Friendly Loans Are Not Legally Recoverable Debts Jharkhand High Court Explains the Reason दोस्ताना लेनदेन कानूनन वसूला जाने वाला कर्च नहीं, झारखंड हाई कोर्ट ने बताई वजह, Jharkhand Hindi News - Hindustan
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दोस्ताना लेनदेन कानूनन वसूला जाने वाला कर्च नहीं, झारखंड हाई कोर्ट ने बताई वजह

झारखंड हाईकोर्ट ने चेक बाउंस मामले में अहम टिप्पणी करते हुए कहा है कि केवल दोस्ताना लेन-देन को कानूनी रूप से वसूले जाने योग्य कर्ज नहीं माना जा सकता। आइए जानते हैं हाई कोर्ट ने ऐसा क्यों कहा है।

Fri, 22 May 2026 06:52 AMMohammad Azam हिन्दुस्तान, रांची
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दोस्ताना लेनदेन कानूनन वसूला जाने वाला कर्च नहीं, झारखंड हाई कोर्ट ने बताई वजह

झारखंड हाईकोर्ट ने चेक बाउंस मामले में अहम टिप्पणी करते हुए कहा है कि केवल दोस्ताना लेन-देन को कानूनी रूप से वसूले जाने योग्य कर्ज नहीं माना जा सकता। अदालत ने इसी आधार पर दो आरोपियों को बरी करने के निचली अदालत के फैसले को सही ठहराते हुए शिकायतकर्ता की अपील खारिज कर दी। जस्टिस राजेश शंकर की अदालत जमशेदपुर के न्यायिक दंडाधिकारी के आदेश के खिलाफ दायर अपील पर सुनवाई कर रही थी।

मामले में शिकायतकर्ता ने दावा किया था कि उसने 3 जनवरी 2007 को आरोपी को कारोबार में मदद के लिए दो लाख रुपये का दोस्ताना कर्ज दिया था। इसमें एक लाख रुपये चेक और एक लाख रुपये नकद दिए गए थे। आरोप था कि इसके बदले आरोपी ने सुरक्षा के तौर पर डेढ़ लाख और 50 हजार रुपये के दो पोस्ट-डेटेड चेक दिए थे। बाद में खाते में पर्याप्त राशि नहीं होने के कारण दोनों चेक बाउंस हो गए। इसके बाद कानूनी नोटिस भेजकर एनआई एक्ट की धारा 138 के तहत मामला दर्ज कराया गया। सुनवाई के दौरान शिकायतकर्ता ने खुद को गवाह के रूप में पेश करते हुए कहा कि आरोपी ने स्वयं उसके नाम से चेक लिखकर दिए थे। हालांकि, हाईकोर्ट ने कहा कि एनआई एक्ट की धारा 138 मुख्य रूप से व्यावसायिक लेन-देन को नियंत्रित करने के लिए बनाई गई है। अदालत ने माना कि चेक धारक के पक्ष में कानूनी अनुमान होता है, लेकिन यदि रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्य यह साबित करे कि कोई कानूनी रूप से लागू करने योग्य कर्ज नहीं था, तो यह अनुमान खारिज किया जा सकता है।

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दोस्ती किसी अनुबंध का आधार नहीं हो सकती

अदालत ने अपने फैसले में कहा कि दोस्ती किसी अनुबंध का आधार या प्रतिफल नहीं हो सकती। यदि कोई वैध अनुबंध नहीं है, तो ऐसे लेन-देन को कानूनी रूप से लागू नहीं किया जा सकता और वह कानूनी रूप से वसूले जाने योग्य ऋण की श्रेणी में नहीं आएगा। कोर्ट ने पाया कि शिकायतकर्ता ने खुद इस लेन-देन को फ्रेंडली लोन बताया था। ऐसे में ट्रायल कोर्ट द्वारा आरोपियों को बरी करने के फैसले में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं बनता। इसी के साथ हाईकोर्ट ने अपील खारिज कर दी।

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प्रशिक्षित शिक्षकों को न्यूनतम वेतन मिले

रांची। हाईकोर्ट के जस्टिस दीपक रोशन की अदालत ने पूर्वी सिंहभूम जिले के 80 प्रशिक्षित प्राथमिक शिक्षकों की याचिका को स्वीकार करते हुए उन्हें 16,290 रुपये मासिक न्यूनतम वेतन देने का आदेश दिया है। याचिकाकर्ता मैट्रिक और इंटरमीडिएट प्रशिक्षित शिक्षक हैं, जिन्होंने वर्ष 2006 से पहले सेवा में प्रवेश किया था। उनकी मांग थी कि छठे वेतन आयोग की संस्तुतियों के तहत जारी वित्त विभाग के प्रस्ताव के अनुसार उनका प्रारंभिक वेतन एक जनवरी 2006 से 16,290 रुपये निर्धारित किया जाए। हाईकोर्ट ने कहा कि यह मामला पूर्व में एक मामले के निर्णय से पूरी तरह आच्छादित है। कोर्ट ने शिक्षकों के पक्ष में निर्णय सुनाते हुए विभाग के 10 जून 2024 के विवादित आदेश को निरस्त कर दिया। कोर्ट ने राज्य को निर्देश दिया कि वह इन याचिकाकर्ताओं को वही लाभ दे, जो पिछले मामले के याचिकाकर्ताओं को दिए गए थे। सरकारी अधिवक्ता ने कोर्ट को बताया कि पिछले संबंधित मामले के निर्णय के खिलाफ राज्य ने खंडपीठ में अपील दायर कर दी है। इस पर अदालत ने स्पष्ट किया कि अपील के आदेश से शिक्षकों का न्यूनतम वेतनमान प्रभावित होगा।

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