इजरायल को बैकफायर कर सकती है खुद की बनाई रणनीति, कैसे ईरान युद्ध में उल्टा पड़ सकता है ये दांव
इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू का कहना है कि ईरान के शीर्ष नेताओं की हत्या का मकसद सरकार को कमजोर करना है, ताकि वहां की जनता खुद आवाज उठाकर सरकार को बदल दे। लेकिन अभी तक ऐसा कोई संकेत नहीं मिला है।

Iran War: बीते 28 फरवरी को इजरायल और अमेरिका ने जब से ईरान पर हमला किया है, ईरान का शीर्ष नेतृत्व लगभग तबाह हो चुका है। हमले के पहले ही दिन इजरायल ने खुफिया मदद से ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई को परिवार समेत मार डाला। इसके बाद से इजरायल रुका नहीं है और बीते दिनों ईरानी खुफिया मंत्री इस्माइल खातीब, ईरान के शीर्ष सुरक्षा अधिकारी अली लारीजानी और रिवोल्यूशनरी गार्ड के बासिज बल के प्रमुख जनरल गुलाम रजा सुलेमानी समेत कई टॉप कमांडरों और लीडरों को मार गिराया है। हालांकि जानकारों की मानें तो यह रणनीति इजरायल को बैकफायर कर सकती है।
विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि ईरान के शीर्ष नेतृत्व को निशाना बनाए जाने की रणनीति उलटी पड़ सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह की टारगेट किलिंग से तुरंत सफलता तो दिखती है, लेकिन इससे संघर्ष की जड़ समस्या खत्म नहीं होती। सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज के जॉन ऑल्टरमैन के मुताबिक, ऐसे हमलों का असर समय के साथ कम हो जाता है। उन्होंने कहा है कि ईरान की सरकार और सेना कई संस्थाओं से मिलकर बनी है, जो लगातार हमलों के बावजूद टिके हुए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि टॉप नेताओं की हत्या से ईरान में ज्यादा कट्टर नेतृत्व भी उभर सकता है या देश में अराजकता फैल सकती है।
क्या कहता है इतिहास?
इजरायल ने अतीत में भी कई बार ऐसे टारगेट हमले किए हैं, लेकिन फिलिस्तीनी और लेबनानी संगठन समय के साथ और मजबूत होकर उभरे हैं। 1992 में हिजबुल्लाह के नेता अब्बास मुसावी की हत्या के बाद नसरल्लाह के नेतृत्व में संगठन और ताकतवर बन गया और 2006 में इजरायल के साथ लंबी लड़ाई लड़ी। इसी तरह हमास के संस्थापक शेख अहमद यासीन की 2004 में हत्या के बाद भी संगठन खत्म नहीं हुआ।
जानकारों ने चेताया
इजरायल के पूर्व खुफिया अधिकारी योसी कुपरवासर का कहना है कि यह रणनीति कुछ हद तक असरदार हो सकती है, लेकिन यह सभी समस्याओं का हल नहीं है। इससे दुश्मन कमजोर तो होता है, लेकिन उसकी हमले करने की क्षमता पूरी तरह खत्म नहीं होती। विशेषज्ञों का कहना है कि नेताओं की हत्या से कई बार उनके समर्थक और ज्यादा उग्र हो जाते हैं और नए, ज्यादा कट्टर नेता सामने आ जाते हैं। नॉर्थईस्टर्न यूनिवर्सिटी के मैक्स अब्राह्म्स के अनुसार, ऐसे हमलों के बाद कई जगह आम लोगों के खिलाफ हिंसा बढ़ जाती है। उनका कहना है कि अगर किसी संयम रखने वाले नेता को हटा दिया जाए, तो उसके बाद ज्यादा आक्रामक रणनीति अपनाई जा सकती है।
ईरान ने जारी रखे हैं हमले
इस बीच ईरान में अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत के उनके बेटे मोजतबा ने ली है, जिन्हें और ज्यादा कट्टरपंथी माना जाता है। फिलहाल ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड्स इजरायल और खाड़ी देशों पर लगातार मिसाइल हमले कर रहे हैं और होरमुज जलडमरूमध्य भी प्रभावी रूप से बंद हो गया है। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कहा है कि अमेरिका और इजरायल इस बात को समझने में नाकाम रहे हैं कि इस्लामी गणराज्य ईरान की राजनीतिक व्यवस्था एक सुदृढ़ ढांचे पर आधारित है, जिसमें स्थापित राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक संस्थान मौजूद हैं और किसी एक नेता की हत्या से इस व्यवस्था पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। उन्होंने यह भी कहा कि लारिजानी की इजरायल हत्या से ईरान के नेतृत्व को कोई निर्णायक क्षति नहीं पहुंचेगी।
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