If America will be defeated in Iran like Vietnam what expert says on Donald Trump Plan क्या ईरान में अमेरिका का होगा वियतनाम जैसा हाल, ऐसी चिंता क्यों जता रहे एक्सपर्ट, International Hindi News - Hindustan
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क्या ईरान में अमेरिका का होगा वियतनाम जैसा हाल, ऐसी चिंता क्यों जता रहे एक्सपर्ट

Explainer: खबरें हैं कि अमेरिका ईरान पर जमीनी हमले की तैयारी में है।  वैसे यह पहली बार नहीं है, जब अमेरिका किसी देश में ग्राउंड ऑपरेशन करने जा रहा है। आइए जानते हैं क्या है इसका इतिहास...

Mon, 30 March 2026 06:21 PMDeepak Mishra लाइव हिन्दुस्तान, वॉशिंगटन
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क्या ईरान में अमेरिका का होगा वियतनाम जैसा हाल, ऐसी चिंता क्यों जता रहे एक्सपर्ट

Explainer: एक तरफ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ईरान से बातचीत का राग आलाप रहे हैं। वहीं, दूसरी तरफ अमेरिका ईरान में ग्राउंड ऑपरेशन की तैयारी में है। जानकारी के मुताबिक अमेरिका खर्ग आइलैंड और होर्मुज स्ट्रेट के तटीय जगहों पर छापेमारी अभियान भी चलाएगा। इसके लिए मिडिल ईस्ट में 10 हजार अतिरिक्त सेना तैनात की जानी है। अमेरिकी सेना की 82वीं एयरबॉर्न यूनिट से 1500 सैनिकों को पहले ही वहां भेजा जा चुका है। हालांकि वाइट हाउस प्रेस सेक्रेट्री कैरोलीन लिएविट का कहना है कि इसका यह मतलब नहीं है, प्रेसीडेंट ट्रंप ने कोई फैसला कर लिया है। वैसे यह पहली बार नहीं है, जब अमेरिका किसी देश में ग्राउंड ऑपरेशन करने जा रहा है। आइए जानते हैं क्या है इसका इतिहास...

ग्राउंड ऑपरेशन पर हो रही है बहस
हालांकि अभी यह पूरी तरह से तय नहीं है कि अमेरिका, ईरान में ग्राउंड ऑपरेशन करेगा या नहीं। लेकिन अमेरिका में इसको लेकर अंदरखाने बहस शुरू हो चुकी है। विदेशी संबंधों पर यूएस बेस्ड थिंक टैंक काउंसिल में सीनियर फेलो, लिंडा रॉबिन्सन ने भी इसको लेकर अपनी राय दी है। उन्होंने कहाकि अगर अमेरिका ईरान में ग्राउंड फोर्सेज को तैनात करता है तो रिस्क काफी ज्यादा होगा। इसको लेकर अमेरिकी सेना का शीर्ष नेतृत्व भी पूरी तरह से सहमत नहीं है। अमेरिकी सेना के अधिकारियों का कहना है कि इसमें मरने वालों की संख्या काफी ज्यादा होगी और फेल होने का भी खतरा है। वहीं, ट्रंप सरकार के प्रमुख विरोधियों में से एक डेमोक्रेटिक सीनेटर रिचर्ड ब्लूमेंथल भी जमीनी ऑपरेशन के पक्ष में नहीं हैं।

विएतनाम युद्ध में क्या हुआ
अमेरिका के लिए विएतनाम युद्ध सबसे बड़ी असफलता माना जाता है। ईरान भी विएतनाम युद्ध से काफी प्रेरणा ले रहा है। साल 1965 में लड़ा गया यह युद्ध कुल आठ साल लड़ा गया। इस दौरान 58 हजार अमेरिकी सैनिक मारे गए। वहीं, करीब 30 लाख विएतनामियों ने अपनी जान गंवाई थी। दक्षिणी विएतनाम के लिए लड़ रहे अमेरिका को मुंह की खानी पड़ी थी। बॉक्सर मोहम्मद अली जिन्ना समेत कई मशहूर शख्सियतों ने विएतनाम में अमेरिकी सेना की तरफ से लड़ने से इनकार कर दिया था।

साल 1991 में लड़ा गया खाड़ी युद्ध
34 देशों के एक अमेरिकी-नेतृत्व वाले गठबंधन ने करीब 100 घंटे के जमीनी युद्ध के बाद कुवैत से इराकी बलों को खदेड़ दिया। असल में सद्दाम हुसैन, कुवैत पर कब्जा करना चाहते थे, लेकिन उनकी मंशा पूरी नहीं हो पाई। इस युद्ध के बाद सद्दाम हुसैन इराक में सत्ता में बने रहे, लेकिन अंततः 2006 में एक मुकदमे के बाद उन्हें सत्ता से हटा दिया गया और फांसी दे दी गई। यह अमेरिका द्वारा इराक में दूसरे हस्तक्षेप का हिस्सा था। सऊदी अरब में छोड़े गए बड़े अमेरिकी सैन्य बेसों को ओसामा बिन लादेन द्वारा अमेरिका पर युद्ध घोषित करने के लिए बताए गए कारणों में से एक माना गया। माना जाता है कि यहीं से 9/11 की नींव भी पड़ी थी।

सोमालिया में लड़ाई
साल 1993 में सोमालिया में अमेरिका मानवीय मिशन के लिए पहुंचा था। उसका मकसद, अकाल के दौरान सशस्त्र मिलिशियाओं द्वारा खाद्य सहायता को जब्त होने से बचाना था। लेकिन जल्द ही यह बड़ी लड़ाई में बदल गया। अक्टूबर 1993 में मोगादिशु की सड़कों पर एक ही लड़ाई में अठारह अमेरिकी सैनिक मारे गए। इसके कुछ समय बाद अमेरिका ने यहां से वापस चला गया, लेकिन सोमालिया दो दशकों तक गृह युद्ध और अकाल में डूब गया।

US Missions

कोसोवो में साल 1999
अमेरिका ने कोसोवो प्रांत में जातीय अल्बानियों की हत्या को रोकने के लिए सर्बिया के खिलाफ 78-दिन का नाटो बमबारी अभियान चलाया। शांति बनाए रखने के लिए जमीनी सैनिकों की तैनाती की गई। हालांकि इस हस्तक्षेप को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद से कोई मंजूरी नहीं मिली क्योंकि रूस और चीन ने इसका विरोध कर दिया। कोसोवो ने 2008 में स्वतंत्रता की घोषणा की। लेकिन सर्बिया, रूस, चीन यहां तक कि खुद संयुक्त राष्ट्र भी इसे मान्यता नहीं देता।

साल 2001 में अफगानिस्तान
11 सितंबर 2001 को न्यूयॉर्क के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर आतंकी हमला हुआ। इस हमले के दोषियों की तलाश में अमेरिका ने अफगानिस्तान पर हमला बोला। हमले के कुछ हफ्तों के भीतर तालिबान की कट्टर इस्लामी सरकार गिर गई। बीस साल और खरबों डॉलर खर्च होने के बाद, तालिबान फिर सत्ता में लौट आए। साल 2021 में अमेरिका ने अफगानिस्तान छोड़ दिया था। हालांकि इन दिनों में अमेरिका ने अल-कायदा के नेता ओसामा बिन लादेन को मारने में सफलता पाई। साल 2001 से 2021 के बीच 2,459 अमेरिकी सैनिक अफगानिस्तान में मारे गए। वहीं, नाटो देशों के करीब 1000 सैनिक भी मारे गए। 18 सीआईए ऑपरेटिव्स मारे गए, 20,700 अमेरिकी सैनिक घायल हुए थे। वहीं, करीब 50 हजार अफगानी नागरिक भी मारे गए थे।

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इराक में साल 2003
अमेरिका ने साल 2003 में इराक पर हमला बोला। अमेरिका का दावा था कि सद्दाम हुसैन के शासन में इराक ने जनसंहार करने वाले हथियार बनाए हैं। हालांकि अमेरिका को एक भी हथियार नहीं मिला। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक इराक में 4492 अमेरिकी सैनिक मारे गए थे। वहीं, करीब दो लाख इराकी नागरिकों ने जान गंवाई थी। अमेरिकी रक्षा विभाग ने 2003 से 2012 के बीच 728 बिलियन डॉलर खर्च किए थे।

लिस्ट का अंत नहीं
अमेरिका द्वारा विभिन्न देशों के खिलाफ युद्धों की लिस्ट का अंत नहीं है। 1950 के दशक की शुरुआत में उत्तर के कम्युनिस्ट शासन ने हमला करने के बाद दक्षिण कोरिया की रक्षा करते हुए 36,000 से अधिक अमेरिकी मारे गए थे। आज भी अमेरिकी सैनिक दक्षिण कोरिया में तैनात हैं। उत्तर कोरिया, वह देश जिसे अमेरिका ने रोकने के लिए लड़ाई लड़ी, अब परमाणु हथियार रखता है। ऑनलाइन डेटाबेस पनामा (1989), ग्रेनेडा (1983), डोमिनिकन गणराज्य (1965), और हाइती (1994) को भी इसी तरह की त्वरित सैन्य सफलता, लेकिन सीमित स्थायी बदलाव के पैटर्न का हिस्सा बताते हैं।

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