अमेरिका के खिलाफ युद्ध में ईरान की ‘सद्दाम हुसैन’ वाली चाल, दशकों तक लड़ाई को तैयार
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बच्चों का सैन्य तरीके से सबसे ज्यादा उपयोग इराक के तानाशाह सद्दाम हुसैन ने किया था। सद्दाम के इस फैसले के पीछे सबसे बड़ा उद्देश्य भविष्य के लिए एक कट्टर और वफादार सेना तैयार करने करना था। अमेरिका के साथ युद्ध में मौजूद ईरान भी उसी रास्ते पर है।

IRAN US ISRAEL WAR UPDATE: पश्चिम एशिया में जारी संकट पूरी दुनिया के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है। 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल ने तेहरान पर हमला बोलते समय यह अंदाजा लगाया था कि यह युद्ध कुछ ही दिनों में खत्म हो जाएगा। लेकिन ईरान की सैन्य योजना और होर्मुज पर पाबंदी की वजह से अमेरिका इस युद्ध में फंसता हुआ नजर आ रहा है। दूसरी तरफ ईरान अपनी ताकत को मजबूत कर रहा है। अमेरिका की तरफ से ईरान की जमीन पर सैनिक उतरने की आशंका को देखते हुए तेहरान ने कहा गया है कि उसके 10 लाख सैनिक अमेरिकियों का स्वागत करने के लिए तैयार हैं। इस युद्ध के दौरान ईरान ने सद्दाम हुसैन वाली एक चाल भी तैयार कर ली है। तेहरान ने बताया है कि अब ईरानी सेना में भर्ती होने की उम्र को घटाकर 12 साल कर दिया गया है। यानि कि अब नाबालिग बच्चे भी ईरान की सेना की मदद करते हुए दिखेंगे। तेहरान के इस फैसले पर दुनिया के तमाम देशों ने आपत्ति जताई है।
सेना में बच्चों को भर्ती करने का काम दुनिया के कई देश करते रहे हैं। अफ्रीकी देशों में मौजूद कई उग्रवादी संगठन अक्सर अपने उद्देश्यों को पूरा करने के लिए बच्चों का सहारा लेते हैं। दूसरे विश्व युद्ध में हिटलर ने भी जर्मनी के 12 से 14 साल के बच्चों को सेना में भर्ती किया, शुरुआत में इनका काम केवल मदद करना था, लेकिन बाद में इन्हें भी मोर्चों पर भेजा जाने लगा। बर्लिन में सोवियत सेना का मुकाबला करते हुए कई नाबालिग सैनिक मारे गए थे। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बच्चों का सैन्य तरीके से सबसे ज्यादा उपयोग इराक के तानाशाह सद्दाम हुसैन ने किया था। सद्दाम के इस फैसले के पीछे सबसे बड़ा उद्देश्य भविष्य के लिए एक कट्टर सेना तैयार करने करना था।
विशेषज्ञों की मानें, तो नाबालिगों की मानसिकता को सैन्य अनुशासन और विचारधारा से जोड़ना, लंबे समय तक समाज के चरित्र को बदल सकता है। इससे एक ऐसे समाज का निर्माण होता है, जो उसी विचारधारा के अनुरूप ढलता चला जाता है।
भविष्य के कट्टर वफादार सैनिक
इराक में सत्ता पर बैठने के बाद तानाशाह सद्दाम हुसैन ने 'अशबाल सद्दाम' नाम से एक संगठन तैयार किया था। हिंदी में इसका मतलब 'सद्दाम के शावक' होता है। यह संगठन सीधे सद्दाम की पार्टी बाथ के नियंत्रण में था। इसमें 10 से लेकर 15 साल तक के बच्चों को भर्ती किया गया था। इस संगठन में मुख्य तौर पर बच्चों को सैन्य प्रशिक्षण, वैचारिक व्रैनवॉश और सद्दाम के प्रति वफादार रहने का संदेश दिया जाता था। सद्दाम के इस संगठन का मुख्य काम केवल भविष्य के लिए एक कट्टर सेना तैयार करना ही नहीं था, बल्कि एक ऐसा समाज तैयार करना था, जो कि सद्दाम को ही अपने लीडर के रूप में माने।
अमेरिका के खिलाफ लड़ाई में ईरान भी सद्दाम की ही इस राह पर नजर आ रहा है। ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड्स् कॉर्प्स ने युद्ध से जुड़ी सहायक गतिविधियों में भाग लेने के लिए न्यूनतम आयु को घटाकर 12 वर्ष कर दिया गया है। तेहरान का कहना है कि इन बच्चों का उपयोग गश्त, चेकपाइंट और लॉजिस्टिक्स जैसी सहायक भूमिकाओं के लिए किया जाएगा। दावा किया जा रहा है कि यह बच्चे अपनी मर्जी से इसमें भर्ती हो रहे हैं। आज जिन बच्चों की उम्र 12 से 15 साल है, वह आने वाले तीन से चार दशक तक ईरान की इस्लामिक सत्ता के प्रति वफादार रहने वाले हैं।
हालांकि, यह पहली बार नहीं है, जब ईरान ने बच्चों को सैन्य अभियानों के लिए भर्ती किया हो। इससे पहले भी जब 2022 में महसा अमीनी वाला आंदोलन हुआ था, तब भी कुछ बच्चे सैन्य ड्रेस पहने दिखे थे।
इराक के सैनिकों का कुवैत में आतंक
सद्दाम हुसैन के नेतृत्व में 2 अगस्त 1990 को कुवैत पर धावा बोल दिया। इस हमले में कथित तौर पर इराक ने 1 लाख से ज्यादा सैनिकों का इस्तेमाल किया। इनमें एक बड़ी संख्या में नाबालिग सैनिक शामिल थे। कुवैत युद्ध को लेकर सामने आई कई रिपोर्ट्स के मुताबिक इन सैनिकों ने कुवैत में जमकर उत्पात मचाया। महिलाओं के साथ बलात्कार किया और सैकड़ों लोगों को मार दिया गया। 1991 में अमेरिकी सेना द्वारा जब तक इराकी सैनिकों को वहां से निकाल नहीं दिया गया, तब तक कुवैत ने इन सैनिकों का वहशीपन देखा। वाशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक इन सैनिकों ने पूरे शहर में आतंक का माहौल बनाकर रखा था। यह किसी मध्यकालीन और असामाजिक सैन्य तंत्र की तरह व्यवहार कर रहे थे।
इराक में ISIS का उभार
1979 में सत्ता में आए सद्दाम हुसैन ने 2003 तक ईरान पर शासन किया। अमेरिका के नेतृत्व में आई वैश्विक सेना ने आखिरकार सद्दाम की सत्ता का खात्मा कर दिया। इराकी सेना को भंग कर दिया गया। पिछले दो दशक से सद्दाम के साथ मिलकर अमेरिका के खिलाफ लड़ रहे बच्चे और जवानों के लिए सबसे बड़े दुश्मन पश्चिमी देश बन गए थे। 2006 में जब सद्दाम हुसैन को फांसी दी गई, तो उसके बाद इन सालों से युद्ध में मंझे हुए सैनिकों ने मोर्चा खोल दिया। सद्दाम के लिए वफादारी और इस्लाम की कट्टर विचार धारा के आधार पर दुनिया के सबसे खतरनाक आतंकी संगठन आईएसआईएस की शुरुआत हो गई।
इस आतंकी संगठन में इराक की सेना के पुराने सैनिक शामिल हुए, जिन्होंने यूरोपीय और अमेरिकी लोगों को जमकर निशाना बनाया। इस संगठन ने भी बच्चों को अपनी सेना में शामिल करके इन्हें 'खलीफत के शावक' कहना शुरू कर दिया। सद्दाम के खिलाफ लड़ने आए अमेरिका और उसके साथी दलों को इस संगठन के खिलाफ भी एक लंबी और खूनी लड़ाई लड़नी पड़ी। धीरे-धीरे करके हजारों लोगों की मौत और दमन के बाद अमेरिका को यह क्षेत्र छोड़ना पड़ा। आज भी आईएसआईएस अपना प्रभाव बनाए हुए है।
सद्दाम की गलती से ईरान ने लिया सबक
इराक में तानाशाही सत्ता चलाने वाले सद्दाम हुसैन पर अमेरिकी हमले और बगदाद के पतन को तेहरान ने बेहद करीब से देखा। सद्दाम की सत्ता की सबसे बड़ी कमजोरी यह थी कि सत्ता का केंद्र मुख्यतः सद्दाम हुसैन और उसके आसपास के कुछ लोग थे। बगदाद के पतन को तेहरान ने बड़े ही करीब से देखा। खामेनेई ने सत्ता का विकेंद्रीकरण किया। ईरान को कई छोटे-छोटे हिस्सों में बांट दिया गया। यानी अगर तेहरान में मौजूद मुख्य लीडरशिप खत्म भी हो जाती है, तब भी ईरान घुटने नहीं टेकता। इसके अलावा राजनैतिक रूप से भी राष्ट्रपति से लेकर बाकी पदों के लिए लोकतांत्रिक प्रणाली का पालन किया गया। इससे सत्ता खामेनेई में न होकर विकेंद्रित हो गई। आज ईरान इसी का फायदा उठाकर खामेनेई के मरने के बाद भी लगातार अमेरिका से जंग जारी रखे हुए है।
इससे पहले, 28 फरवरी को ईरान पर हमला करने के बाद रिजीम बदलने का दावा करने वाले ट्रंप अब तेहरान पर हमलों से हाथ पीछे खींचते नजर आ रहे हैं। पहले 5 दिन की मोहलत के बाद अब उन्होंने 10 दिनों की और मोहलत दे दी है। मतलब साफ है, अमेरिका अब लड़ना नहीं चाहता, बल्कि कैसे भी करके बच कर निकलना चाहता है।
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