गांव के सरकारी स्कूल से NASA तक का सफर, ट्रैक्टर ड्राइवर के बेटे ने बनाई स्पेस कंपनी
Dr Anand Megalingam Success Story: एक गरीब किसान और ट्रैक्टर चालक के बेटे आनंद ने अपने जीवन के कड़े संघर्षों, लगातार मिली असफलताओं और आर्थिक तंगहाली को पीछे छोड़ते हुए आज वैश्विक अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में भारत का नाम रोशन किया है।

Dr Anand Megalingam Success Story: "दृढ़ संकल्प और कड़ी मेहनत हो तो किस्मत की लकीरें भी बदली जा सकती हैं।" इस कहावत को पूरी तरह सच कर दिखाया है तमिनाडु के एक छोटे से गांव से ताल्लुक रखने वाले डॉ. आनंद मेगालिंगम ने। एक गरीब किसान और ट्रैक्टर चालक के बेटे आनंद ने अपने जीवन के कड़े संघर्षों, लगातार मिली असफलताओं और आर्थिक तंगहाली को पीछे छोड़ते हुए आज वैश्विक अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में भारत का नाम रोशन किया है।
कभी गरीबी के कारण गांव की पगडंडियों पर रोजाना 6 किलोमीटर पैदल चलकर स्कूल जाने वाले आनंद आज भारत की एक उभरती हुई प्राइवेट स्पेस-टेक कंपनी 'स्पेस जोन इंडिया' (Space Zone India) के फाउंडर और सीईओ हैं, और अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा (NASA) के कार्यक्रमों से जुड़े हुए हैं।
शुरुआती जीवन और पढ़ाई का कड़ा संघर्ष
डॉ. आनंद मेगालिंगम का बचपन बेहद अभावों में बीता। उनके परिवार के पास न तो कोई बड़ी संपत्ति थी और न ही उनकी पृष्ठभूमि में दूर-दूर तक कोई पढ़ा-लिखा वैज्ञानिक था। उनके पिता एक साधारण ट्रैक्टर ड्राइवर थे। घर का खर्च चलाने के लिए पैसे हमेशा कम पड़ जाते थे। आनंद को स्कूल जाने के लिए रोजाना 6 किलोमीटर तक पैदल चलना पड़ता था, जिसने उनके भीतर कभी हार न मानने का हौसला पैदा किया।
अपनी पढ़ाई के शुरुआती दौर में उन्होंने एक सुरक्षित और नौकरी की गारंटी देने वाला विकल्प समझकर कंप्यूटर साइंस चुना। लेकिन उनका मन इसमें नहीं लगा और वे इस विषय में पिछड़ने लगे, जिसके कारण उन्हें बीच में ही पढ़ाई छोड़नी पड़ी। इस नाकामी से हताश होने के बजाय उन्होंने अपने असली सपने ‘एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग’ की तरफ रुख किया। इस क्षेत्र में उन्होंने अपनी जादुई प्रतिभा दिखाई और 9.8 CGPA के साथ कॉलेज के गोल्ड मेडलिस्ट बने।
जब अमेरिका ने रिजेक्ट किया वीजा, उसी देश ने बिछाया रेड कार्पेट
करियर के शुरुआती दौर में आनंद को एक बड़ा झटका तब लगा, जब एयरोस्पेस रिसर्च के सिलसिले में विदेश जाने के लिए अमेरिकी दूतावास ने उनका यूएस वीजा रिजेक्ट कर दिया। किसी भी युवा के लिए यह सपना टूटने जैसा था, लेकिन आनंद ने हार नहीं मानी और एक प्रसिद्ध लाइन कही— “सीमाएं इंसानों के लिए होती हैं, इनोवेशन की कोई सीमा नहीं होती।”
सालों बाद, अपनी काबिलियत के दम पर उन्होंने इतिहास बदल दिया। अमेरिकी विदेश विभाग ने दुनिया भर के केवल 23 चुनिंदा अंतरिक्ष विशेषज्ञों में डॉ. आनंद को शामिल कर उन्हें खुद अमेरिका आने का न्योता दिया। जिस देश ने कभी उनका वीजा ठुकराया था, उसी देश के नासा (NASA) केंद्रों पर आनंद का भव्य स्वागत हुआ, जहां उन्होंने नासा के टॉप वैज्ञानिकों, स्पेस फोर्स कमांडरों और रक्षा विशेषज्ञों के साथ एडवांस्ड मिसाइल व रॉकेट सिस्टम पर अनुभव साझा किए।
'स्पेस जोनन इंडिया' की स्थापना और मिशन 'रूमी'
आनंद ने बेहद सीमित संसाधनों के साथ चेन्नई में अपनी खुद की प्राइवेट अंतरिक्ष कंपनी ‘स्पेस जोंन इंडिया’ की शुरुआत की, जिसमें उनके पिता उनके पहले समर्थक बने। उनकी कंपनी ने 'मिशन रूमी-एच' (RHUMI-H) के तहत भारत का पहला पुनरुपयोगी हाइब्रिड रॉकेट मोबाइल प्लेटफॉर्म से सफलतापूर्वक लॉन्च कर पूरी दुनिया को चौंका दिया। इसके बाद 'रूमी-1' (RHUMI-1) की सफलता ने उन्हें एशिया के टॉप स्पेस इनोवेटर्स की श्रेणी में ला खड़ा किया। वर्तमान में उनकी कंपनी एक साथ चेन्नई से दो रॉकेट लॉन्च करने के 'रूमी ट्विन' (RHUMI Twin) प्रोजेक्ट पर काम कर रही है।




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