MBBS : रूसी चीनी भाषा में एमबीबीएस किया तो डिग्री होगी बेकार, सरकार ने विदेश से डॉक्टरी करने वालों को किया आगाह
पूर्व सोवियत देशों और चीन में करीब 8-10 हजार छात्र प्रतिवर्ष मेडिकल की पढ़ाई के लिए जा रहे हैं। इनमें से 70-80 फीसदी चीनी, रूसी और अन्य स्थानीय भाषाओं में मेडिकल की शिक्षा ले रहे हैं। ऐसे छात्रों के लिए मुश्किलें बढ़ सकती हैं।

राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (एनएमसी) ने आगाह किया है कि सिर्फ अंग्रेजी माध्यम से की गई मेडिकल की पढ़ाई ही भारत में मान्य होगी। भारत से बड़े पैमाने पर छात्र चीन और रूस और पूर्व सोवियत देशों में मेडिकल की पढ़ाई के लिए जा रहे हैं। इनमें अधिकतर छात्र उन देशों की स्थानीय भाषा में मेडिकल की पढ़ाई कर रहे हैं। इसको देखते हुए एनएमसी ने यह कदम उठाया है।
उजबेकिस्तान के चार विश्वविद्यालय ब्लैकलिस्ट
राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग की ओर से विदेश में भारतीय छात्रों को मेडिकल शिक्षा देने वाले संस्थाानों को चिह्नित भी किया जा रहा है। जानकारी के अनुसार, हाल ही में आयोग ने उजबेकिस्तान के चार ऐसे विश्वविद्यालयों को भी ब्लैकलिस्ट किया है।
भारत में अधिक होता है खर्चा
भारत में एमबीबीएस की सीटें 1.29 लाख तक पहुंच गई हैं, लेकिन निजी मेडिकल कॉलेजों में मेडिकल की पढ़ाई बेहद महंगी है। पूरे कोर्स में एक करोड़ रुपये से भी ज्यादा का खर्च आता है। ऐसे में भारतीय छात्र विदेश में जाकर एमबीबीएस करने का रास्ता अपनाते हैं। इसके अलावा बहुत से स्टूडेंट्स को नीट में कम अंक होने के चलते भारत में प्राइवेट व सरकारी किसी भी मेडिकल कॉलेज में दाखिला नहीं मिल पाता, ऐसे में वे विदेश के मेडिकल संस्थान से डॉक्टरी करने का रास्ता चुनते हैं।
एक चौथाई खर्चे पर विदेश में पढ़ाई का अवसर
जानकारी के अनुसार, भारत में भले ही मेडिकल की पढ़ाई अत्यधिक महंगी हो चुकी है, लेकिन चीन, रूस और कई अन्य देशों से अब भी भारत के मुकाबले एक चौथाई कम खर्च में मेडिकल का कोर्स हो जाता है। यानी जो पढ़ाई भारत में एक करोड़ से अधिक रकम खर्च करने के बाद हो रही है, वही पढ़ाई इन देशों में 20 से 25 लाख रुपये खर्च करने होते हैं। यही वजह है कि भारतीय छात्र वहां जाते हैं। इन देशों में कुछ विश्वविद्यालय अंग्रेजी में शिक्षण करते हैं, लेकिन ज्यादातर में अपने देश की भाषा में होती है। ऐसे में भारत से जाने वाले छात्र पहले एक साल स्थानीय भाषा सीखते हैं।
हजारों छात्रों की मुश्किलें बढ़ेंगी
एक अनुमान के अनुसार, पूर्व सोवियत देशों और चीन में करीब 8-10 हजार छात्र प्रतिवर्ष मेडिकल की पढ़ाई के लिए जा रहे हैं। इनमें से 70-80 फीसदी चीनी, रूसी और अन्य स्थानीय भाषाओं में मेडिकल की शिक्षा ले रहे हैं। ऐसे छात्रों के लिए मुश्किलें बढ़ सकती हैं।
खास बातें
- पूर्व सोवियत देशों और चीन में भारत से हर साल आठ से 10 हजार छात्र मेडिकल की पढ़ाई करने जा रहे हैं।
- विदेश जाने वाले करीब 80 प्रतिशत छात्र उन्हीं देशों की स्थानीय भाषाओं में मेडिकल शिक्षा हासिल कर रहे हैं।
- विदेशों में पढ़ने के लिए जाने वाले छात्रों को शुरुआती एक साल तक स्थानीय भाषा सीखनी होती है।
- विदेशों से बिना अंग्रेजी माध्यम के पढ़ाई करने वाले छात्रों को नए आदेश के बाद नीट परीक्षा में बैठने की अनुमति नहीं दी जाएगी।




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