TET Dispute: Teachers Slam Teachers Unions After Supreme Courts 1-Year Relief; Calls for Unified Protest TET: टीईटी अनिवार्यता पर SC के फैसले के बाद शिक्षक संगठनों पर भड़के शिक्षक; साझा मंच की उठी मांग, Career Hindi News - Hindustan
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TET: टीईटी अनिवार्यता पर SC के फैसले के बाद शिक्षक संगठनों पर भड़के शिक्षक; साझा मंच की उठी मांग

सुप्रीम कोर्ट द्वारा शिक्षकों को एक वर्ष की बड़ी राहत देने के बाद शिक्षकों की नाराजगी का केंद्र शासन या न्यायालय नहीं, बल्कि खुद उनके अपने शिक्षक संगठन और उनके पदाधिकारी बन गए हैं।

Sun, 31 May 2026 08:22 AMPrachi लाइव हिन्दुस्तान
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TET: टीईटी अनिवार्यता पर SC के फैसले के बाद शिक्षक संगठनों पर भड़के शिक्षक; साझा मंच की उठी मांग

उत्तर प्रदेश समेत देश भर के बेसिक शिक्षा विभाग के शिक्षकों के लिए हाल ही में आया सुप्रीम कोर्ट का फैसला इस समय सबसे बड़ी चर्चा का विषय बना हुआ है। न्यायालय द्वारा शिक्षकों को एक वर्ष की बड़ी राहत देने के बाद अब शिक्षक समुदाय के भीतर चल रही बहस ने एक नया मोड़ ले लिया है। इस बार शिक्षकों की नाराजगी का केंद्र शासन या न्यायालय नहीं, बल्कि खुद उनके अपने शिक्षक संगठन और उनके पदाधिकारी बन गए हैं।

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स, विशेषकर शिक्षकों के विभिन्न व्हाट्सएप समूहों में इस मुद्दे पर खुलकर अंतर्कलह सामने आ रही है। शिक्षक अपने ही संघों की कार्यप्रणाली और रणनीतियों पर तीखे सवाल उठा रहे हैं।

व्हाट्सएप ग्रुप्स में फूटा शिक्षकों का गुस्सा; 'समन्वय की कमी' पर उठाए सवाल

विभिन्न व्हाट्सएप समूहों में वायरल हो रही पोस्टों और कमेंट्स में शिक्षकों ने संगठनों के बीच आपसी तालमेल की भारी कमी को लेकर गहरी चिंता व्यक्त की है। शिक्षकों का कहना है कि पिछले कई वर्षों से शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) के संवेदनशील मुद्दे पर संघर्ष, बैठकें, ज्ञापन सौंपने और आंदोलनों का दौर चलता रहा, लेकिन सभी संगठनों ने कभी भी एक साझा और स्पष्ट रणनीति सामने नहीं रखी।

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एक पीड़ित शिक्षक ने सोशल मीडिया पर टिप्पणी करते हुए लिखा, “हमारे बीच संगठन और बड़े-बड़े पदों पर बैठे पदाधिकारी तो बहुत हैं, लेकिन जब धरातल पर एकजुट होकर अपने हक के लिए लड़ने की बात आती है, तो सबकी राहें अलग-अलग दिखाई देती हैं।” चर्चाओं में यह भी आरोप लगाया जा रहा है कि जब एक शिक्षक संगठन किसी विरोध कार्यक्रम या रणनीति की घोषणा करता है, तो दूसरा संगठन तुरंत अपनी अलग राजनीति और एजेंडे के साथ सामने आ जाता है। संगठनों की इस आपसी खींचतान से आम शिक्षकों के बीच भ्रम की स्थिति पैदा होती है। शिक्षकों का मानना है कि यदि सभी गुट अपने मतभेद भुलाकर एक संयुक्त मंच पर आ जाएं, तो उनकी आवाज शासन और नीति निर्माताओं तक अधिक प्रभावी ढंग से पहुंच सकतीहै।

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टीईटी निर्णय पर शिक्षक संगठनों ने जताई असहमति; साझा संघर्ष का आह्वान

इस बीच, कई शिक्षक संगठनों के शीर्ष पदाधिकारियों ने भी शीर्ष अदालत के इस फैसले पर अपनी प्रतिक्रियाएं दी हैं। 'विशिष्ट बीटीसी शिक्षक वेलफेयर एसोसिएशन' के प्रदेश अध्यक्ष तारकेश्वर शाही ने टीईटी संबंधी सर्वोच्च न्यायालय के इस नवीनतम निर्णय पर अपनी गहरी असहमति और नाराजगी व्यक्त की है।

प्रोफेसर और शिक्षक नेता शाही ने कहा, “सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला राहत देने के साथ-साथ आज लाखों शिक्षकों के मन में सेवा सुरक्षा को लेकर अनेक गंभीर प्रश्न और पीड़ा छोड़ गया है।”

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क्या है तकनीकी और कानूनी तर्क?

शिक्षक नेताओं ने अपनी असहमति के पीछे शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE Act) का हवाला देते हुए निम्नलिखित कानूनी तर्क पेश किए हैं:

एनसीटीई (NCTE) का अधिकार: आरटीई एक्ट की धाराओं के तहत देश में शिक्षकों की न्यूनतम शैक्षणिक और व्यावसायिक योग्यता निर्धारित करने का पूर्ण और वैधानिक अधिकार केवल राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (NCTE) को प्राप्त है।

2010 की अधिसूचना का हवाला: एनसीटीई द्वारा वर्ष 2010 में जारी की गई आधिकारिक अधिसूचना में यह स्पष्ट रूप से उल्लेखित था कि आरटीई कानून लागू होने से पूर्व (यानी पुराने नियमों के तहत) नियुक्त हो चुके शिक्षकों पर टीईटी (TET) परीक्षा की अनिवार्यता लागू नहीं होगी।

इस कानूनी पेंच को रेखांकित करते हुए तारकेश्वर शाही ने देश और प्रदेश के सभी छोटे-बड़े शिक्षक संगठनों से अपील की है कि वे अपनी आपसी प्रतिद्वंद्विता को छोड़ें और शिक्षकों के बुनियादी अधिकारों व उनकी नौकरी को बचाने के लिए एक साझा और निर्णायक संघर्ष की शुरुआत करें।

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