ट्रंप और ईरान को एक मेज पर कैसे ले आए शहबाज और मुनीर? दांव पर लगी पाकिस्तान की रोजी-रोटी
मिडिल ईस्ट युद्धविराम में पाकिस्तान बना मुख्य मध्यस्थ। अमेरिका और ईरान के बीच ऐतिहासिक सीजफायर और इस्लामाबाद में होने वाली आगामी शांति वार्ता की पूरी इनसाइड स्टोरी और कूटनीतिक मायने पढ़ें।
मध्य पूर्व में चल रहे युद्ध को समाप्त करने के लिए एक अस्थायी युद्धविराम पर सहमति बनी है। इस शांति वार्ता की मेजबानी करने के मामले में ईरान और अमेरिका के बीच पाकिस्तान एक प्रमुख मध्यस्थ के रूप में सामने आया है। बुधवार को पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने घोषणा की कि उनकी सरकार की मध्यस्थता के बाद अमेरिका और ईरान- साथ ही उनके सहयोगी हर जगह युद्धविराम लागू करने के लिए सहमत हो गए हैं। शरीफ ने कहा कि यह दो सप्ताह का युद्धविराम अब पाकिस्तान की राजधानी में आगे की बातचीत का मार्ग प्रशस्त करेगा।
इस पूरे संघर्ष में पाकिस्तान के बिचौलिया बनने की सबसे बड़ी वजह ये भी है कि इस आर्थिक रूप से कंगाल देश की रोजी-रोटी दांव पर लगी हुई है। ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को बंद कर रखा है जिससे पाकिस्तान में तेल और गैस की सप्लाई ठप है। पाकिस्तान में पेट्रोल-डीजल की कीमतें आसमान छू रही हैं। ऐसे में अगर युद्ध लंबा खिंचता तो पाकिस्तान के लिए सर्वाइव करना और भी मुश्किल हो जाता।
कंगाली और रोजी-रोटी का सवाल: क्यों पड़ा पाकिस्तान बीच में?
पाकिस्तान इस समय अपने इतिहास के सबसे बुरे आर्थिक दौर से गुजर रहा है। देश में न तेल है और न ही अवाम के लिए सस्ती रोटी, जिससे आम जनता त्राहि-त्राहि कर रही है। बिजली संकट गहराया। सड़कों पर विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए। अर्थव्यवस्था पर भारी असर पड़ा- रोजगार, व्यापार और आम आदमी की रोजी-रोटी खतरे में पड़ गई। शहबाज सरकार और पाकिस्तानी फौज के प्रमुख असीम मुनीर को देश चलाने और खजाना भरने के लिए किसी भी कीमत पर विदेशी फंड और अमेरिका की कृपा चाहिए। पाकिस्तान ने इसी आर्थिक संकट को देखते हुए डिप्लोमेसी तेज की। हालांकि विशेषज्ञों का ये भी मानना है कि शहबाज और मुनीर ने केवल ट्रंप के 'पोस्टमैन' का काम किया। असली गेम चीन ने सेट किया।
दक्षिण एशिया के विशेषज्ञ माइकल कुगलमैन ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर लिखा- पाकिस्तान ने हाल के वर्षों में अपनी सबसे बड़ी कूटनीतिक जीतों में से एक हासिल की है। इसने उन तमाम आलोचकों और संशयवादियों को भी गलत साबित कर दिया है, जिनका मानना था कि पाकिस्तान के पास इतने जटिल और उच्च जोखिम वाले कूटनीतिक कार्य को अंजाम देने की क्षमता नहीं है।
ईरान के साथ पाकिस्तान के कैसे हैं संबंध?
पाकिस्तान के पूर्व राजदूत आसिफ दुर्रानी के अनुसार इस पूरे क्षेत्र में केवल पाकिस्तान ही एकमात्र ऐसा देश है जिसके अमेरिका और ईरान दोनों के साथ अच्छे और मजबूत संबंध हैं। पाकिस्तान दक्षिण-पश्चिम में ईरान के साथ 900 किलोमीटर लंबी सीमा साझा करता है। दोनों देशों के बीच गहरे ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और धार्मिक संबंध हैं।
ईरान के बाद पाकिस्तान दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी शिया मुस्लिम आबादी वाला देश है। 1947 में बंटवारे के बाद पाकिस्तान को मान्यता देने वाला ईरान पहला देश था और पाकिस्तान ने 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद ईरान का समर्थन कर यह एहसान चुकाया था। अमेरिका की राजधानी वाशिंगटन में ईरान का अपना कोई दूतावास नहीं है, इसलिए पाकिस्तान वहां ईरान के कुछ कूटनीतिक हितों का प्रतिनिधित्व करता है।
अमेरिका के साथ पाकिस्तान के रिश्ते
पाकिस्तान के शक्तिशाली सेना प्रमुख, फील्ड मार्शल असीम मुनीर ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ एक अच्छा व्यक्तिगत तालमेल स्थापित किया है। पिछले साल जब भारत के केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में पाकिस्तान समर्थित आतंकियों ने नरसंहार किया था तब भारत ने पाकिस्तान पर सैन्य कार्रवाई की थी। इस दौरान जब भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव बढ़ा था, तब मुनीर ने सैन्य वर्दी के बजाय पश्चिमी बिजनेस सूट पहनकर प्रधानमंत्री शरीफ के साथ वाशिंगटन का दौरा किया था। शरीफ ने तब ट्रंप के साहसिक और दूरदर्शी हस्तक्षेप की प्रशंसा की थी, जबकि मुनीर ने कहा था कि दोनों परमाणु संपन्न देशों के बीच तनाव रोकने के लिए ट्रंप को नोबेल शांति पुरस्कार मिलना चाहिए।
ईरान के मामले पर, ट्रंप का मानना है कि पाकिस्तान इस देश को अन्य देशों की तुलना में बेहतर समझता है। हालांकि, 9/11 के बाद आतंकवाद के खिलाफ युद्ध में गैर-नाटो सहयोगी होने के बावजूद पाकिस्तान पर अमेरिका ने अक्सर सीमा पार आतंकवादियों को पनाह देने के आरोप लगाए। 2011 में जब अमेरिकी सेना ने इस्लामाबाद को बताए बिना पाकिस्तान में अल-कायदा प्रमुख ओसामा बिन लादेन को मार गिराया था, तब दोनों देशों के रिश्ते बेहद तनावपूर्ण हो गए थे।
अन्य क्षेत्रीय खिलाड़ियों की भूमिका
सऊदी अरब: पाकिस्तान और सऊदी अरब ने 2025 में एक रणनीतिक पारस्परिक रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। इस समझौते ने उनके पुराने संबंधों को तो मजबूत किया, लेकिन इससे यह भी सीमित हो गया कि पाकिस्तान ईरान का किस हद तक समर्थन कर सकता है। प्रधानमंत्री शरीफ ने हाल ही में सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान से मुलाकात कर रियाद को विश्वास में लिया है।
चीन: पाकिस्तान के बीजिंग के साथ भी गहरे संबंध हैं। राष्ट्रपति ट्रंप ने माना है कि चीन ने ईरान को बातचीत की मेज पर लाने में मदद की है। चीन, जो कि ईरान का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है, ने पाकिस्तान की इस अनूठी और महत्वपूर्ण भूमिका का खुला समर्थन किया है।
कूटनीतिक बैठकें: पिछले महीने पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार ने तनाव कम करने के लिए सऊदी अरब, तुर्की और मिस्र के अपने समकक्षों के साथ बैठक की थी और इसके बाद वे चीन भी गए थे।
इस मध्यस्थता में पाकिस्तान का क्या फायदा है?
पाकिस्तान के लिए इस मामले में तटस्थ रहना आर्थिक दृष्टिकोण से जरूरी है। पाकिस्तान अपनी ऊर्जा जरूरतों (तेल और गैस) के लिए स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के आयात पर निर्भर है। वह अपने पड़ोस में किसी भी नए संघर्ष में उलझने से बचना चाहता है। यदि युद्ध जारी रहता, तो ईंधन की आपूर्ति बाधित होती, कीमतें बढ़तीं और पहले से ही आर्थिक तंगी से जूझ रही पाकिस्तानी सरकार को और भी कड़े कदम उठाने पड़ते। युद्ध की स्थायी समाप्ति से न केवल क्षेत्रीय स्थिरता आएगी, बल्कि वैश्विक स्तर पर पाकिस्तान की छवि भी सुधरेगी। यह पाकिस्तान के लिए इसलिए भी अहम है क्योंकि वह हाल ही में अफगानिस्तान के साथ सीमा संघर्ष में उलझा है और भारत के साथ भी उसके संबंध तनावपूर्ण रहे हैं।
आगे पाकिस्तान की क्या भूमिका होगी?
पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ने कहा है कि वह 10 अप्रैल से इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के प्रतिनिधिमंडलों का स्वागत करेंगे। पूर्व राजदूत दुर्रानी का मानना है कि ईरान इस्लामाबाद में खुद को ज्यादा सहज महसूस करेगा, इसीलिए उसने पाकिस्तान की मध्यस्थता स्वीकार की है। अगर दोनों देशों के बीच सीधी बातचीत के दौरान कोई गतिरोध आता है, तो पाकिस्तान दोनों पक्षों के बीच भाषा और शर्तों को सुलझाने में मदद कर सकता है। जरूरत पड़ने पर पाकिस्तानी अधिकारी एक संदेशवाहक के रूप में भी काम कर सकते हैं।
एक बड़ी चुनौती (इजरायल और लेबनान का पेंच)
पाकिस्तान आधिकारिक तौर पर इजरायल को मान्यता नहीं देता है। इजरायल ने ट्रंप के बमबारी रोकने के फैसले का समर्थन तो किया है, लेकिन उसका कहना है कि इस दो सप्ताह के युद्धविराम में लेबनान शामिल नहीं है, जहां इजरायल ईरान समर्थित हिजबुल्लाह के खिलाफ जमीनी और हवाई हमले कर रहा है। इजरायल का यह दावा प्रधानमंत्री शरीफ के उस बयान के बिल्कुल उलट है, जिसमें उन्होंने कहा था कि यह युद्धविराम लेबनान सहित हर जगह लागू होगा।
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