पहले हुए फेल, फिर UPSC में गाड़ दिए झंडे, किसान के बेटे ने कैसे हासिल की AIR 1
कर्नाटक के किसान परिवार से आने वाले बसवराज धरेप्पा केंपावड ने UPSC भारतीय वन सेवा 2025 में AIR 1 हासिल कर देशभर में मिसाल कायम की। जानिए असफलता, संघर्ष और सेल्फ स्टडी से जुड़ी उनकी पूरी प्रेरणादायक कहानी।

कर्नाटक के बेलगावी जिले का सावदी गांव आम दिनों में बिल्कुल शांत रहता है। यहां की जिंदगी खेतों, मेहनत और रोजमर्रा की जिम्मेदारियों के बीच गुजरती है। लेकिन इसी छोटे से गांव से एक ऐसी कहानी निकली है, जिसने पूरे देश का ध्यान अपनी तरफ खींच लिया है। 25 साल के बसवराज धरेप्पा केंपावड ने UPSC आईएफएस यानी भारतीय वन सेवा में रैंक 1 हासिल कर यह साबित कर दिया कि बड़े सपने देखने के लिए बड़े शहर या अमीर पृष्ठभूमि की जरूरत नहीं होती। जरूरत होती है सिर्फ लगातार मेहनत, धैर्य और खुद पर भरोसे की।
किसान परिवार से निकलकर बनाया नया इतिहास
बसवराज एक साधारण किसान परिवार से आते हैं। उनके पिता धरेप्पा केंपावड खेती करते हैं और परिवार की आर्थिक स्थिति हमेशा बहुत मजबूत नहीं रही। कई बार पढ़ाई का खर्च उठाने के लिए परिवार को अतिरिक्त मेहनत करनी पड़ी।
गांव में शुरुआती पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने मोरारजी देसाई रेजिडेंशियल स्कूल में शिक्षा हासिल की। इसके बाद उन्होंने यल्लट्टी में पीयू की पढ़ाई की और फिर उत्तर कन्नड़ के सिरसी स्थित कॉलेज ऑफ फॉरेस्ट्री से फॉरेस्ट्री से बीएससी किया। प्रकृति और जंगलों के प्रति उनका लगाव बचपन से ही था। यही वजह रही कि उन्होंने भारतीय वन सेवा को अपना लक्ष्य बनाया।
पहली असफलता ने तोड़ा नहीं, बदल दिया
आज देशभर में टॉपर बनने वाले बसवराज की कहानी सीधे सफलता तक पहुंचने वाली नहीं थी। उन्होंने पहली बार UPSC IFS 2024 परीक्षा दी थी, लेकिन वह प्रारंभिक परीक्षा भी पास नहीं कर सके। यह उनके लिए बड़ा झटका था। गांव से निकले एक युवा के लिए यह सिर्फ परीक्षा में असफलता नहीं थी, बल्कि खुद को साबित करने की चुनौती भी थी।
लेकिन उन्होंने हार मानने के बजाय अपनी गलतियों को समझा। उन्होंने अपनी तैयारी का तरीका बदला, कमजोरियों पर काम किया और पूरी रणनीति दोबारा तैयार की। अगले ही प्रयास में उन्होंने वही परीक्षा टॉप कर दी, जिसमें पहले वह शुरुआती चरण तक नहीं निकाल पाए थे। यही बदलाव उनकी कहानी को खास बनाता है।
बेंगलुरु की लाइब्रेरी में बीते संघर्ष के दिन
UPSC की तैयारी के लिए बसवराज बेंगलुरु चले गए। वहां जिंदगी बिल्कुल आसान नहीं थी। एक छोटे कमरे में अकेले रहना, सीमित पैसों में गुजारा करना और लगातार पढ़ाई करना उनके रोज के संघर्ष का हिस्सा बन गया। उन्होंने किसी बड़े कोचिंग संस्थान का सहारा नहीं लिया। उनकी पूरी तैयारी सेल्फ स्टडी पर आधारित थी। वह सुबह से देर रात तक लाइब्रेरी में बैठकर पढ़ाई करते थे।
करीब 14 घंटे रोज पढ़ाई करना उनकी आदत बन गई थी। पढ़ाई के दौरान वह मोबाइल फोन बंद रखते थे ताकि ध्यान पूरी तरह पढ़ाई पर रहे। उनका मानना था कि ज्यादा किताबें पढ़ने से ज्यादा जरूरी है सीमित चीजों को बार-बार अच्छी तरह समझना।
तैयारी का तरीका बना सबसे बड़ी ताकत
बसवराज की तैयारी बेहद साधारण लेकिन अनुशासित थी। उन्होंने अपनी अकादमिक पृष्ठभूमि के अनुसार Forestry और Geology को वैकल्पिक विषय चुना। उन्होंने नोट्स कम बनाए लेकिन बार-बार रिवीजन किया। पहली असफलता के बाद उन्होंने हर गलती को लिखकर समझा और फिर उसी के आधार पर नई रणनीति बनाई। उनकी सबसे बड़ी ताकत लगातार एक जैसी मेहनत करना थी। बिना शोर, बिना दिखावे और बिना किसी दबाव के उन्होंने खुद को तैयारी में पूरी तरह झोंक दिया।
इंटरव्यू में किताबों से नहीं, जिंदगी से दिए जवाब
UPSC इंटरव्यू में बसवराज ने सिर्फ जानकारी नहीं दिखाई, बल्कि प्रकृति से अपना वास्तविक जुड़ाव भी बताया। उन्होंने इंटरव्यू बोर्ड को बताया कि बचपन में वह घर के आसपास छोटी जगहों में भी यूकेलिप्टस के पौधे लगाया करते थे। यही लगाव आगे चलकर उनके करियर का सपना बन गया।
उनसे जंगल संरक्षण, जैव विविधता, बाघों की संख्या, पर्यावरणीय चुनौतियों और आईएफएस चुनने की वजह जैसे सवाल पूछे गए। उनके जवाब रटे हुए नहीं थे। उनमें जमीन से जुड़ा अनुभव और सच्चाई दिखाई देती थी, जिसने इंटरव्यू बोर्ड को प्रभावित किया।
पूरे देश में हासिल किया पहला स्थान
UPSC Indian Forest Service Examination 2025 में बसवराज धरेप्पा केंपावड ने रैंक 1 हासिल की। देशभर से चुने गए 148 उम्मीदवारों में वह पहले स्थान पर रहे। सावदी गांव के इस बेटे की सफलता अब हजारों UPSC अभ्यर्थियों के लिए प्रेरणा बन चुकी है। खासकर उन युवाओं के लिए, जो छोटे गांवों और साधारण परिवारों से आते हैं और मानते हैं कि बड़े सपने उनके लिए मुश्किल हैं।
युवाओं के लिए उनकी कहानी क्यों खास है
बसवराज की कहानी सिर्फ एक परीक्षा पास करने की कहानी नहीं है। यह उस भरोसे की कहानी है, जो इंसान खुद पर करता है जब उसके पास संसाधन कम होते हैं। उन्होंने साबित किया कि असफलता अंत नहीं होती। अगर इंसान अपनी गलतियों से सीख ले और लगातार मेहनत करता रहे, तो वही असफलता सबसे बड़ी ताकत बन सकती है। उनकी यात्रा यह भी बताती है कि गांव से निकलने वाला युवा भी देश के सबसे कठिन इम्तिहानों में शीर्ष स्थान हासिल कर सकता है, अगर उसके अंदर लक्ष्य के लिए सच्ची लगन हो।




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