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अमेरिका-ईरान टॉक्स में पाकिस्तान बना 'की प्लेयर', भारत के लिए खतरे की घंटी?

ईरान और अमेरिका के बीच सीजफायर लागू होने के बाद ट्रंप और ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची, दोनों ने पाकिस्तान की सराहना की। ट्रंप ने युद्धविराम का श्रेय प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और फील्ड मार्शल आसिम मुनीर से हुई बातचीत को दिया।

Thu, 9 April 2026 12:53 AMDevendra Kasyap लाइव हिन्दुस्तान
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अमेरिका-ईरान टॉक्स में पाकिस्तान बना 'की प्लेयर', भारत के लिए खतरे की घंटी?

पाकिस्तान अमेरिका और ईरान के बीच एक अहम मध्यस्थ की भूमिका निभाते हुए अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के केंद्र में आ गया है। पाकिस्तानी सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर और प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने दो सप्ताह के युद्धविराम की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण योगदान दिया। शुक्रवार को दोनों देशों के प्रतिनिधिमंडलों के बीच वार्ता के लिए इस्लामाबाद में मंच तैयार किया गया है। नई दिल्ली में इस घटनाक्रम को लेकर साफ बेचैनी दिख रही है। आधिकारिक तौर पर माना जा रहा है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप शांति का रास्ता चाहते थे और पाकिस्तान ने तुरंत मदद की पेशकश की। हालांकि, घटनाओं का क्रम बताता है कि इस्लामाबाद ने सुनियोजित रणनीति के तहत ऐसे कदम उठाए, जिनसे उसे अपनी क्षमता से कहीं ज्यादा कूटनीतिक प्रभाव हासिल हुआ।

ईरान और अमेरिका के बीच सीजफायर लागू होने के बाद ट्रंप और ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची, दोनों ने पाकिस्तान की सराहना की। ट्रंप ने युद्धविराम का श्रेय प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और फील्ड मार्शल आसिम मुनीर से हुई बातचीत को दिया। वहीं, अराघची ने युद्ध समाप्त करने के अथक प्रयासों के लिए मुनीर और शरीफ को 'प्रिय भाइयों' कहते हुए कृतज्ञता और प्रशंसा जताई। शरीफ ने युद्धविराम हासिल करने में अमूल्य समर्थन देने के लिए चीन, सऊदी अरब, तुर्की, मिस्र और कतर का शुक्रिया अदा किया। उन्होंने खाड़ी सहयोग परिषद के देशों और अमेरिकी नेतृत्व को भी शांति स्थापित करने में उनकी रणनीतिक दूरदर्शिता और धैर्य के लिए धन्यवाद दिया।

कई हफ्तों की कूटनीति और अब सफलता

पाकिस्तान के प्रमुख अखबार डॉन की रिपोर्ट के अनुसार, युद्धविराम की घोषणा से पहले दो सप्ताह से ज्यादा समय तक गहन और ज्यादातर गुप्त कूटनीतिक प्रयास चले। 28 फरवरी को संघर्ष शुरू होने के तुरंत बाद इस्लामाबाद ने सक्रिय कदम उठाए। पहले हमलों के कुछ ही दिनों में पाकिस्तानी अधिकारियों ने कई राजधानियों में राजनयिक संपर्क स्थापित कर लिए। सार्वजनिक रूप से तटस्थ रहते हुए पाकिस्तान ने चुपचाप खुद को वाशिंगटन और तेहरान के बीच एक पुल के रूप में स्थापित किया।

रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तानी प्रयासों का सबसे प्रमुख चरण 29-30 मार्च को सामने आया, जब पाकिस्तान, सऊदी अरब, मिस्र और तुर्की के विदेश मंत्रियों की इस्लामाबाद में बैठक हुई। विदेश मंत्री इशाक डार की अध्यक्षता में हुई इन बैठकों का मकसद सैन्य तनाव को बढ़ने से रोकना और अमेरिका-ईरान वार्ता के लिए ढांचा तैयार करना था। इसके बाद इस्लामाबाद में सुनियोजित वार्ता की रूपरेखा तैयार की गई। हालांकि तत्काल बातचीत नहीं हो सकी, लेकिन पाकिस्तान ने अपनी पहुंच बढ़ाने के बजाय उसे और मजबूत किया।

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फील्ड मार्शल मुनीर ने राष्ट्रपति ट्रंप समेत वरिष्ठ अमेरिकी अधिकारियों से बात की, जबकि प्रधानमंत्री शरीफ ने वाशिंगटन, मॉस्को, बीजिंग, यूरोपीय राजधानियों, खाड़ी देशों, तुर्की, मिस्र और सऊदी अरब के एक दर्जन से ज्यादा नेताओं से संपर्क साधा। पाकिस्तानी अधिकारी ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर से जुड़े अधिकारियों सहित ईरानी समकक्षों के साथ निरंतर संपर्क में रहे। अप्रैल की शुरुआत में इस्लामाबाद ने एक युद्धविराम ढांचा प्रसारित किया, जिसमें शत्रुता तुरंत रोकने और प्रमुख समुद्री मार्गों के आसपास तनाव कम करने का प्रस्ताव था।

बढ़ते सैन्य और राजनीतिक दबाव तथा क्षेत्रीय युद्ध के डर के बीच पाकिस्तानी प्रस्ताव को समर्थन मिला और 7 अप्रैल को युद्धविराम लागू हुआ। अब अगले चरण की वार्ता 10 अप्रैल को इस्लामाबाद में होने की उम्मीद है, जहां दोनों पक्ष टिकाऊ शांति व्यवस्था पर चर्चा करेंगे।

टेंशन में क्यों है नई दिल्ली?

अब सवाल उठ रहा है कि ईरान-अमेरिका सीजफायर के बाद नई दिल्ली टेंशन में क्यों है? दरअसल, पिछले साल मई में ट्रंप द्वारा ऑपरेशन सिंदूर के दौरान युद्धविराम की घोषणा और पाकिस्तान समर्थित मध्यस्थता के उनके दावों के बाद से ही नई दिल्ली सतर्क है। दिल्ली को चिंता है कि पाकिस्तान, जिसे भारत ने कूटनीतिक रूप से अलग-थलग करने की कोशिश की, अब अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के गलियारों में प्रमुख स्थान बना चुका है। कई हलकों में तो विदेश मंत्री एस. जयशंकर की पाकिस्तान को 'दलाल' कहने वाली टिप्पणी को उचित नहीं माना जा रहा है। खाड़ी क्षेत्र में काम कर चुके एक पूर्व भारतीय राजनयिक ने कहा कि अगर अमेरिका-ईरान वार्ता आगे बढ़ी और हमारे सहयोगी देश शामिल हुए, तो भारत के लिए पाकिस्तान को अलग-थलग रखना या उसे खलनायक साबित करना मुश्किल हो जाएगा, खासकर हमारी ऊर्जा जरूरतों और क्षेत्र पर निर्भरता को देखते हुए।

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