Big jolt to US president Donald Trump who was seeking naval coalition to open Strait of Hormuz no anyone joining Explainer: होर्मुज पर ट्रंप बनाने चले थे गठबंधन, पर मित्र देशों ने ही दिखा दिया ठेंगा; किस किसने झटका?, Explainer Hindi News - Hindustan
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Explainer: होर्मुज पर ट्रंप बनाने चले थे गठबंधन, पर मित्र देशों ने ही दिखा दिया ठेंगा; किस किसने झटका?

Big Jolt to Donald Trump: ट्रंप ने विशेष रूप से चीन, फ्रांस, जापान, दक्षिण कोरिया और यूनिइटेड किंगडम को इस संभावित गठबंधन में शामिल होने के लिए कहा है लेकिन अब तक किसी भी देश ने इस मुद्दे पर ट्रंप का साथ नहीं दिया है।

Mon, 16 March 2026 04:57 PMPramod Praveen लाइव हिन्दुस्तान, नई दिल्ली
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Explainer: होर्मुज पर ट्रंप बनाने चले थे गठबंधन, पर मित्र देशों ने ही दिखा दिया ठेंगा; किस किसने झटका?

ईरान युद्ध का आज 17वां दिन है और फिलहाल इस जंग के थमने के आसार नजर नहीं आ रहे हैं। एक तरफ अमेरिका और इजरायल ने ईरान को खत्म करकने की ठान रखी है तो दूसरी तरफ ईरान ने भी ना झुकने का कठोर इरादा कर रखा है और होर्मुज स्ट्रेट को अपने अटल इरादे की आड़ बना रखा है। इजरायल और अमेरिकी हमले के बाद से ही ईरान ने इस अतिमहत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्ग को अपने कब्जे में कर लिया है और वहां से तेल और गैस लेकर जा रहे किसी भी जहाज को निकलने नहीं दे रहा है। इतना ही नहीं ईरान ने मिडल-ईस्ट के कई देशों में हमले भी किए हैं। तेहरान के इस कदम से अंतरराष्ट्रीय चिंता बढ़ गई है।

इसी बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने वैश्विक स्तर पर एक नौसैनिक गठबंधन बनाने का प्रस्ताव दिया है, ताकि इस जलमार्ग को सुरक्षित रखा जा सके और होर्मुज स्ट्रेट में पंसे जहाजों की सुरक्षित निकासी कराकर वैश्विक तेल आपूर्ति को सामान्य बनाया जा सके। बता दें कि होर्मुज़ स्ट्रेट यानी होर्मुज जलडमरूमध्य फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी और अरब सागर से जोड़ता है। दुनिया के लगभग 20% कच्चे तेल का परिवहन इसी रास्ते से होता है। लेकिन, ईरान पर अमेरिका और इजरायल के हमले के बाद से इस मार्ग पर जहाजों की आवाजाही ठप हो चुकी है। इस कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गई हैं। भारत समेत कई देशों में तेल और गैस का संकट गहरा गया है।

अमेरिका की पहल-क्या बोले ट्रंप?

इसी समस्या और होर्मुज स्ट्रेट पर अपनी पकड़ कमजोर पाकर अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने कई प्रमुख देशों से इस क्षेत्र में संयुक्त नौसैनिक गठबंधन बनाने और युद्धपोत भेजने की अपील की है। ट्रंप का कहना है कि यदि अंतरराष्ट्रीय समुदाय मिलकर इस जलमार्ग की सुरक्षा करेगा तो वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को बाधित होने से बचाया जा सकता है। उन्होंने खास तौर पर NATO के सदस्य देशों से इस गठबंधन में शामिल होने की अपील की, और उन्हें चेतावनी दी कि अगर उन्होंने जलडमरूमध्य को फिर से खोलने में अमेरिका की मदद नहीं की, तो उन्हें “बहुत बुरे भविष्य” का सामना करना पड़ेगा।

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ट्रंप ने विशेष रूप से चीन, फ्रांस, जापान, दक्षिण कोरिया और यूनाइटेड किंगडम (UK) को इस संभावित गठबंधन में शामिल होने के लिए कहा है। इनमें चीन को छोड़ दें तो बाकी देश अमेरिका के मित्र देश कहे जाते हैं लेकिन अब तक किसी भी देश ने इस मुद्दे पर ट्रंप का साथ नहीं दिया है। कई देशों ने कहा है कि वे स्थिति पर नजर रख रहे हैं और कूटनीतिक समाधान को प्राथमिकता दे रहे हैं।

किस देश ने क्या कहा?

ट्रंप के गठबंधन प्रस्ताव पर UK ने कहा कि वह "गहनता से विचार कर रहा है" कि इस समुद्री मार्ग को फिर से खोलने में मदद के लिए वह क्या कर सकता है। UK के ऊर्जा सचिव एड मिलिबैंड ने कहा, "हम अपने सहयोगियों के साथ मिलकर गहनता से विचार कर रहे हैं कि क्या किया जा सकता है, क्योंकि यह बहुत ज़रूरी है कि हम इस स्ट्रेट को फिर से खुलवाएँ।" वहीं, चीन के विदेश मंत्रालय के अधिकारियों ने कहा कि बीजिंग चाहता है कि शत्रुता समाप्त हो और “सभी पक्षों की यह जिम्मेदारी है कि वे स्थिर और अबाधित ऊर्जा आपूर्ति सुनिश्चित करें।”

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मित्र जापान-फ्रांस ने भी झटका हाथ

जापान की प्रधानमंत्री सनाए ताकाइची ने सोमवार को कहा कि जापान की अभी मध्य पूर्व में जहाज़ों की सुरक्षा के लिए नौसेना के जहाज़ भेजने की कोई योजना नहीं है। उन्होंने संसद में कहा, "हमने सुरक्षा जहाज़ भेजने के बारे में अभी तक कोई फ़ैसला नहीं किया है। हम लगातार इस बात पर विचार कर रहे हैं कि जापान स्वतंत्र रूप से क्या कर सकता है और कानूनी दायरे में रहकर क्या किया जा सकता है।" उधर, फ्रांस ने भी पुष्टि की है कि वह अपने जहाज नहीं भेजेगा। यूरोप और विदेश मामलों के मंत्रालय ने शनिवार को एक बयान में कहा: "हमारा रुख नहीं बदला है, यह पूरी तरह से रक्षात्मक है।" इससे पहले राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने कहा था कि फ्रांस ईरान के खिलाफ युद्ध में शामिल नहीं होगा।

दक्षिण कोरिया और ऑस्ट्रेलिया ने क्या कहा?

दक्षिण कोरिया, जो अपनी जरूरत का 70 प्रतिशत तेल खाड़ी देशों से आयात करता है, ने कहा कि वह ट्रंप के बयानों पर गहनता से नजर रखे हुए है और ऊर्जा परिवहन मार्गों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए विभिन्न उपायों पर व्यापक रूप से विचार और खोजबीन कर रहा है। वहीं, ऑस्ट्रेलिया ने भी साफ कह दिया है कि होर्मुज़ स्ट्रेट को फिर से खोलने में मदद के लिए नौसेना नहीं भेजेगा। आस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री एंथनी अल्बानीज के मंत्रिमंडल की सदस्य कैथरीन किंग ने सरकारी प्रसारक ABC को दिए एक साक्षात्कार में दो टूक कहा, “हम होर्मुज जलडमरूमध्य में कोई जहाज नहीं भेजेंगे।”

ईरान का रुख

दूसरी ओर ईरान ने कहा है कि स्ट्रेट पूरी तरह बंद नहीं किया गया है। ईरानी अधिकारियों के अनुसार यह मार्ग केवल अमेरिका और उसके सहयोगियों के जहाजों के लिए सीमित किया गया है। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघाची ने कहा कि अन्य देशों के जहाजों के लिए मार्ग खुला है। वहीं ईरान के नए सर्वोच्च नेता मोजतबा खामेनेई ने संकेत दिया है कि यह जलमार्ग वर्तमान संघर्ष में ईरान के लिए रणनीतिक दबाव का साधन बन सकता है।

सैन्य और भौगोलिक चुनौतियाँ

विशेषज्ञों के अनुसार होर्मुज़ स्ट्रेट की सुरक्षा आसान नहीं है। यह मार्ग अपने सबसे संकरे हिस्से में लगभग 21 समुद्री मील चौड़ा है और यहां जहाजों पर ड्रोन, मिसाइल और समुद्री माइंस का खतरा बना रहता है। इसके अलावा विभिन्न देशों की नौ सेनाओं के बीच समन्वय स्थापित करना भी बड़ी चुनौती हो सकता है। विश्लेषकों का मानना है कि यदि होर्मुज़ स्ट्रेट में तनाव लंबे समय तक बना रहता है तो इसका असर वैश्विक ऊर्जा बाजार, व्यापार मार्गों और विश्व अर्थव्यवस्था पर व्यापक रूप से पड़ सकता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय इस संकट का समाधान निकालने के लिए लगातार प्रयास कर रहा है।

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