How to choose best seats in cinema theater for movie watching experience थिएटर में कौन सी सीट होती है बेस्ट? क्यों घाटे में रहते हैं कॉर्नर सीट वाले? समझिए पूरा गणित, Bollywood Hindi News - Hindustan
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थिएटर में कौन सी सीट होती है बेस्ट? क्यों घाटे में रहते हैं कॉर्नर सीट वाले? समझिए पूरा गणित

क्या अपनी पसंदीदा फिल्म की टिकट बुक करते वक्त आपको भी यही कनफ्यूजन हर बार होता है कि कौन सी सीट बेस्ट रहेगी? कई लोग पूरे यकीन के साथ कॉर्नर वाली या सबसे पीछे की सीटें चुनते हैं, लेकिन यकीन मानिए आप यहां पर पूरी तरह सही नहीं होते हैं।

Tue, 16 Dec 2025 01:56 PMPuneet Parashar लाइव हिन्दुस्तान
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थिएटर में कौन सी सीट होती है बेस्ट? क्यों घाटे में रहते हैं कॉर्नर सीट वाले? समझिए पूरा गणित

मूवी देखने का एक्सपीरियंस सिर्फ फिल्म पर ही नहीं, बल्कि आप किस सीट पर बैठे हैं, इस पर भी काफी हद तक निर्भर करता है। आपने देखा होगा कि कुछ लोग हमेशा पीछे की सीटें लेते हैं, तो कुछ बीच वाली सीटों के लिए एक्सट्रा पैसे देने को भी तैयार रहते हैं। ये सिर्फ निजी चॉइस नहीं है, बल्कि इसके पीछे वैज्ञानिक कारण भी हैं। सोसाइटी ऑफ मोशन पिक्चर एंड टेलीविजन इंजीनियर्स (SMPTE) और THX जैसे इंटरनेशल ऑर्गनाइजेशन्स ने सालों की रिसर्च के बाद यह बताया है कि कौन सी सीटें असल में आपको फिल्म देखने का पूरा मजा देती हैं। तो चलिए समझते हैं हर तरह की सीटों के फायदे-नुकसान।

पीछे की सीटो पर प्राइवेसी तो है, लेकिन...

पीछे की सीटों को लेकर लोगों की मिली जुली राय होती हैं। कुछ लोगों को लगता है कि सबसे पीछे की सीट पर बैठने से पूरी स्क्रीन एक नजर में दिख जाती है और पीछे से आपको कोई डिस्टर्ब नहीं कर रहा होता, साथ ही आपको गर्दन ऊपर नहीं रखनी पड़ती। यह बात सही है कि प्राइवेसी के लिहाज से सबसे पीछे की सीट काफी अच्छी होती है, लेकिन तकनीकी नजरिए से देखें तो अगर आप बहुत ज्यादा पीछे बैठते हैं तो स्क्रीन छोटी दिखेगी और लार्ज स्क्रीन वाला फील नहीं मिलेगा, जिसके लिए आप थिएटर जाते हैं। साथ ही साउंड क्वालिटी भी थोड़ी कम हो सकती है।

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आगे की सीटें, गर्दन में दर्द की गारंटी!

अब बात करते हैं आगे वाली सीटों की जो आपको सबसे सस्ती मिलती हैं। थिएटर में फिल्म देखने के लिहाज से ये सीटें सबसे ज्यादा बदनाम हैं। SMPTE की गाइडलाइन्स साफ बताती हैं कि इतने ऊंचे एंगल पर मूवी देखना मतलब आपकी गर्दन में दर्द होना तो तय है, साथ ही आंखों पर भी बहुत ज्यादा जोर पड़ता है। वजह यह कि पूरी स्क्रीन देखने के लिए आपको लगातार अपनी आंखें और सिर को मूव करना पड़ता है। इसीलिए थिएटर्स में आगे वाली सीटों की टिकट सबसे सस्ती होती हैं और ये आमतौर पर तब ही बिकती हैं जब बाकी सभी सीटें भर जाएं।

क्यों घाटे का सौदा हैं कॉर्नर की सीटें?

कॉर्नर सीटें यानि थिएटर्स के बिलकुल लेफ्ट या राइट साइड वाली सीटें अक्सर कपल्स की पहली चॉइस होती हैं, क्योंकि वहां प्राइवेसी मिलती है और आसपास कम लोग होते हैं। लेकिन विजुअल एक्सपीरियंस के लिहाज से ये सीटें काफी खराब होती हैं। जब आप कॉर्नर से स्क्रीन देखते हैं, तो व्यूइंग एंगल 25-30 डिग्री तक तिरछा हो जाता है, जिसकी वजह से स्क्रीन का शेप डिस्टॉर्टेड दिखता है। यानी एक चौकोर स्क्रीन के नजदीकी कोने बड़े और दूर वाले छोटे दिखने लगते हैं।

कोने वाली सीटें क्यों खराब

साथ ही प्रोजेक्शन स्क्रीन्स का कलर और ब्राइटनेस साइड से देखने पर काफी कम हो जाती है। आपको स्क्रीन के दूसरे कोने पर क्या चल रहा है ठीक से नहीं दिख पाता। बारीक डिटेल्स मिस होती हैं। ऑडियो के मामले में भी सराउंडिंग साउंड तकनीक का मजा नहीं मिल पाता, नजदीक का साउंड देज और दूर का हल्का सुनाई पड़ता है। इसलिए भले ही कॉर्नर सीटें प्राइवेसी और कंफर्ट के लिए आकर्षक लगें, लेकिन अगर आप वाकई फिल्म का एक्सपीरियंस एंजॉय करना चाहते हैं तो ये सीटें अवॉइड करनी चाहिए।

कौन सी सीटें होती हैं बेस्ट? याद रखिए यह गोल्डन रूल

अब आते हैं सबसे जरूरी सवाल पर, कि आखिर बेस्ट सीटें कौन सी है? मल्टीप्लेक्स स्टडीज और थिएटर इंजीनियरिंग स्टैंडर्ड्स के मुताबिक, बेस्ट सीटें वो हैं जो स्क्रीन से थिएटर की सबसे पीछे की दीवार तक की कुल दूरी का लगभग 2/3 हिस्सा हो। यानि अगर कोई थिएटर की स्क्रीन से लेकर सबसे पीछे की सीट तक की लंबाई 30 मीटर है, तो सबसे बेस्ट सीटें वो होंगी जो स्क्रीन से लगभग 20 मीटर की दूरी पर हों। ये वो जगह है जहां से THX की के मुताबिक बेस्ट मूवी वॉचिंग एक्सपीरियंस मिलता है। स्क्रीन पूरी और बड़ी दिखती है और साउंड भी प्रॉपर फील होता है। आमतौर पर ये थिएटर ऑडी के बीच के हिस्से से एक-दो कतार पीछे वाली सीटें होती हैं

आईमैक्स

IMAX और 4DX में बदल जाता है गणित

अब बात करते हैं IMAX जैसे स्पेशल फॉर्मेट की। जहां सीटों की डायनेमिक्स थोड़े अलग होते हैं। IMAX के चीफ टेक्निकल ऑफिसर ब्रायन बॉनिक बताते हैं कि IMAX थिएटर्स का डिजाइन ही अलग तरीके से किया जाता है। स्क्रीन वॉल-टू-वॉल और फ्लोर-टू-सीलिंग होती है, और सीटें स्क्रीन के ज्यादा करीब होती हैं। इस डिजाइन की वजह से IMAX में हर सीट से स्क्रीन बड़ी दिखाई पड़ती है। साथ ही IMAX में हर स्पीकर को सीटों के हिसाब से लेजर से टारगेट किया जाता है ताकि पूरे थिएटर में साउंड बराबर मिले। मतलब यह है कि IMAX ऑडी में आप कहीं भी बैठें आपको साउंड और व्यूईंग में ज्यादा फर्क नहीं दिखेगा। हालांकि आगे की सीटों से व्यूईंग एक्सपीरियंस फीका हो सकता है।

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