गुजरात HC ने दिया मेटा, गूगल व X समेत कई दिग्गज टेक कंपनियों को नोटिस, जानिए क्या है मामला?
इस PIL में याचिकाकर्ता ने डिजिटल प्लेटफॉर्म पर AI-जनरेटेड वीडियो के बड़े पैमाने पर बनने और फैलने से जुड़े मुद्दों को उठाया है, जिनके बारे में उसका कहना है कि ये सार्वजनिक व्यवस्था और एक स्वस्थ लोकतंत्र के कामकाज के लिए गंभीर खतरा पैदा करते हैं।

आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस (AI) से डीपफेक वीडियो बनाने और उन्हें प्रसारित करने में मामले में गुजरात हाई कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है और दिग्गज टेक कंपनियों मेटा इंडिया, गूगल, X, रेडिट और स्क्राइब्ड को नोटिस जारी किया है। उच्च न्यायालय ने ये नोटिस एक PIL (जनहित याचिका) पर सुनवाई करते हुए जारी किए। इस PIL में AI का गलत इस्तेमाल करके डीपफेक वीडियो और तस्वीरें बनाने और उनके प्रसारण करने पर रोक लगाने के लिए एक मजबूत रेगुलेटरी सिस्टम बनाने की मांग की गई है। चीफ जस्टिस सुनीता अग्रवाल और जस्टिस डीएन रे की डिवीजन बेंच ने टेक कंपनियों को नोटिस जारी करते हुए उनसे 8 मई तक जवाब मांगा है।
अदालत ने इन कंपनियों को यह निर्देश भी दिया है कि वे केंद्र सरकार के 'सहयोग' पोर्टल पर अनिवार्य रूप से जुड़ जाएं। ताकि गैर-कानूनी सामग्री को हटाने के संबंध में बेहतर तालमेल हो सके और समय-सीमा के भीतर कार्रवाई हो सके, जो कि सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 के नियमों के प्रावधानों का सख्ती से पालन करते हुए की जाएगी।
‘कंपनियों द्वारा दी जाने वाले प्रतिक्रियाएं बेहद महत्वपूर्ण’
कोर्ट ने इस बारे में जारी अपने आदेश में कहा, 'इन कंपनियों द्वारा दी गई प्रभावी और सार्थक प्रतिक्रियाएं ही कानूनी ढांचे के तहत उन पर लागू की गई 'ड्यू डिलिजेंस' (उचित सावधानी) की जिम्मेदारियों को पूरा करने के लिए बहुत जरूरी साबित होंगी।'
सुनवाई के दौरान केंद्र और गुजरात सरकार द्वारा हलफनामा दायर कर टेक कंपनियों की तरफ से किए जा रहे असहयोग के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि कुछ टेक प्लेटफॉर्म उन्हें जारी किए गए कानूनी नोटिसों का जवाब देने में अक्सर देर लगाते हैं, साथ ही बार-बार प्रक्रियात्मक अड़चनें आती हैं और नियमों का पालन नहीं किया जाता है।
कोर्ट ने केंद्र सरकार को जारी किया था नोटिस
इस मामले की पिछली सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने 24 फरवरी को गुजरात सरकार के साथ-साथ केंद्र (गृह मंत्रालय और इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय) को नोटिस जारी किए थे और इस मुद्दे पर उनसे जवाब मांगा था।
सरकार बोली- समाधान के लिए हमने बनाया 'सहयोग पोर्टल'
जवाब में कोर्ट को दिए अपने हलफनामे में केंद्र सरकार ने बताया कि अक्टूबर 2024 में उसने 'सहयोग पोर्टल' बनाया था। जिसका मकसद सभी अधिकृत कानून प्रवर्तन एजेंसियों और टेक कंपनियों को एक ही प्लेटफॉर्म पर लाकर, गैर-कानूनी सामग्री के खिलाफ तत्काल, समन्वित और समय-सीमा के भीतर कार्रवाई करना है। सरकार ने बताया कि इसका उद्देश्य गैर-कानूनी रूप से बनाई गई (सिंथेटिक) जानकारी को तेजी से हटाना है, और दोषी यूजर्स की पहचान करने के लिए सब्सक्राइबर की जानकारी, लॉग और न्यायिक सबूतों तक पहुंच सुनिश्चित करना है।
‘मेटा और गूगल ने दिया सहयोग, X की शिकायत की’
केंद्रीय गृह मंत्रालय ने कोर्ट को बताया कि जहां मेटा और गूगल जैसी कुछ इंटरमीडियरीज ने नियमों के पालन से जुड़ी कार्रवाई की गति, दक्षता और पता लगाने की क्षमता में काफी सुधार किया है, वहीं अन्य टेक कंपनियां अभी तक 'सहयोग पोर्टल' से जुड़ी नहीं हैं या पूरी तरह से एकीकृत नहीं हुई हैं। वहीं मंत्रालय ने विशेष रूप से X की शिकायत करते हुए उसके द्वारा गैर-कानूनी सामग्री (जिसमें सिंथेटिक रूप से बनाई गई जानकारी भी शामिल है) के संबंध में दी गई सूचनाओं पर कोई प्रतिक्रिया न देने का जिक्र किया।
सरकार ने बताई एक्स की शिकायत करने की वजह
मंत्रालय ने कोर्ट को बताया कि साल 2024 और 2026 के बीच X को गैर-कानूनी कंटेंट (जिसमें सिंथेटिक रूप से बनाई गई जानकारी भी शामिल है) के संबंध में कुल 94 सूचनाएं दी गई थीं, लेकिन केवल 13 सूचनाओं के जवाब में ही औपचारिक प्रतिक्रिया मिली।
यह जनहित याचिका विकास नायर नाम के शख्स ने दायर की है। इस PIL में याचिकाकर्ता ने डिजिटल प्लेटफॉर्म पर AI-जनरेटेड वीडियो के बड़े पैमाने पर बनने और फैलने से जुड़े मुद्दों को उठाया है, जिनके बारे में उसका कहना है कि ये सार्वजनिक व्यवस्था और एक स्वस्थ लोकतंत्र के कामकाज के लिए गंभीर खतरा पैदा करते हैं।
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