गलती पहले दिख रही थी, मगर डर से चुप थे; CBSE के डिजिटल एग्जाम सिस्टम पर क्या बोले टीचर
सीबीएसई के ऑन-स्क्रीन मार्किंग सिस्टम को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। अब शिक्षकों और प्रिंसिपलों ने दावा किया है कि डिजिटल मूल्यांकन में तकनीकी खामियां पहले से दिख रही थीं लेकिन कार्रवाई के डर से कोई खुलकर बोल नहीं पाया।

देश के सबसे बड़े स्कूल बोर्ड सीबीएसई का नया डिजिटल मूल्यांकन सिस्टम अब लगातार विवादों में घिरता जा रहा है। पहले छात्रों ने आरोप लगाए कि उनकी उत्तर पुस्तिकाएं धुंधली थीं, कई पन्ने गायब थे और कुछ को तो किसी दूसरे छात्र की कॉपी तक दिखा दी गई। लेकिन अब इस पूरे मामले में एक नया और बेहद गंभीर पक्ष सामने आया है। कई शिक्षकों और प्रिंसिपलों का कहना है कि ये समस्याएं रिजल्ट आने के बाद नहीं शुरू हुईं, बल्कि कॉपियां जांचते समय ही साफ दिखाई देने लगी थीं। दिल्ली के कई मूल्यांकन केंद्रों में काम कर चुके शिक्षकों ने दावा किया है कि ऑन-स्क्रीन मार्किंग यानी OSM सिस्टम के दौरान उन्हें बार-बार तकनीकी दिक्कतों का सामना करना पड़ा। कभी स्कैन धुंधले हो जाते थे, कभी सप्लीमेंट्री शीट खुलती ही नहीं थी, तो कभी स्क्रीन पर पन्ने अचानक गायब हो जाते थे। कई शिक्षकों का कहना है कि उन्हें समझ ही नहीं आता था कि छात्र ने आखिर लिखा क्या है।
'सिस्टम में दिक्कत थी, लेकिन कोई बोलने की हिम्मत नहीं कर रहा था'
मामला सिर्फ तकनीकी खामियों तक सीमित नहीं रहा। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट की मानें तो शिक्षकों का आरोप है कि मार्च में CBSE की तरफ से जारी एक सर्कुलर के बाद ऐसा माहौल बन गया था कि कोई भी खुलकर सवाल उठाने से डरने लगा। सीबीएसई ने 16 मार्च को एक एडवाइजरी जारी की थी, जिसमें शिक्षकों से सोशल मीडिया पर मूल्यांकन प्रक्रिया से जुड़ी “भ्रामक जानकारी” साझा न करने को कहा गया था। बोर्ड का कहना था कि इससे भ्रम फैल सकता है। लेकिन कई शिक्षकों के मुताबिक, जमीन पर इसका असर बिल्कुल अलग हुआ। एक शिक्षक ने कहा कि लोगों को डर था कि अगर उन्होंने खुलकर तकनीकी खामियों की बात की तो भविष्य में उन्हें मूल्यांकन कार्य से बाहर किया जा सकता है या नोटिस भेजा जा सकता है। इसी वजह से ज्यादातर शिक्षक चुप रहे।
इतने बड़े बदलाव के लिए तैयारी अधूरी बता रहे शिक्षक
कई शिक्षकों ने यह भी कहा कि डिजिटल मूल्यांकन की तैयारी बहुत जल्दबाजी में की गई। उनका कहना है कि कुछ शिक्षकों को सिर्फ एक हफ्ते के आसपास ट्रेनिंग दी गई, जबकि लाखों कॉपियों को अचानक पूरी तरह डिजिटल सिस्टम में शिफ्ट करना आसान नहीं था। गणित के एक परीक्षक ने बताया कि लंबे सब्जेक्टिव जवाब स्क्रीन पर पढ़ना बेहद थकाऊ था। ऊपर से सर्वर बार-बार रुक जाता था और तस्वीरें साफ नहीं दिखती थीं। ऐसे में सही मूल्यांकन करना मुश्किल हो जाता था। कुछ शिक्षकों ने कहा कि उम्रदराज परीक्षकों को डिजिटल इंटरफेस अपनाने में और ज्यादा परेशानी हुई। कई लोग सिस्टम समझते-समझते ही छात्रों की कॉपियां जांच रहे थे।
अब कई शिक्षक मानते हैं कि अगर मार्च में ही तकनीकी समस्याओं को गंभीरता से लिया जाता तो मामला इतना नहीं बढ़ता। उनका कहना है कि कॉपी जांचते समय ही यह अंदाजा हो गया था कि रिजल्ट आने के बाद छात्र शिकायत करेंगे। शिक्षकों के मुताबिक, मूल्यांकन केंद्रों में आपस में इन दिक्कतों पर चर्चा होती थी, लेकिन कोई आधिकारिक तौर पर सिस्टम को चुनौती देने की स्थिति में नहीं था। इसी वजह से समस्याएं दबती चली गईं और रिजल्ट आने के बाद अचानक विस्फोट की तरह सामने आ गईं। विवाद तब और बढ़ गया जब छात्रों ने री-इवैल्यूएशन के दौरान अपनी स्कैन की गई उत्तर पुस्तिकाएं देखीं। कई छात्रों ने आरोप लगाया कि उनकी कॉपियां अधूरी थीं या गलत कॉपी अपलोड कर दी गई थी। एक छात्र के मामले में तो CBSE को बाद में यह मानना पड़ा कि पहले गलत कॉपी भेज दी गई थी।
अब स्कूलों पर सिस्टम बचाने का दबाव?
रिपोर्ट की मानें तो विवाद के बीच कई प्रिंसिपलों ने यह भी दावा किया है कि स्कूलों को माहौल शांत करने और OSM सिस्टम के पक्ष में सकारात्मक संदेश देने के लिए कहा जा रहा है। हालांकि इसके लिए कोई आधिकारिक आदेश नहीं दिया गया, लेकिन शिक्षकों का कहना है कि व्हाट्सऐप ग्रुप और बैठकों के जरिए ऐसा माहौल बनाया गया कि स्कूलों को सिस्टम पर भरोसा दिखाना चाहिए। कुछ प्रिंसिपलों ने इसे असहज स्थिति बताया। उनका कहना है कि एक तरफ छात्र और अभिभावक सवाल पूछ रहे हैं, दूसरी तरफ स्कूलों से कहा जा रहा है कि वे लोगों को भरोसा दिलाएं कि सब ठीक चल रहा है। शिक्षकों का कहना है कि असली सवाल यह है कि प्राथमिकता समस्या सुलझाने की है या सिर्फ माहौल संभालने की।
कई शिक्षकों ने साफ कहा कि वे तकनीक के खिलाफ नहीं हैं। उनका कहना है कि डिजिटल सिस्टम भविष्य का हिस्सा है, लेकिन इतने बड़े बदलाव के लिए मजबूत तैयारी जरूरी थी। शिक्षकों के मुताबिक, ऑन-स्क्रीन मार्किंग के लिए बेहतर सर्वर, साफ स्कैनिंग, लंबे समय की ट्रेनिंग और मजबूत तकनीकी सपोर्ट चाहिए था। लेकिन जमीन पर इन चीजों की कमी महसूस हुई। अब यह विवाद सिर्फ तकनीकी गड़बड़ियों तक सीमित नहीं रहा। छात्रों के लिए यह उनके भविष्य और भरोसे का सवाल बन चुका है। वहीं शिक्षकों के लिए यह इस बात का मुद्दा बन गया है कि क्या शिक्षा व्यवस्था समय रहते अपनी गलतियों को सुनने और स्वीकार करने के लिए तैयार है।
राजनीति भी गरमाई, राहुल गांधी और धर्मेंद्र प्रधान आमने-सामने
सीबीएसई का यह विवाद अब राजनीतिक रंग भी ले चुका है। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने सोशल मीडिया पर सरकार से जवाब मांगा और डिजिटल मूल्यांकन से जुड़े ठेके को लेकर भी सवाल उठाए। राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि जिस कंपनी को यह जिम्मेदारी दी गई, उसका नाम पहले भी विवादों में रहा है। उन्होंने कहा कि लाखों छात्रों के भविष्य से जुड़े मामले में जवाबदेही तय होनी चाहिए। इसके जवाब में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने राहुल गांधी पर राजनीति करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि यह राजनीति का समय नहीं है और अगर किसी तरह की गड़बड़ी मिली तो किसी को छोड़ा नहीं जाएगा। सबसे अहम बात यह रही कि धर्मेंद्र प्रधान ने पहली बार सार्वजनिक रूप से कहा कि अगर छात्रों को किसी तरह की परेशानी हुई है तो उसकी जिम्मेदारी वह खुद लेते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि लाखों छात्र पहले ही अपनी स्कैन की गई उत्तर पुस्तिकाएं देख चुके हैं और हर शिकायत की जांच की जाएगी।




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