'धक-धक करने लगा' जैसे हिट सॉन्ग गाने वाली अनुराधा पौडवाल क्यों बनीं भजन क्वीन? इमोशनल कहानी
धक-धक करने लगा, धीरे-धीरे से मेरी जिंदगी में आना जैसे गानों को दिल छूने वाला आवाज देने वाली अनुराधा पौडवाल कभी टॉप बॉलीवुड सिंगर्स में थें, अचानक क्या हुआ जो वह भजन गाने लगीं। जानें उनकी कहानी।

बॉलीवुड का वो दौर जब रेडियो पर हर दूसरी फिल्म के सिंगर क्रेडिट में एक ही नाम गूंजता था-अनुराधा पौडवाल। एक ऐसी आवाज जो न केवल लता मंगेशकर और आशा भोसले की टक्कर की मानी जाने लगी बल्कि टी-सीरीज जैसी म्यूजिक इंडस्ट्री को ऊपर ले जाने में एक बड़ा रोल प्ले किया। अनुराधा पौडवाल के गाए भजन आज भी यूट्यूब पर खूब सुने जाते हैं। हालांकि कई लोग नहीं जानते कि जिस मखमली आवाज ने करोड़ों दिलों को सुकून दिया उनकी अपनी जिंदगी दुखों से भरी रही। अनुराधा पौडवाल के करियर की शुरुआत कैसे हुई, वह फिल्मों से भजन की ओर क्यों मुड़ी, उनका भक्ति का आलौकिक अनुभव, यहां जानें सब कुछ।
बॉलीवुड में पहला कदम
अनुराधा पौडवाल को पहला ब्रेक अमिताभ और जया बच्चन की फिल्म अभिमान में मिला था। यह फिल्म 1973 में रिलीज हुई थीं। उस वक्त अनुराधा पौडवाल 19 साल की थीं। उन्होंने इसमें लीड प्लेबैक सिंगर नहीं थीं बल्कि एक श्लोक गाया था। यह संस्कृत श्लोक जया बच्चन के लिए गाया था। श्लोक के कंपोजर आरडी बर्मन थे।
प्लेबैक सिंगर के तौर पर पहली फिल्म
प्लेबैक सिंगर के तौर पर अनुराधा पौडवाल की पहली फिल्म कालीचरण थी। यह 1976 में रिलीज हुई थी। इस मूवी में उन्होंने एक बटा दो, दो बटे चार गाना गाया था। उन्होंने पहला सोलो गाना आप बीती में गाया था। इस गाने के बोल थे, हम तो गरीब हैं। इसके संगीतकार लक्ष्मीकांत प्यारेलाल थे।
मराठी फिल्मों में शुरुआत
हिंदी के साथ-साथ उन्होंने 1973 में ही फिल्म यशोदा से उन्होंने मराठी सिनेमा में भी कदम रखा था। अनुराधा पौडवाल का फिल्मों से भजनों की ओर मुड़ना रातों-रात लिया गया फैसला नहीं था, बल्कि इसके पीछे एक गहरा भावुक और आध्यात्मिक मोड़ था।
बॉलीवुड में करियर का पीक
अगर हम उनके बॉलीवुड करियर के पीक साल की बात करें तो ये लेट 1980 के दशक से लेकर 1990 के दशक की शुरुआत तक का समय था। इस दौरान उन्होंने लगातार तीन साल (1991, 1992, 1993) तक फिल्मफेयर बेस्ट फीमेल प्लेबैक सिंगर का अवॉर्ड मिला था। ये अवॉर्ड्स आशिकी, दिल है कि मानता नहीं और बेटा के लिए थे।
अनुराधा पौडवाल के फेमस गाने
आशिकी- नजर के सामने, धीरे-धीरे से मेरी जिंदगी में आना, बस एक सनम चाहिए। दिल है कि मानता नहीं- दिल है कि मानता नहीं, तू प्यार है किसी और का। बेटा- धक-धक करने लगा, कोयल सी तेरी बोली। साजन- बहुत प्यार करते हैं तुमको सनम, जिएं तो जिएं कैसे। हीरो-तू मेरा जानू है। राम लखन- तेरा नाम लिया, ओ राम जी। तेजाब- कह दो कि तुम हो मेरी वरना और सड़क-तुम्हें अपना बनाने की कसम जैसे कई फेमस गाने उनके नाम हैं।
कैसे शुरू हुआ भजन का सफर
अनुराधा पौडवाल अब फिल्मों के लिए नहीं गातीं। 90 के दशक के बाद उनकी लाइफ का टर्निंग पॉइंट आया। अनुराधा आशिकी के गाने गाकर उस वक्त नंबर 1 सिंगर बन गई थीं। इसके बाद अनुराधा पौ़डवाल ने फैसला लिया कि वह सिर्फ टी-सीरीज के लिए ही गाएंगी। गुलशन कुमार को अनुराधा पौडवाल की आवाज में एक प्योरिटी दिखती थी तो उन्होंने उन्हें भजन गाने के लिए प्रोत्साहित किया।
भजन गाने की इमोशनल वजह
90 के दशक की शुरुआत में अनुराधा पौडवाल के पति अरुण पौडवाल का निधन हो गया। पति के अचानक चले जाने से वह अंदर तक टूट गईं। इसके बाद गुलशन कुमार की हत्या हो गई। रिपोर्ट्स थीं कि इस गहरे दुख और मानसिक तनाव के दौरान उन्होंने पाया कि फिल्मी गानों की चकाचौंध के बजाय भक्ति और मंत्रोच्चारण में उन्हें मानसिक शांति मिल रही है। इस तरह से वह भजन गाने लगीं। साल 2020 में 35 साल की उम्र में उनके बेटे का निधन भी किडनी की बीमारी की वजह से हो गया। इसके बाद वह गहरे सदमे में आ गईं। इस घटना के बाद वह काफी चैरिटी करने लगीं। बताया जाता है कि अनुराधा पौडवाल के पति का निधन भी किडनी की बीमारी से हुआ था।
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