ईरान जंग में दो धारी तलवार पर चल रहा पाक, इसलिए बिचौलिया बनने को आतुर ट्रंप के 'फेवरेट' मुनीर?
अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव में पाकिस्तान की मध्यस्थता दुनिया को हैरान कर रही है। एक तरफ पड़ोसियों से तनाव और दूसरी तरफ आर्थिक संकट के बीच, जानिए पाकिस्तान के इस कदम के पीछे जोखिम क्या हैं।

अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे युद्ध में मध्यस्थ यानी बिचौलिए के रूप में पाकिस्तान का नाम सामने आ रहा है। इससे कई लोग हैरान हैं। लेकिन अगर कूटनीतिक और रणनीतिक नजरिए से देखा जाए, तो यह उतना भी आश्चर्यजनक नहीं है। दरअसल पाकिस्तान ने इस पूरे विवाद में एक बहुत ही सधा हुआ कूटनीतिक संतुलन बनाने की कोशिश की है। क्योंकि इस जंग में पाकिस्तान की साख और भविष्य दोनों दांव पर हैं। क्यों? आइए इसे विस्तार से समझते हैं।
यह भूमिका आश्चर्यजनक क्यों नहीं है?
पाकिस्तान के इस मध्यस्थता वाले कदम के पीछे कई अहम कारण हैं। सबसे पहला तो अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का समर्थन है। ट्रंप और पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल असीम मुनीर के बीच काफी अच्छे समीकरण बताए जाते हैं। ट्रंप अक्सर मुनीर को अपना 'पसंदीदा' फील्ड मार्शल बताते हैं और उनका मानना है कि मुनीर ईरान की राजनीति और स्थितियों को बाकियों से काफी बेहतर समझते हैं।
दूसरा कारण ईरान के साथ पाकिस्तान के भौगोलिक और सांस्कृतिक संबंध हैं। पाकिस्तान और ईरान एक-दूसरे के पड़ोसी हैं और करीब 900 किलोमीटर लंबी सीमा साझा करते हैं। दोनों देशों के बीच गहरे सांस्कृतिक और धार्मिक संबंध हैं, जिन्हें वे खुद एक भाईचारे वाला रिश्ता मानते हैं।
पाकिस्तान को लेकर ईरान का रुख अपेक्षाकृत इसलिए भी नरम है क्योंकि पाक में अमेरिका का कोई भी एयरबेस (हवाई अड्डा) नहीं है। साथ ही, खाड़ी देशों के अन्य मध्यस्थों की तरह पाकिस्तान अभी तक इस संघर्ष में सीधे तौर पर नहीं उलझा है। अमेरिका और ईरान के बीच शांति बहाल होना खुद पाकिस्तान के राष्ट्रीय और रणनीतिक हित में है।
एक ओर शांतिदूत तो दूसरी ओर कर रहा बमबारी
पाकिस्तान शांतिदूत बनने की कोशिश कर रहा है, लेकिन उसकी अपनी सीमाएं काफी अशांत हैं, जो एक बड़ा विरोधाभास पैदा करता है। पाकिस्तान इस समय अफगानिस्तान पर बमबारी कर रहा है। पाकिस्तान का आरोप है कि अफगान तालिबान अपने देश में उन आतंकी गुटों को पनाह दे रहा है जो पाकिस्तान में हमले करते हैं। हालांकि तालिबान सरकार इससे इनकार करती है। इसे पाकिस्तान एक पूर्ण युद्ध के रूप में देख रहा है। इसके अलावा, भारत के साथ उसके रिश्ते पहले से ही खराब हैं और पिछले ही साल यह तनाव इस कदर बढ़ गया था कि परमाणु युद्ध तक की आशंका जताई जाने लगी थी।
पाकिस्तान के लिए दांव पर क्या है? आर्थिक और रणनीतिक जोखिम
पाकिस्तान इस पूरे मामले में बहुत सावधानी से कदम रख रहा है, जिसमें दोनों देशों के बीच संदेश पहुंचाना और मुस्लिम देशों के विदेश मंत्रियों की मेजबानी करना शामिल है। लेकिन इस संतुलन में कई बड़े जोखिम भी हैं।
1. तेल पर अत्यधिक निर्भरता
पाकिस्तान अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए पूरी तरह से आयातित तेल पर निर्भर है, जिसका एक बड़ा हिस्सा होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर आता है। बीबीसी ने अटलांटिक काउंसिल के वरिष्ठ फेलो माइकल कुगेलमैन के हवाले से लिखा है कि खाड़ी देशों के बाहर पाकिस्तान शायद इकलौता ऐसा देश है जिसका इस युद्ध में सबसे ज्यादा नुकसान हो सकता है।
2. आर्थिक संकट
युद्ध की आशंका के चलते पाकिस्तान ने मार्च की शुरुआत में ही पेट्रोल और डीजल की कीमतों में लगभग 20% की बढ़ोतरी कर दी है। ईंधन बचाने के लिए सरकारी कर्मचारियों के लिए हफ्ते में केवल 4 दिन काम करने का नियम लागू किया गया है। कराची के प्रोफेसर फरहान सिद्दीकी का मानना है कि यदि यह युद्ध जारी रहा, तो पाकिस्तान पर आर्थिक दबाव असहनीय हो जाएगा।
3. सऊदी अरब के साथ रक्षा समझौते का पेंच
सितंबर में पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच एक रक्षा समझौता हुआ था। इसके तहत यह तय किया गया था कि 'किसी एक देश पर हमला, दोनों पर हमला माना जाएगा।' अगर युद्ध बढ़ता है और सऊदी अरब इसमें शामिल होता है, तो इस समझौते के तहत पाकिस्तान को भी युद्ध में कूदना पड़ सकता है। इसका सबसे बड़ा नुकसान यह होगा कि पाकिस्तान की पूरी पश्चिमी सीमा (ईरान और अफगानिस्तान से सटी) पूरी तरह से असुरक्षित हो जाएगी, जो उसके लिए एक बड़ा सैन्य संकट खड़ा कर देगा।
4. घरेलू दबाव और जनभावना
इस पूरे समीकरण में पाकिस्तान के लिए सबसे नाजुक मुद्दा उसकी अपनी जनता है। अमेरिका और इजरायल के एक संयुक्त हवाई हमले में ईरान के सर्वोच्च नेता के मारे जाने के बाद, पूरे पाकिस्तान में ईरान के समर्थन में भारी विरोध प्रदर्शन हुए। इस दौरान कराची में स्थित अमेरिकी वाणिज्य दूतावास पर धावा बोलने की कोशिश करने वाले कई प्रदर्शनकारी मारे गए।
यूएन में पूर्व पाकिस्तानी राजदूत मलीहा लोधी के अनुसार, पाकिस्तान की जनता की भावनाएं पूरी तरह से ईरान के समर्थन में हैं। यही वजह है कि पाकिस्तान की सरकार और सेना को कूटनीतिक फैसले लेते समय अपनी जनता के इस भारी दबाव और गुस्से का भी खास ख्याल रखना पड़ रहा है। पाकिस्तान की यह मध्यस्थता सिर्फ कूटनीति नहीं, बल्कि अपनी अर्थव्यवस्था और आंतरिक शांति को बचाए रखने की एक बहुत बड़ी मजबूरी भी है।

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