शिया-सुन्नी विवाद हुआ और गहरा, खाड़ी देशों पर 3 हजार मिसाइलें दागकर ईरान ने ललकारा
यह हमला ईरान की रणनीति का हिस्सा लगता है, जिसमें वह अमेरिका और इजरायल के खिलाफ बदला लेते हुए क्षेत्रीय युद्ध को विस्तार दे रहा है। ईरान ने पहले प्रॉक्सी ग्रुप्स के जरिए अस्थिरता फैलाई थी, लेकिन अब सीधे जीसीसी देशों पर हमला कर उसने चुनौती दी है।
ईरान ने अमेरिका-इजरायल के साथ चल रहे युद्ध के तीन हफ्ते बाद खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) देशों पर 3 हजार से अधिक प्रोजेक्टाइल्स (बैलिस्टिक मिसाइलें, क्रूज मिसाइलें और ड्रोन) दागे हैं। खासतौर से यूएई को निशाना बनाया गया, जिससे सभी 6 सुन्नी-बहुल जीसीसी देश (सऊदी अरब, बहरीन, कुवैत, ओमान, कतर और यूएई) आहत हुए हैं। ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट को ब्लॉक कर वैश्विक तेल आपूर्ति को प्रभावित किया है और डिएगो गार्सिया (अमेरिका-ब्रिटेन सैन्य अड्डा) पर भी मिसाइल हमला किया। इस कार्रवाई से मध्य-पूर्व में शिया-सुन्नी विभाजन और गहरा हो गया है, क्योंकि शिया-बहुल ईरान ने सुन्नी देशों को सीधे निशाना बनाया।
यह हमला ईरान की रणनीति का हिस्सा लगता है, जिसमें वह अमेरिका और इजरायल के खिलाफ बदला लेते हुए क्षेत्रीय युद्ध को विस्तार दे रहा है। ईरान ने पहले प्रॉक्सी ग्रुप्स के जरिए अस्थिरता फैलाई थी, लेकिन अब सीधे जीसीसी देशों पर हमला कर उसने इस्लामी एकता को चुनौती दी है। खोर्रमशहर जैसी बैलिस्टिक मिसाइलों और क्लस्टर बमों का इस्तेमाल इजरायल पर भी किया गया, जबकि गल्फ में तेल सुविधाओं और शिपिंग को खतरा पैदा हुआ। चीन और रूस की मदद से टारगेट को पहले से चिह्नित किया गया, जिससे ईरान की तैयारी का पता चलता है। इसने मध्य-पूर्व की भू-राजनीतिक गतिशीलता को बदल दिया है और ईरान को और अलग-थलग कर दिया है।
जीसीसी देशों में रोष बढ़ गया है। सऊदी अरब ने ईरान के साथ बचे-खुचे विश्वास को पूरी तरह खोने की बात कही है। बाकी सुन्नी देश भी गुस्से में हैं और बदले की कार्रवाई की आशंका जता रहे हैं। UAE पर सबसे अधिक हमले हुए, जिससे दुबई और अबू धाबी जैसे शहरों में हवाई रक्षा सक्रिय हुई। इस युद्ध ने तेल की कीमतों में उछाल लाया और वैश्विक अर्थव्यवस्था को झटका दिया, क्योंकि होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल निर्यात बाधित हुआ। अमेरिका को अपने सहयोगियों से मदद मांगनी पड़ी है, जबकि ट्रंप ने युद्ध को कम करने के संकेत दिए हैं।
इस घटना से मध्य-पूर्व में शिया-सुन्नी विभाजन अब और साफ हो गया है, जो पहले प्रॉक्सी युद्धों तक सीमित था। ईरान की कार्रवाइयों ने सुन्नी देशों को अमेरिका-इजरायल के करीब ला दिया है। अगर यह सिलसिला जारी रहा तो क्षेत्रीय युद्ध बड़ा रूप ले सकता है, जिसमें यूरोपीय देश और वैश्विक शक्तियां भी प्रभावित होंगी। ईरान ने कोई समर्पण नहीं दिखाया, लेकिन इसने अपनी अलगाव की स्थिति को और मजबूत कर दिया है। कुल मिलाकर, यह हमला धार्मिक-राजनीतिक विभाजन को गहरा करने के साथ वैश्विक सुरक्षा और अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती पेश कर रहा है।
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