पूरा डिफेंस सिस्टम इजरायल में और मुसलमान देश झेल रहे मिसाइल, क्या अमेरिका ने फंसा दिया?
सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात में ज्यादा असर दिखा और वहां इमारतों पर ड्रोन और मिसाइलें गिरते दिखे। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर इस्लामिक देश क्या अमेरिका से दोस्ती की कीमत ईरान के हमले झेलकर चुका रहे हैं।

अमेरिका और इजरायल ने 28 फरवरी को जब ईरान पर हमलों की शुरुआत की तो शिया मुस्लिम देश ने भी जवाबी ऐक्शन लिया। सैद्धांतिक तौर पर यह ऐक्शन अमेरिका और इजरायल पर होना चाहिए था, लेकिन इससे सबसे ज्यादा प्रभावित सऊदी अरब, UAE और कतर जैसे इस्लामिक देश ही हुए, जिन्हें अमेरिका का करीबी माना जाता है। ईरान ने इजरायल पर भी कुछ हमले किए, लेकिन वहां ज्यादा असर नहीं हुआ। सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात में ज्यादा असर दिखा और वहां इमारतों पर ड्रोन और मिसाइलें गिरते दिखे। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर इस्लामिक देश क्या अमेरिका से दोस्ती की कीमत ईरान के हमले झेलकर चुका रहे हैं।
एक्सपर्ट्स सवाल उठा रहे हैं कि आखिर अमेरिकी सैन्य ठिकानों से भरे हुए मिडल ईस्ट के देश इतनी आसानी से ईरान के हमलों का शिकार कैसे हो रहे हैं? इसका जवाब यह बताया जा रहा है कि बीते कुछ सालों में अमेरिका ने इजरायल की सुरक्षा को कहीं ज्यादा प्राथमिकता दी है। इसी के तहत उसने अक्तूबर 2024 से अब तक बड़ी संख्या में एयर डिफेंस सिस्टम को सऊदी अरब, इराक, कतर से हटाकर इजरायल में लगाया है। इस सिस्टम को THAAD कहा जाता रहा है, जिसकी फुल फॉर्म है Terminal High Altitude Area Defence। अक्तूबर 2024 में जो बाइडेन ने इसकी शुरुआत की थी।
फिर जुलाई 2025 में सऊदी अरब से कहा गया कि वह मिसाइल इंटरसेप्टर्स को इजरायल भेजे और अबू धाबी से भी अगस्त 2025 में इन्हें मंगा लिया गया। इस तरह अलग-अलग मुल्कों से मंगाकर अमेरिका ने 6 THAAD सिस्टम इजरायल में तैनात कर दिए। इससे इजरायल की सुरक्षा तो पुख्ता हो गई, लेकिन सऊदी अरब, यूएई जैसे मुल्क रिस्क में हैं। यही नहीं एक सऊदी अधिकारी ने तो नाम उजागर न करने की शर्त पर यह भी कहा कि सऊदी अरब ने हमें अपने हाल पर छोड़ दिया और पूरा डिफेंस सिस्टम इजरायल की सुरक्षा में तैनात है।
क्यों रूस से हथियार खरीदने से डरता है सऊदी अरब
अब इन हमलों ने अमेरिका की ओर से सऊदी अरब, यूएई और कतर को मिलने वाली सुरक्षा की पोल खोल दी है। ऐसे में आशंका है कि आने वाले दिनों में सऊदी अरब और यूएई को अपना रक्षा बजट बढ़ाना पड़ सकता है। पहले भी दोनों देश अमेरिका से ही बड़े पैमाने पर रक्षा सौदे करते रहे हैं। कहा जाता है कि सऊदी अरब के पेट्रोडॉलर तो अमेरिकी अर्थव्यवस्था को ही हथियारों की खरीद से मजबूत करते रहे हैं। यहां तक कि रूसी पाबंदियों के डर से अकसर सऊदी अरब ऊंचे दामों पर ये सौदे करता है। जैसे उसने रूस से S-400 की डील सिर्फ इसलिए नहीं की थी क्योंकि CAATSA के तहत अमेरिका पाबंदियों का डर था।
सऊदी अरब और UAE रक्षा खर्च और बढ़ाएंगे, बन गई मजबूरी?
यही नहीं अब्राहम अकॉर्ड के तहत संबंध सामान्य करने वाले कई मुसलमान देशों ने इजरायल से भी रक्षा सौदे किए हैं। इजरायल के एलबिट सिस्टम की खरीद भी UAE ने की है। माना जा रहा है कि अब ईरान के हमलों की चपेट में आने के बाद इस्लामिक देश इजरायल और अमेरिका से हथियार और ज्यादा खरीदेंगे। इस तरह जंग से यदि ईरान को बड़ा नुकसान हुआ तो वहीं अमेरिका और इजरायल इससे अछूते ही दिख रहे हैं। उनसे कहीं ज्यादा नुकसान तो सऊदी अरब, UAE जैसे मुल्कों का हुआ है। इन पर हमलों से सुरक्षा की लेयर की कमजोरी उजागर हुई है और अब रक्षा बजट भी बढ़ाना होगा।
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