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कभी फोन नहीं दिया, गलतियां कीं वरना रैंक 1 होती, JEE एडवांस AIR 4 छात्र के ISRO वैज्ञानिक पिता की उम्मीदों पर छिड़ी बहस

मोहित ने जेईई एडवांस्ड में AIR 4 हासिल की, लेकिन उनके पिता के कुछ गलतियां न होतीं तो रैंक 1 आती वाले बयान ने सोशल मीडिया पर पेरेंट्स के अनावश्यक दबाव और अनुशासन की बहस छेड़ दी है।

Fri, 5 June 2026 03:42 PMPankaj Vijay लाइव हिन्दुस्तान
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कभी फोन नहीं दिया, गलतियां कीं वरना रैंक 1 होती, JEE एडवांस AIR 4 छात्र के ISRO वैज्ञानिक पिता की उम्मीदों पर छिड़ी बहस

आईआईटी प्रवेश परीक्षा जेईई एडवांस्ड 2026 में हैदराबाद के छात्र मोहित शेखर शुक्ला ने ऑल इंडिया रैंक 4 हासिल की है। देश की सबसे चुनौतीपूर्ण परीक्षाओं में से एक जेईई एडवांस्ड में चौथा स्थान लाकर उन्होंने देशभर में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया है। तेलंगाना टॉपर बने मोहित की सफलता की कहानी जरूर प्रेरणादायक है लेकिन उनकी तैयारी, पढ़ने के तौर तरीके व दबाव और बेहद सख्त रूटीन ने उनके परिवार की परवरिश और अनुशासन को लेकर सोशल मीडिया पर बहस भी छेड़ दी है।

मोहित ने नियमित रूप से प्रतिदिन 8 से 10 घंटे पढ़ाई की और सोशल मीडिया से लगभग पूरी तरह दूरी बनाए रखी। जेईई मेन 2026 में उनकी 228वीं रैंक आई थी, लेकिन एडवांस्ड में उन्होंने शानदार प्रदर्शन करते हुए देश में चौथा स्थान हासिल किया।

पिता इसरो में वैज्ञानिक, बेटो को रखा मोबाइल से दूर

छात्र के पिता मनीष शेखर शुक्ला राष्ट्रीय अंतरिक्ष एजेंसी इसरो (ISRO) में वैज्ञानिक हैं। उन्होंने बताया कि मोहित को बचपन से ही मोबाइल फोन नहीं दिया गया। उन्होंने बताया कि परिवार ने ध्यान भटकाने वाली चीजों को कम से कम रखा था। उन्होंने तेलंगाना टुडे को बताया, 'गूगल सर्च के लिए कंप्यूटर का इस्तेमाल करने के अलावा हमने मोहित को बचपन से कभी मोबाइल फोन नहीं दिया। उसने कुछ छोटी-छोटी गलतियां कीं, वरना वह पहली रैंक हासिल कर सकता था। हम उसकी कामयाबी से खुश हैं।'

मां भी थी इसरो में वैज्ञानिक

मोहित की मां भी ISRO में वैज्ञानिक थीं, लेकिन परिवार को संभालने के लिए उन्होंने नौकरी छोड़ दी थी। अब मोहित अपने बड़े भाई की तरह आईआईटी बॉम्बे से कंप्यूटर साइंस की पढ़ाई करना चाहते हैं। उन्होंने बताया, 'मैं IIT बॉम्बे से कंप्यूटर साइंस और इंजीनियरिंग करना चाहता हूं, जो अपने कोर्स, कैंपस प्लेसमेंट और सैलरी पैकेज के लिए मशहूर है। मैंने अपने भविष्य के प्लान के बारे में अभी कुछ तय नहीं किया है लेकिन इंजीनियरिंग के बाद नौकरी करने का इरादा है।'

अनुशासन बनाम उम्मीदें

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जैसे ही मोहित की सफलता की कहानी वायरल हुई, कई सोशल मीडिया यूजर्स ने उनके व्यवस्थित तरीके की तारीफ की, लेकिन AIR 4 लाने के बावजूद टॉप रैंक न मिलने पर पिता की टिप्पणी बहस का मुद्दा बन गई। पिता का यह बयान कि "कुछ छोटी गलतियां न होतीं तो मोहित पहली रैंक हासिल कर सकता था" सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बन गया। कई लोगों ने इसे माता पिता की जरूरत से ज्यादा उम्मीदों वाला बताया। यूजर्स ने सवाल उठाया कि देश में चौथी रैंक हासिल करने जैसी बड़ी उपलब्धि के बाद भी पहली रैंक न आने की बात करना बच्चों पर अतिरिक्त दबाव बना सकता है।

वहीं दूसरी ओर, कई लोगों ने परिवार के अनुशासन और त्याग की सराहना भी की। उनका कहना था कि जेईई जैसी कठिन परीक्षा में शीर्ष रैंक हासिल करने के लिए पूरे परिवार को वर्षों तक समर्पण और अनुशासन के साथ काम करना पड़ता है।

कुछ यूजर्स ने इस तरीके को व्यावहारिक बताते हुए इसका बचाव किया। एक कमेंट में कहा गया, 'आप ऐसे माता-पिता को ट्रोल करते रह सकते हैं। लेकिन इसके अलावा कोई और रास्ता नहीं है... भारत में बिना जान-पहचान (कनेक्शन) के रहना बहुत अपमानजनक अनुभव होता है।"

दबाव को लेकर विरोध

अति अनुशासन की कीमत को लेकर आलोचना हुई। एक एक्स यूजर ने लिखा, 'एक टॉप इंस्टिट्यूट से इंजीनियरिंग करने के लिए यह सब. रैंक के पीछे भागना स्टेटस के पीछे भागने जैसा है।' उन्होंने सवाल उठाया कि क्या नतीजे इतनी मेहनत के लायक हैं। एक और व्यक्ति ने कहा: 'जिंदगी के सबसे अच्छे सालों की बर्बादी... बिना रटे भी वही नतीजा पाया जा सकता है।'

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कुछ लोगों ने मानसिक स्वास्थ्य और अपनी मर्जी से फैसले लेने की आज़ादी को लेकर भी चिंता जताई। एक एक्स यूजर ने लिखा, "मैं बस यही चाहता हूं कि बच्चा दुनिया देखे और अपने माता-पिता से ज्यादा समझदार बने, ताकि जब उसके बच्चे हों तो यह सिलसिला टूट जाए।' वहीं एक और व्यक्ति ने कहा, 'किस्मत अच्छी थी कि यह लड़का साइकियाट्रिक वार्ड (मानसिक रोग अस्पताल) नहीं पहुंचा।'

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सफलता कैसे हासिल की

मोहित ने श्री चैतन्य एकडेमी से कोचिंग लेकर यह सफलता हासिल की। उन्होंने इंटरव्यू में कहा कि उनका रूटीन केवल पढ़ाई तक ही सीमित नहीं था, बल्कि यह एक बहुत ही अच्छी तरह से प्रबंधित शेड्यूल था। इसमें पर्याप्त नींद और अच्छे भोजन के लिए उचित समय निर्धारित था। हर दिन अपनी दिनचर्या का कड़ाई से पालन करना उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती थी, लेकिन लगातार ऐसा करने से यह उनकी आदत बन गई। इसी निरंतरता की वजह से वे अपने अंकों को भी लगातार बनाए रख सके।

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