UPSC CSE : PM Advisor Sanjeev Sanyal said UPSC civil services exam preparation Is a Waste of Time UPSC CSE : वक्त की बर्बादी है यूपीएससी, पीएम मोदी के सलाहकार के बयान ने छेड़ी बहस, दिए ये तर्क, Career Hindi News - Hindustan
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UPSC CSE : वक्त की बर्बादी है यूपीएससी, पीएम मोदी के सलाहकार के बयान ने छेड़ी बहस, दिए ये तर्क

पीएम मोदी के सलाहकार संजीव सान्याल ने यह कहकर एक बहस छेड़ दी है कि पक्की नौकरी व स्थायी जॉब के लिए यूपीएससी भर्ती परीक्षाओं की तैयारी करना पूरी तरह से समय की बर्बादी है।

Mon, 29 Dec 2025 07:51 PMPankaj Vijay लाइव हिन्दुस्तान, नई दिल्ली
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UPSC CSE : वक्त की बर्बादी है यूपीएससी, पीएम मोदी के सलाहकार के बयान ने छेड़ी बहस, दिए ये तर्क

ऐसे समय में जब देश के लाखों युवा पूरे जोश खरोश के साथ यूपीएससी सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा 2026 की तैयारी में जुटे हुए हैं, पीएम मोदी के सलाहकार संजीव सान्याल ने यह कहकर एक बहस छेड़ दी है कि पक्की नौकरी व स्थायी जॉब के लिए यूपीएससी भर्ती परीक्षाओं की तैयारी करना पूरी तरह से समय की बर्बादी है। उन्होंने कहा कि चूंकि टेक्नोलॉजी तेजी से बदल रही है और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का लेवल बहुत बेहतर है, इसलिए ऐसी परीक्षाओं, कोर्स और सिलेबस की तैयारी करना समय की बर्बादी है। उन्होंने यह भी कहा कि शिक्षकों को पुरानी परंपराओं से चिपके रहने के बजाय अप्रेंटिसशिप के कल्चर को बढ़ावा देना चाहिए। संजीव सान्याल जाने-माने अर्थशास्त्री और प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य हैं।

स्टेनोग्राफर बनना एक आम बात

उन्होंने समझाया, '1940 के दशक में किसी के लिए स्टेनोग्राफर बनना एक अच्छा ऑप्शन हो सकता था। टेक्नोलॉजी बदल गई है और अब यह एक आम बात हो गई है। चंद महीनों महीनों में आपका फोन अपग्रेड हो रहा है और यह कुछ नया कर पा रहा है। अब मेरे पास ऐसा सिलेबस नहीं हो सकता जो यूनिवर्सिटी एजुकेशन के मौजूदा तरीके से इसके साथ तालमेल बिठा सके। अपने पूरे प्रोफेसर फैकल्टी को उस तरह से अपग्रेड करना बहुत मुश्किल है।'

मेरा मतलब यूनिवर्सिटी सिस्टम खत्म करने से नहीं

उन्होंने आगे समझाया कि यूपीएससी या पारंपरिक डिग्री हासिल करना समय की बर्बादी है, इसका मतलब यह नहीं है कि यूनिवर्सिटी सिस्टम को खत्म कर देना चाहिए, बल्कि इसका सीधा सा मतलब है कि सिलेबस और पढ़ाने का तरीका बदलते समय के साथ बदलना चाहिए। सान्याल ने कहा, 'तो एआई लेटेस्ट जानकारी देने में बहुत बेहतर होगा। अब इसका मतलब यह नहीं है कि यूनिवर्सिटी के पास करने के लिए कुछ नहीं है। बस आज जिस तरह से वे काम कर रहे हैं, वह समय की बर्बादी है।'

जल्दी काम करना शुरू करें, जॉब के दौरान सीखें

उन्होंने कहा कि छात्रों को जल्दी काम शुरू करने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए और समाज को काम करते हुए सीखने के विचार को अपनाना चाहिए। उन्होंने आगे कहा, "कोई कहेगा कि विश्वविद्यालय जाने के सामाजिक पहलू क्या होंगे? 20वीं सदी तक लोगों का सामाजिक जीवन नहीं हुआ करता था क्या। आज भी दुनिया के ज्यादातर लोग विश्वविद्यालय नहीं जाते। क्या इसका मतलब यह है कि उनका कोई सामाजिक जीवन नहीं है?'

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इजाजत मिलती तो मैं 18 साल की उम्र में काम करना पसंद करता

अपनी बात को और साबित करने के लिए सान्याल ने अपने निजी अनुभव का जिक्र किया। उन्होंने बताया, 'मुझे बस लगा कि मैं कॉलेज में अपना समय बर्बाद कर रहा था। मुझे शिक्षा मिल रही थी, लेकिन पांच से छह घंटे ऐसे थे जब मैं कुछ नहीं कर रहा था। मैंने शायद ही कभी क्लास अटेंड की हो। मैंने यूनिवर्सिटी का मजा लिया, लेकिन क्लास अटेंड करने और सीखने से इसका कोई लेना-देना नहीं था। आप बहुत कुछ और कर सकते थे। अगर सिस्टम मुझे इजाजत देता, तो मैं 18 साल की उम्र में काम करना पसंद करता और अपनी क्लास ऑनलाइन करता और परीक्षा देता।'

सान्याल ने पहले भी ऐसे ही विचार दिया था

यह पहली बार नहीं है जब सान्याल ने ये विचार व्यक्त किए हैं। अगस्त 2025 में सीए कुशल लोढ़ा के साथ एक पॉडकास्ट में सान्याल ने 99.9 प्रतिशत फेलियर रेट वाली यूपीएससी परीक्षा को जीवन का मुख्य लक्ष्य बनाने की समझदारी पर सवाल उठाया था। सान्याल ने कहा था, "अब मुझे बताओ कि ऐसी कितनी चीजें हैं जिनमें 99.9% फेलियर रेट है, जिन्हें आप किसी को करने की सलाह देंगे, जब तक कि उसका बहुत बड़ा फायदा न हो?' उन्‍होंने भारत में सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी की संस्कृति पर सवाल उठाए थे। उन्होंने इसे टैलेंट का गलत इस्तेमाल बताया था। सान्याल के अनुसार, 'कोचिंग क्लास माफिया' इस कल्‍चर को बढ़ावा दे रहे हैं। उनका कहना है कि यूपीएससी (संघ लोक सेवा आयोग) परीक्षा में बैठने वाले 99.9 फीसदी लोग असफल हो जाते हैं। यानी सफलता का रेट उद्यमियों की तुलना में भी कम है। उन्होंने इस परीक्षा को जीवन का मुख्य लक्ष्य मानने के तर्क पर भी सवाल उठाया। उनका मानना है कि कोचिंग उद्योग जानबूझकर युवाओं को ऐसे जोखिम भरे रास्ते पर धकेलता है जिसका पेऑफ यानी व्यावसायिक लाभ बेहद कम है। वह इसे 'अफीम बेचने' जैसा बताते हैं। यह लाखों युवाओं को एक ऐसे सपने में उलझाए रखता है जिसके पूरे होने की संभावना लगभग न के बराबर है। वहीं, इसमें कोचिंग संस्थान भारी मुनाफा कमाते हैं।

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