आपने सुना है बहारों फूल बरसाओ का अंग्रेजी वर्जन? मोहम्मद रफी ने इंग्लिश में भी गाए थे 2 गाने
मोहम्मद रफी के फैन हैं तो आपने उनके हर तरह के गाने सुने होंगे, भजन, दर्दभरे, मस्तीभरे लेकिन क्या आपने उनके अंग्रेजी गाने सुने हैं? कम लोग जानते हैं कि उन्होंने उर्दू की नफासत के साथ दो इंग्लिश गाने गाए थे।

मोहम्मद रफी एक ऐसा नाम जिसके बिना भारतीय संगीत का इतिहास अधूरा है। उनकी आवाज कानों से सीधे रूह में उतरने वाली है। मन तड़पत हरि दर्शन को, भजन हो या क्या हुआ तेरा वादा जैसा दिल चीरने वाला गाना... रफी की आवाज सुनकर ऐसा लगता था कि उन्होंने उस किरदार को असल जिंदगी में जी लिया है। वह एक वर्सेटाइल सिंगर थे, इसमें कोई शक नहीं। आपने उनके हर जॉनर के गाने भी सुने होंगे लेकिन क्या आपको पता है, मोहम्मद रफी ने दो गाने अंग्रेजी में गाए थे, जबकि वह इंग्लिश में उतने फ्लुएंट भी नहीं थे।
द शी आई लव
यह वह दौर था जब रफी साहब की लोकप्रियता चरम पर थी। साल 1968 में उन्होंने द शी आई सव नाम का एक पॉप सॉन्ग रिकॉर्ड किया। इस गाने की सबसे खास बात यह थी कि इसमें रफी साहब का अंदाज बिल्कुल अलग था। यह एक रोमांटिक ट्रैक था जिसमें वेस्टर्न बीट्स और ऑर्केस्ट्रा का बखूबी इस्तेमाल किया गया था। हैरानी की बात यह है कि बिना किसी विदेशी लहजे के दिखावे के रफी साहब ने अंग्रेजी शब्दों को इतनी नफासत से गाया था। इस गाना हम काले हैं तो क्या हुआ दिलवाले हैं, की धुन पर था।
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ऑल्दो वी हेल अपार्ट
उसी समय के दौरान उन्होंने अपना दूसरा अंग्रेजी गाना ऑलदो वी आर आपार्ट रिकॉर्ड किया था। यह गाना शुरू होगा तो आपको लगेगा कि 'बहारों फूल बरसाओ' है। हालांकि यह दो बिछड़े प्रेमियों की हालत दर्शाने वाला गाना था। गाने का म्यूजिक शंकर जयकिशन ने दिया था। गाने के बोल हरिंद्रनाथ चट्टोपाध्याय ने लिखे थे।
क्यों खास थे ये गाने?
मोहम्मद रफी के ये गाने लेट 60 के दशक में रिकॉर्ड किए गए थे। इन गानों की रिकॉर्डिंग का मकसद दुनिया को ये बताना था कि रफी साहब केवल शास्त्रीय या फिल्मी गानों तक सीमित नहीं थे। वह वेस्टर्न पॉप को भी उसी सहजता से गा सकते थे। यह एक इंग्लिश एल्बम प्रोजेक्ट का हिस्सा था। इन गानों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रमोट करने के लिए बनाया गया था। कोशिश थी कि भारत के कलाकारों की ग्लोबल पहचान बने।
अंग्रेजी में कच्चे रफी ने की थी मेहनत
रिपर्ट्स बताती हैं कि मोहम्मद रफी इंग्लिश बोलने में उतने फ्लुएंट नहीं थे। उनकी हिंदी और जुबान उर्दू दुरुस्त थी। इन दोनों गानों को गाने के लिए उन्होंने काफी मेहनत की थी। उन्होंने इंग्लिश फोनेटिक्स की प्रैक्टिस की थी। गाने उनके दोस्त हरिंद्रनाथ चट्टोपाध्याय ने लिखे थे। उन्होंने ही रफी को मोटिवेट किया और सिखाने में मदद की थी।
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