खुद दो 'अजेय' समझ रहे थे डोनाल्ड ट्रंप, एक साल में निकली हेकड़ी; पार्टी पर बड़ा खतरा
सत्ता में एक साल पूरा करने के बाद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को सुप्रीम कोर्ट की फटकार, धीमी अर्थव्यवस्था और इमिग्रेशन नीतियों पर भारी जनविरोध का सामना करना पड़ रहा है। जानिए 'स्टेट ऑफ द यूनियन' से पहले क्यों बैकफुट पर हैं ट्रंप।

एक साल तक अमेरिका पर बिना किसी बड़ी बाधा के शासन करने के बाद, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अब कई मुश्किलों का सामना कर रहे हैं। मंगलवार को उनके 'स्टेट ऑफ द यूनियन' संबोधन से पहले, उन पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा टैरिफ पर रोक, इमिग्रेशन पर उनकी सख्ती के खिलाफ बिगड़ती जनभावना और बढ़ती आर्थिक चिंताओं का भारी दबाव है।
अपने भाषण में ट्रंप के पीछे हटने की संभावना नहीं है। 'स्टेट ऑफ द यूनियन' एक अमेरिकी राजनीतिक परंपरा है जहां राष्ट्रपति अमेरिकी कांग्रेस (संसद) के सामने अपनी उपलब्धियां और भविष्य का एजेंडा पेश करते हैं। लेकिन उनके दावों का डेमोक्रेट्स और विश्व के उन नेताओं पर अब कम असर होगा, जो अब तक उनके एजेंडे के आगे बेबस नजर आते थे।
सुप्रीम कोर्ट का झटका और धीमी अर्थव्यवस्था
टैरिफ पर रोक: शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने टैरिफ के मनमाने इस्तेमाल पर ट्रंप को कड़ी फटकार लगाई। ट्रंप अक्सर सोशल मीडिया पर एक साधारण आदेश के जरिए देशों पर टैरिफ लगा देते थे, ताकि व्यापार से बिल्कुल अलग कूटनीतिक मामलों में दबाव बनाया जा सके।
आर्थिक मंदी के संकेत: उसी दिन सरकारी आंकड़ों से पता चला कि अक्टूबर से दिसंबर की तिमाही में अमेरिकी अर्थव्यवस्था केवल 1.4 प्रतिशत की वार्षिक दर से बढ़ी, जो विश्लेषकों के 2.5 प्रतिशत के अनुमान से काफी कम है।
महंगाई और जीवन-यापन की चिंताएं
महंगाई के मुद्दे पर ट्रंप की रणनीति अब तक पीछे न हटने की रही है। गुरुवार को जॉर्जिया में एक भाषण के दौरान उन्होंने दावा किया- मैंने अफोर्डेबिलिटी (सामर्थ्य) जीत ली है। यानी ट्रंप का दावा है कि उन्होंने लोगों का जीवन आसान बना दिया है। लेकिन जॉर्ज वाशिंगटन यूनिवर्सिटी के राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर टॉड बेल्ट ने एएफपी को बताया कि आप अर्थव्यवस्था को सिर्फ बयानों से नहीं झुठला सकते। लोग जानते हैं कि वे क्या खर्च कर रहे हैं।
प्रोफेसर बेल्ट के अनुसार- जब लोगों को ऐसी बात बताई जाती है जो वे जानते हैं कि सच नहीं है, तो वे बहुत नाराज होते हैं। यह बात महंगाई और प्रवासियों पर सख्ती दोनों पर लागू होती है, क्योंकि कई अमेरिकियों को यह गलतफहमी थी कि इमिग्रेशन पर सख्ती केवल हिंसक अपराधियों को देश से निकालने पर केंद्रित होगी।
अमेरिकी मतदाता आर्थिक मुद्दों के प्रति बेहद संवेदनशील रहे हैं, जिसके कारण ट्रंप के पूर्ववर्ती जो बाइडेन को नुकसान उठाना पड़ा था, लेकिन अब यह रिपब्लिकन पार्टी के लिए भी खतरा बन गया है। नवंबर में होने वाले मध्यावधि चुनावों में प्रतिनिधि सभा और एक तिहाई सीनेट की सीटों पर चुनाव होंगे। ट्रंप पहले ही चेतावनी दे चुके हैं कि अगर डेमोक्रेट्स ने नियंत्रण हासिल कर लिया, तो वे उन पर महाभियोग चलाने की कोशिश कर सकते हैं।
क्या ट्रंप दबाव में पीछे हट रहे हैं?
हाल के दिनों में हमेशा आक्रामक रहने वाले ट्रंप भी कुछ मुद्दों पर नरम पड़ते या घिरते दिखे हैं।
नस्लवादी वीडियो विवाद: उनके 'ट्रुथ सोशल' अकाउंट पर देश के पहले अश्वेत राष्ट्रपति बराक ओबामा का एक नस्लवादी वीडियो पोस्ट किए जाने के बाद काफी विवाद हुआ। वाइट हाउस ने यह कहकर बचाव किया कि इसे एक अज्ञात सहयोगी ने पोस्ट किया था। इस मुद्दे पर कांग्रेस में ट्रंप के वफादार सदस्यों ने भी उनकी आलोचना की।
मिनियापोलिस में विरोध: मिनियापोलिस में केंद्रीय इमिग्रेशन एजेंटों द्वारा व्यापक अभियानों के दौरान दो अमेरिकी नागरिकों की गोली मारकर हत्या करने के बाद भारी विरोध प्रदर्शन हुए। इसके बाद प्रशासन को शहर में अपनी तैनाती कम करने की घोषणा करनी पड़ी।
ग्रीनलैंड विवाद: अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आर्कटिक में वाशिंगटन की सुरक्षा चिंताओं पर चर्चा करने के लिए अमेरिका-डेनमार्क-ग्रीनलैंड का एक कार्यसमूह स्थापित किया गया है। ट्रंप को ग्रीनलैंड पर कब्जा करने की अपनी धमकियों से पीछे हटना पड़ा है।
नया टैरिफ प्लान: सुप्रीम कोर्ट द्वारा उनके पिछले टैरिफ को खारिज किए जाने के बाद, ट्रंप ने अमेरिका में आयात पर 10 प्रतिशत का एक समान टैरिफ लगा दिया है। हालांकि, प्रशासन ने अदालत के फैसले को कानून की अवहेलना करार दिया है और टैरिफ लागू करने के अन्य तरीके खोजने की बात कही है।
इस बीच, ट्रंप की नीतियों को अदालतों में चुनौती देने की प्रक्रिया धीमी गति से आगे बढ़ रही है। हालांकि ट्रंप को फिलहाल झटके लगे हैं, लेकिन प्रतिनिधि सभा और सीनेट अभी भी रिपब्लिकन के नियंत्रण में हैं। और खुद ट्रंप 2029 तक व्हाइट हाउस में रहेंगे।
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