एलआईएस जैसी अनिवार्य सुविधाएं नहीं थीं। लेकिन, ऑपरेटिंग मैनुअल के आधार पर कंपनी को योग्य कर दिया गया। ऑडिट ने इसे “गंभीर प्रक्रियागत अनियमितता” बताते हुए कहा है कि इससे टू-बिड सिस्टम में जरूरी भौतिक सत्यापन प्रक्रिया को नजरअंदाज किया गया।
ब्लैकलिस्टेड होने के बावजूद कंपनी को मिला ठेका
सबसे चौंकाने वाली बात यह सामने आई कि मेरिल डायग्नोस्टिक को राजस्थान मेडिकल सर्विसेज कॉर्पोरेशन लिमिटेड ने 20 जुलाई 2023 को दो वर्षों के लिए डिबार किया था। इसके बावजूद कंपनी ने खुद को ब्लैकलिस्टेड नहीं बताया और विभाग ने भी उसे टेंडर में भाग लेने की अनुमति दे दी। ऑडिट ने कहा है कि ब्लैकलिस्टेड कंपनी किसी भी सरकारी खरीद प्रक्रिया में भाग लेने की पात्र नहीं थी। इसके बावजूद उसे तीनों बड़े उपकरणों का ठेका दिया जाना गंभीर सवाल खड़े करता है।
ऐसी शर्त रखी गई, जिसे पूरा करना संभव नहीं था
सेमी ऑटोमेटेड बायोकेमिस्ट्री एनालाइजर के लिए एक शर्त जोड़कर प्रति मशीन हर साल 36 हजार टेस्ट करने की क्षमता मांगी गई। यानी प्रतिदिन करीब 2500 टेस्ट। जांच में पता चला यह व्यवहारिक रूप से संभव ही नहीं था। रिकॉर्ड में इस आंकड़े का कोई विश्लेषण भी नहीं मिला। यह शर्त कॉस्ट पर रिपोर्टेबल टेस्ट (सीपीआरटी) को प्रभावित करने और वित्तीय बोली को नियंत्रित करने के उद्देश्य से डाली गई।
अन्य राज्यों से महंगी दर पर मशीनों की खरीदारी की
9 अक्टूबर 2024 को बिड प्रोसेस मैनेजमेंट कमेटी (बीपीएमसी) ने पार्ट-5 एनालाइजर के लिए लेटर ऑफ अवार्ड (एलओए) रोकने और पहले कीमतों की जांच करने की सिफारिश की थी। पर विभाग ने उसी दिन एलओए जारी कर दिया। मेरिल ने इसी अवधि में बीएचयू, एनटीपीसी, आयुष मंत्रालय और गुजरात सरकार को यही मशीनें 4.15 लाख से 4.99 लाख प्रति यूनिट की दर पर दी थीं। झारखंड में अधिक कीमत पर खरीद हुई। कीमत घटाई जाती तो सरकार 4.24 करोड़ बचा सकती थी।
10 साल का खर्च छिपाकर एल-वन तय किया गया
रिपोर्ट में सबसे गंभीर आपत्ति हीमेटोलॉजी एनालाइजर पार्ट-3 की वित्तीय बोली पर उठाई गई है। ऑडिट के अनुसार, रीएजेंट्स का अनुबंध 10 वर्षों के लिए था, लेकिन एल-1 करते समय केवल एक साल के रीएजेंट के खर्च को जोड़ा गया। यदि पूरे 10 वर्षों की लागत को शामिल किया जाता तो श्री फैशन सबसे कम बोलीदाता बनती। लेकिन, ऐसा नहीं किया गया और मेरिल को ठेका दे दिया।




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