भारत के खिलाफ नेपाल के पीएम बालेन को उकसा रहे विपक्षी दल, लिपुलेख पर कह दी विवादित बात
लिपुलेख और कैलाश मानसरोवर यात्रा को लेकर नेपाल में फिर बवाल शुरू हो गया है। नेपाली विपक्ष ने PM बालेन शाह सरकार पर भारत और चीन के साथ सीधे 'टेबल टॉक' करने का भारी दबाव बनाया है। जानिए क्या है भारत का इस पर क्या रुख है।

नेपाल में एक बार फिर लिपुलेख, लिम्पियाधुरा और कालापानी का मुद्दा गरमा गया है। नेपाली कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्षी सांसदों ने गुरुवार को प्रधानमंत्री बालेन शाह की सरकार पर दबाव बनाना शुरू कर दिया। विपक्ष की मांग है कि सरकार अब सिर्फ 'डिप्लोमैटिक नोट' तक सीमित न रहे और इन क्षेत्रों को 'वापस' लेने के लिए भारत और चीन के साथ उच्च स्तरीय बातचीत शुरू करे। गौरतलब है कि नेपाल इन भारतीय क्षेत्रों पर अपना दावा ठोकता रहा है। भारत इन दावों को खारिज करता रहा है।
क्या है ताजा मामला?
भारत और चीन ने 2026 के लिए कैलाश मानसरोवर यात्रा फिर से शुरू करने का फैसला किया है। यात्रा जून से अगस्त तक चलेगी, जिसमें लिपुलेख दर्रे (उत्तराखंड) के रास्ते एक रूट और नाथू ला (सिक्किम) के रास्ते दूसरा रूट शामिल है। नेपाल सरकार का कहना है कि लिपुलेख, लिम्पियाधुरा और कालापानी उसके क्षेत्र में आते हैं और बिना उसकी सहमति के यात्रा या कोई गतिविधि नहीं होनी चाहिए। नेपाल के विदेश मंत्रालय ने 1816 की सुगौली संधि का हवाला देते हुए दोनों देशों को अलग-अलग डिप्लोमैटिक नोट भेजे। भारत ने नेपाल के दावों को सिरे से खारिज कर दिया। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रंधीर जायसवाल ने कहा कि लिपुलेख मार्ग 1954 से ही यात्रा के लिए इस्तेमाल होता आ रहा है और यह कोई नई बात नहीं है।
भारत के खिलाफ नेपाल के पीएम बालेन को उकसा रहे विपक्षी दल
नेपाली संसद के निचले सदन (प्रतिनिधि सभा) की अंतरराष्ट्रीय संबंध और पर्यटन समिति की सिंघ दरबार में बैठक हुई। इसी बैठक में विपक्षी सांसदों ने यह मुद्दा उठाया। 'कैलाश मानसरोवर यात्रा' के लिए लिपुलेख मार्ग का इस्तेमाल किए जाने को लेकर वहां के नेताओं में नई बेचैनी देखने को मिल रही है। वे नेपाल के नए पीएम बालेन शाह पर दबाव डाल रहे हैं कि भारत से सीधी बात करें।
विपक्षी सांसदों ने क्या-क्या कहा?
आमने-सामने हो बातचीत: नेपाली कांग्रेस के सांसद संदीप राणा ने कहा कि नेपाल को अब अपने दोनों पड़ोसियों के साथ सीधी 'टेबल टॉक' यानी आमने-सामने बातचीत करने में देरी नहीं करनी चाहिए। राणा ने एक विवादित बयान देते हुए दावा किया, "लिपुलेख हमारी जमीन है और इसका इस्तेमाल कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए किया जा रहा है।"
सीपीएन (यूएमएल) की सांसद भूमिका लिंबू सुब्बा ने लिपुलेख पर भारत की प्रतिक्रिया को 'गैर-जिम्मेदाराना' करार दिया। माओवादी सेंटर के सांसद प्रमेश कुमार हमाल ने सरकार से अपील की है कि वह इस मुद्दे पर देश की अन्य राजनीतिक ताकतों को भी अपने साथ ले।
क्या है भारत का रुख?
आपको बता दें कि जब नई दिल्ली ने कैलाश मानसरोवर यात्रा का ऐलान किया था, उसके बाद नेपाल के विदेश मंत्रालय ने भारत और चीन दोनों को कूटनीतिक पत्र भेजे थे। भारत ने नेपाल द्वारा किए गए क्षेत्रीय दावों की कड़ी आलोचना करते हुए उन्हें "एकतरफा और कृत्रिम विस्तार" करार दिया है और इसे पूरी तरह से गलत बताया है।
लिपुलेख को लेकर नेपाल की आपत्तियों पर पूछे गए एक सवाल के जवाब में, विदेश मंत्रालय (MEA) के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने मीडिया को संबोधित किया। उन्होंने भारत के पूर्व में जारी किए गए बयानों का हवाला देते हुए कहा: कैलाश मानसरोवर यात्रा 1954 से इसी मार्ग के जरिए हो रही है। यह कोई नई बात नहीं है। इसलिए स्थिति वहीं है जो पहले थी। उन्होंने आगे कहा, "यह कोई नया घटनाक्रम नहीं है... हमने अपने बयान में स्पष्ट रूप से कहा है कि क्षेत्र का एकतरफा और कृत्रिम विस्तार करने का दावा सही नहीं है।"
सीमा विवाद पर बातचीत के लिए भारत का रुख
नेपाल के साथ अन्य मुद्दों पर चर्चा के बारे में बात करते हुए, विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि नई दिल्ली हमेशा बातचीत के लिए तैयार है। उन्होंने स्पष्ट किया, "अगर कोई सीमा संबंधी विवाद है, तो हम उस पर भी चर्चा करने के लिए तैयार हैं। लेकिन, एकतरफा दावा करना सही तरीका नहीं है।"
इससे पहले रविवार को भी भारत ने लिपुलेख दर्रे पर नेपाल के हालिया क्षेत्रीय दावों को सिरे से खारिज कर दिया था। काठमांडू (नेपाल) ने इस क्षेत्र से होकर जाने वाले कैलाश मानसरोवर मार्ग पर आपत्ति जताई थी, जिसे भारत ने "अनुचित" करार दिया।
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