NEET रद्द होने से सदमे में 70 साल के अभ्यर्थी अशोक बहार, तबीयत बिगड़ी, 2 मांगों को लेकर कोर्ट जाने की तैयारी
70 साल की उम्र में नीट यूजी परीक्षा देकर मिसाल बनने वाले अशोक बहार को इसके रद्द होने से जबरदस्त झटका लगा है। वे बीमार पड़ गए हैं। अब वह चाहते हैं कि उनकी 3 मई वाली नीट परीक्षा के अंक को ही वैलिड मान लिया जाए।

NEET UG 2026 : नीट यूजी 2026 परीक्षा रद्द होने से 70 साल के अभ्यर्थी अशोक बहार को गहरा सदमा लगा है। उम्र के इस पड़ाव पर लगे झटके से वह बीमार पड़ गए हैं। 3 मई को देश के जिन 22 लाख विद्यार्थियों ने डॉक्टर बनने का ख्वाब लिए मेडिकल प्रवेश परीक्षा दी थी, उनमें लखनऊ के अशोक बहार भी एक थे। उन्होंने लखनऊ के माण्टेसरी स्कूल में युवा परीक्षार्थियों के बीच एग्जाम दिया था। उनके जज्बे की खबर और तस्वीर सोशल मीडिया पर काफी वायरल हुई थीं। हर किसी ने उनके जज्बे को सलाम किया था। लेकिन पेपर लीक होने के चलते अब परीक्षा रद्द हो गई है जिससे वह काफी आहत और मायूस हैं।
द न्यू इंडियन एक्सप्रेस से बात करते हुए उन्होंने कहा, 'नीट परीक्षा का रद्द होना मेरे लिए एक बहुत बड़ा झटका है। यकीन मानिए इससे मुझे इतना गहरा सदमा लगा कि मैं सचमुच बीमार पड़ गया। यह मेरा तीसरा प्रयास था और परीक्षा पास करना मेरे लिए बहुत मायने रखता था।'
बहार ने कहा, 'जरा उन 22 लाख उम्मीदवारों की हालत के बारे में सोचिए, जिन्होंने परीक्षा की तैयारी में काफी कुछ लगाया है।'
अब दो मांगे, कोर्ट जाने की तैयारी
वह जल्द ही इलाहाबाद हाई कोर्ट में एक याचिका दायर करने की योजना बना रहे हैं। उन्होंने कहा, 'दो चीजें हैं जिनके लिए मैं बहुत उत्सुक हूं। मेरे और दूसरे बुज़ुर्ग नागरिकों के लिए दोबारा परीक्षा देना बहुत मुश्किल होगा। उम्र को देखते हुए एक स्पेशल मामले के तौर पर 3 मई को कैंसिल हुई नीट परीक्षा में हमें मिले अंकों को ही फाइनल माना जा सकता है। मैं यह भी चाहता हूं कि कोर्ट बुज़ुर्ग नागरिकों के लिए मेडिकल सीटों में एक प्रतिशत आरक्षण दे।'
मां का सपना, पत्नी समेत परिवार में कई डॉक्टर
उनकी मां सावित्री देवी, जिनका 1990 में निधन हो गया था, हमेशा चाहती थीं कि वे डॉक्टर बनें, ठीक अपने पिता की तरह जो लखनऊ के एक सम्मानित चिकित्सक थे। परिवार का यह सपना उनके दिल में सालों से जिंदा रहा। अशोक बहार की पत्नी डॉ. मंजू बहार, एक अनुभवी स्त्री रोग विशेषज्ञ हैं, ने उनके इस अधूरे सपने को फिर से जगाया। उनके परिवार में करीब 20 डॉक्टर हैं, जिनमें कई विदेशों में भी प्रैक्टिस कर रहे हैं। बहार कहते हैं कि उन्होंने अपनी पत्नी से बहुत कुछ सीखा और उन्हीं के प्रोत्साहन से उन्होंने दोबारा NEET की तैयारी शुरू की। परिवार का यह सहयोग उनके लिए सबसे बड़ी ताकत बना।
उन्होंने बताया कि "मैंने पहली बार 1974 में मेडिकल एंट्रेंस परीक्षा दी थी, जब इसे CPMT के नाम से जाना जाता था, और मैं इसे पास नहीं कर पाया था। मेरा दूसरा प्रयास 2023 में था, लेकिन मेरा सेंटर एक दूरदराज की जगह पर था; मैं देर से पहुंचा और मुझे परीक्षा देने की अनुमति नहीं मिली। तीन साल बाद, मैंने इस साल मई में यह परीक्षा दी।"
कैसे की तैयारी
अपनी तैयारियों के बारे में पूछे जाने पर 70 साल के इस बुजुर्ग ने कहा, “एक उम्र के बाद, आपको हर चीज़ के बारे में एक तरह की समझ और ज्ञान मिल जाता है। मैं किसी कोचिंग सेंटर में नहीं गया। दोस्तों और कुछ शुभचिंतकों से मिली
अध्ययन सामग्री की मदद से मैंने खुद ही तैयारी की।” उन्होंने कहा कि मैं दवाओं के बारे में बहुत कुछ जानता हूं, लेकिन दवाएं लिख नहीं सकता। दवा लिखने के लिए डॉक्टर की डिग्री होनी चाहिए। इसलिए परीक्षा दी। परीक्षा में सफलता मिले न मिले, प्रयास करते रहना चाहिए।
कितने पढ़े लिखे हैं अशोक बहार, कहां किया काम
उन्होंने लखनऊ यूनिवर्सिटी से पढ़ाई की है। बॉटनी (वनस्पति विज्ञान), जूलॉजी (प्राणी विज्ञान) और केमिस्ट्री (रसायन विज्ञान) में बी.एससी (B.Sc) की डिग्री प्राप्त की है। इसके बाद उन्होंने कंप्यूटर एप्लीकेशन में पोस्टग्रेजुएट डिप्लोमा पूरा किया। उनके पास कानून (लॉ) की डिग्री भी है। इसके अलावा, उन्होंने एमबीए (MBA) भी किया हुआ है। इन डिग्रियों को हासिल करने के बाद उन्होंने कई दशकों तक उन्होंने इंडियन ड्रग्स एंड फार्मास्युटिकल्स लिमिटेड (IDPL) में उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के मार्केटिंग हेड के रूप में काम किया। इसके बाद उन्होंने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (VRS) ली और विदेश मंत्रालय के साथ कंसल्टेंट के रूप में भी योगदान दिया। उन्होंने एक स्थानीय अखबार के संपादक के रूप में काम किया और साथ ही पार्ट-टाइम वकील के तौर पर भी काम किया।
बना रहे दिव्य प्रेम आश्रम, करेंगे आश्रम में रहने वालों की सेवा
अशोक बहार लखनऊ के पास स्थित अपने गांव गहरू में 'दिव्य प्रेम आश्रम' का निर्माण कर रहे हैं। इस आश्रम के माध्यम से उनकी मुख्य योजना यह है कि चिकित्सा का ज्ञान (मेडिकल डिग्री) प्राप्त करने के बाद वे आश्रम के निवासियों की सेवा करें। वे अपनी डॉक्टरी की पढ़ाई का उपयोग विशेष रूप से इस आश्रम में रहने वाले लोगों के स्वास्थ्य और भलाई के लिए करना चाहते हैं।
हेपेटोलॉजी में करना चाहते हैं विशेषज्ञता
70 साल की उम्र में भी उनका लक्ष्य सिर्फ डॉक्टर बनना ही नहीं, बल्कि हेपेटोलॉजी यानी लिवर से जुड़ी बीमारियों में विशेषज्ञता हासिल करना है। वे बताते हैं कि आज के समय में फैटी लिवर जैसी बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं और यह एक तरह की महामारी का रूप ले रही हैं। ऐसे में वे इस क्षेत्र में काम करके समाज की सेवा करना चाहते हैं।




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