लाखों की फीस, 4 साल की मेहतन बेकार? 12वीं पास ने B.Tech वालों को दी टक्कर, आया चौंकाने वाला रिजल्ट
मशहूर उद्यमी श्रीनि राजू ने बीटेक डिग्री की अहमियत पर सवाल उठाते हुए कहा कि आज के समय में किताबी ज्ञान से कहीं ज्यादा जरूरी युवाओं की प्रैक्टिकल स्किल्स हैं।

आज के दौर में हर दूसरा नौजवान इंजीनियर बनने का सपना देखता है। लाखों रुपये की फीस, चार साल की कड़ी मेहनत, प्रोजेक्ट्स और ढेरों असाइनमेंट्स ये सभी एक बीटेक के छात्रों के लिए आम बात लगती है। इन सबके बाद जब हाथों में बीटेक की डिग्री आती है तो लगता है जैसे जिंदगी सेट हो गई हो। लेकिन क्या हो अगर कोई आपसे कहे कि इस चार साल की डिग्री की कॉर्पोरेट दुनिया में कोई खास अहमियत नहीं बची है? यह बात किसी आम इंसान ने नहीं, बल्कि जाने-माने आंत्रप्रेन्योर और वेंचर कैपिटलिस्ट श्रीनि राजू ने कही है। उनका यह बयान इंटरनेट पर आग की तरह फैल गया है।
हाल ही में 'रॉ टॉक्स विद वीके' पॉडकास्ट पर बातचीत करते हुए श्रीनि राजू ने बड़ी बेबाकी से अपनी राय रखी। उनका मानना है कि इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने वाले छात्र अपनी जिंदगी के कई कीमती साल सिर्फ एक सर्टिफिकेट हासिल करने में लगा देते हैं। लेकिन जब बात असल दुनिया में काम करने की आती है, तो उनके पास उन प्रैक्टिकल स्किल्स की भारी कमी होती है जिनकी कंपनियों को सबसे ज्यादा तलाश होती है। राजू ने तो यहां तक कह दिया कि कई मामलों में बीटेक की डिग्री अब इस बात का पैमाना ही नहीं रही कि सामने वाला शख्स नौकरी के लिए कितना तैयार है।
कंपनी के भीतर हुआ एक हैरान करने वाला प्रयोग
अपनी बात को वजनदार बनाने के लिए राजू ने अपनी ही कंपनी में किए गए एक बेहद दिलचस्प एक्सपेरिमेंट का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि उनकी कंपनी ने काम के लिए दो अलग-अलग ग्रुप बनाए। पहले ग्रुप में 30 ऐसे युवाओं को रखा गया जिन्होंने सिर्फ इंटरमीडिएट तक पढ़ाई की थी। वहीं, दूसरे ग्रुप में 30 बीटेक पास आउट शामिल थे। इन दोनों ही ग्रुप्स को पूरे एक साल तक बिल्कुल एक जैसी ट्रेनिंग दी गई।
जब ट्रेनिंग का वक्त पूरा हुआ, तो राजू ने अपनी टीम से दोनों ग्रुप्स के काम और प्रोडक्टिविटी का आकलन करने को कहा। नतीजे इतने हैरान करने वाले थे कि खुद राजू भी सोच में पड़ गए। उन्होंने पॉडकास्ट में बताया, "मेरी कंपनी की टीम ने वापस आकर मुझे बताया कि दोनों ग्रुप्स के काम करने की क्षमता में वर्चुअली कोई फर्क नहीं था।" यानी चार साल की इंजीनियरिंग और सिर्फ 12वीं पास युवाओं का आउटपुट एक बराबर था। इसी नतीजे ने उन्हें यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि क्या सच में छात्रों का वो चार साल सिर्फ एक डिग्री पाने में लगाना सही है?
डिग्री से ज्यादा जरूरी है सीखने की ललक
हालांकि, बात को आगे बढ़ाते हुए राजू ने यह भी साफ किया कि वह पूरी तरह से पढ़ाई या एजुकेशन के खिलाफ नहीं हैं। उनका असल मुद्दा कुछ और है। वो कहते हैं कि आज के तेजी से बदलते जॉब मार्केट में आपके पास कौन सी डिग्री है, इससे कहीं ज्यादा ये मायने रखता है कि आपके अंदर नई चीजें सीखने की कितनी भूख है। आपकी स्किल्स, काम के माहौल में ढल जाने की आपकी काबलियत और कुछ नया कर गुजरने का जज्बा किसी भी डिग्री से ज्यादा बड़ा रोल प्ले करते हैं।
लोगों ने दी प्रतिक्रिया
जैसे ही राजू का ये वीडियो इंटरनेट पर आया, लोगों ने इस पर अपनी-अपनी प्रतिक्रियाएं देनी शुरू कर दीं। सोशल मीडिया पर मानों बहस का एक नया मोर्चा खुल गया। बहुत से यूजर्स ने इस बात से पूरी सहमति जताई कि किताबी ज्ञान और इंडस्ट्री की मांग के बीच एक बहुत बड़ी खाई पैदा हो गई है। एक यूजर ने बड़ी ही समझदारी से कमेंट करते हुए लिखा कि डिग्री से ज्यादा इस बात का फर्क पड़ता है कि जॉब किस तरह की है। यूजर के मुताबिक, अगर बात बड़ी सर्विस-बेस्ड आईटी कंपनियों की हो, जहां काम करने का एक तय प्रोसेस होता है, तो वहां बिना किसी बड़ी इंजीनियरिंग डिग्री वाले लोग भी आसानी से काम कर सकते हैं। लेकिन अगर बात ऐसी प्रोडक्ट-बेस्ड कंपनियों की हो जहां हर रोज कुछ नया इनोवेट करना होता है, तो वहां यकीनन मजबूत इंजीनियरिंग बेसिक्स की जरूरत होती है।
बहस सिर्फ यहीं नहीं रुकी। एक अन्य यूजर का कहना था कि हमारे देश का एजुकेशन सिस्टम बहुत पुराना हो चुका है। हमारे यहां आज भी सारा जोर सिर्फ रट्टा मारने, इम्तिहान पास करने और नंबर लाकर डिग्री जमा करने पर होता है। नतीजा ये होता है कि एक ग्रेजुएट और एक नॉन-ग्रेजुएट का प्रैक्टिकल ज्ञान लगभग एक जैसा ही रह जाता है, क्योंकि स्किल्स डेवलप करने पर तो कभी ध्यान ही नहीं दिया गया।
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