मलमास के कारण एक महीना तक थम जाएंगे मांगलिक कार्य
सनातनी परंपरा के अनुसार, 17 मई से एक महीने के लिए मांगलिक कार्यों पर विराम लगेगा। ज्येष्ठ मास का 'अधिक मास' होने के कारण विवाह, मुंडन, और गृह प्रवेश जैसे शुभ कार्यों के लिए कोई मुहूर्त नहीं होगा। 15 जून के बाद शुभ घड़ियां लौटेंगी और 19 जून से विवाह के लिए मुहूर्त उपलब्ध होंगे।

जमुआ, प्रतिनिधि। सनातनी परंपरा और ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार, आगामी 17 मई से मांगलिक कार्यों पर एक महीने के लिए विराम लगने जा रहा है। ज्येष्ठ मास के 'अधिक मास' (मलमास) के रूप में होने के कारण विवाह, मुंडन, गृह प्रवेश और जनेऊ जैसे शुभ कार्यों के लिए अगले एक महीने तक कोई मुहूर्त उपलब्ध नहीं होगा।
शुभ लग्न का दूसरा चरण
19 जून से शुरू होगा शुभ लग्न का दूसरा चरण: पंडितों और आचार्यों के अनुसार, 15 जून को ज्येष्ठ मास के समाप्त होने के बाद शुभ घड़ियां वापस लौटेंगी। विवाह के लिए विशेष रूप से जून और जुलाई के महीने महत्वपूर्ण हैं क्योंकि इसके बाद लंबे समय तक शुभ नक्षत्रों का अभाव रहेगा।
विवाह के आगामी शुभ मुहूर्त: जून माह: 19, 20, 21, 27, 28 और 29 तारीख।
जुलाई माह: 1, 2, 6, 7, 8, 11 और 12 तारीख।
ब्रेक के कारण
15 जुलाई के बाद फिर लगेगा 'ब्रेक': 12 जुलाई के बाद शुभ कार्यों पर फिर से रोक लग जाएगी। इसका मुख्य कारण देवगुरु बृहस्पति का अस्त होना है। ज्योतिषीय गणना के अनुसार, 15 जुलाई को गुरु पश्चिम दिशा में अस्त हो जाएंगे। गुरु के अस्त होने पर गृह की शुभ शक्ति क्षीण मानी जाती है, जिसके कारण सगाई और विवाह जैसे कार्य वर्जित हो जाते हैं।
मलमास का महत्व
क्यों लगता है मलमास? : जमुआ के चर्चित आचार्य रामानंद शास्त्री ने मलमास के महत्व पर प्रकाश डालते हुए इसके दो मुख्य कारण बताए हैं:
खगोलीय गणना: पृथ्वी सूर्य का चक्कर 365 दिन और 6 घंटे में लगाती है (सौर वर्ष), जबकि चंद्र वर्ष 354 दिनों का होता है। इन दोनों के बीच हर साल 11 दिनों का अंतर आता है, जो तीन साल में 33 दिन (लगभग एक माह) बन जाता है। इसी अंतर को पाटने के लिए हर तीसरे साल 'अधिमास' जोड़ा जाता है।
आध्यात्मिक मान्यता: पौराणिक कथाओं के अनुसार, इस मास का कोई स्वामी नहीं था, तब भगवान विष्णु ने इसे अपना नाम दिया और यह 'पुरुषोत्तम मास' कहलाया।
आध्यात्मिक दृष्टिकोण
भजन-कीर्तन और दान का समय: आचार्य शास्त्री के अनुसार, भले ही इस दौरान मांगलिक कार्य वर्जित हैं, लेकिन आध्यात्मिक दृष्टिकोण से यह महीना अत्यंत फलदायी है। इस समय किए गए दान, पुण्य, तीर्थ स्नान और श्री हरि (विष्णु) की उपासना का फल अनंत गुना मिलता है। उन्होंने सलाह दी है कि इस अवधि में ग्रहों की स्थिति अनुकूल न होने के कारण लोगों को केवल भजन-कीर्तन और ईश्वर की भक्ति में समय व्यतीत करना चाहिए।
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