क्या LPG की जगह लेगा पानी मिला एथेनॉल, नितिन गडकरी के दावे में कितनी है सच्चाई?
एथेनॉल स्टोव खाना पकाने की आधुनिक तकनीक है। यह गन्ने या मक्के जैसी फसलों से तैयार बायो फ्यूल पर काम करती है। इसे LPG सिलेंडर का बेहतर विकल्प भी समझा जा सकता है। विज्ञान भी कहता है कि LPG की तरह एथेनॉल से खाना पकाना संभव है, लेकिन…

पेट्रोल में मिलने वाला एथेनॉल आने वाले समय में आपकी रसोई गैस की जगह ले सकता है। यह LPG के मुकाबले काफी सस्ता पड़ सकता है। केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने हाल ही में कहा, “पानी में 7 प्रतिशत एथेनॉल मिलाने पर स्टोव जैसी लौ पैदा होती है और यह रसोई गैस से सस्ती है। यह पूरी तरह स्वदेशी तकनीक है।” इस बयान ने एक बार फिर घरेलू रसोई के लिए अल्कोहल-आधारित ईंधनों को चर्चा में ला दिया है। आइए समझें क्या एथेनॉल वाकई एलपीजी की जगह ले सकता है और क्या विज्ञान इस दावे का समर्थन करता है?
क्या है एथेनॉल स्टोव और इसकी खासियत
एथेनॉल स्टोव खाना पकाने की आधुनिक तकनीक है। यह गन्ने या मक्के जैसी फसलों से तैयार बायो फ्यूल पर काम करती है। इसे LPG सिलेंडर का बेहतर विकल्प भी समझा जा सकता है। इसकी खासियत है कि यह बिना धुएं, गंध और कालिख के LPG जैसी तेज आंच देता है। यह लिक्विड और जेल दोनों तरह के एथेनॉल ईंधन पर काम करता है। यह सेहत और पर्यावरण के लिए भी एक बेहतरीन विकल्प साबित हो सकता है।
क्या पानी में मिलाया गया एथेनॉल जल सकता है?
एथेनॉल एक ज्वलनशील अल्कोहल है। इसका इस्तेमाल पहले से ही वाहनों में बायो फ्यूल के रूप में बड़े पैमाने पर हो रहा है। एलपीजी एक दबाव में भरी हाइड्रोकार्बन गैस है, जबकि एथेनॉल एक तरल ईंधन है। यह तब जलता है, जब इसकी पर्याप्त वाष्प हवा में ऑक्सीजन से मिलकर ज्वलन तापमान पर पहुंचती है।
इंडिया टूडे की खबर के मुताबिक साइंटिफिक रिसर्च बताते हैं कि एथेनॉल की कंसंट्रेशन यहां सबसे अहम चीज है। ‘जर्नल ऑफ लॉस प्रिवेंशन इन द प्रोसेस इंडस्ट्रीज’ में प्रकाशित स्टडीज से पता चला कि पानी के साथ एथेनॉल की बेहद पतली मात्रा लगातार जलने में मुश्किल पैदा करती है। दरअसल, पानी ज्वलनशील वाष्प बनने की प्रक्रिया को कमजोर कर देता है।
7 प्रतिशत से कम एथेनॉल वाले मिश्रण सामान्य परिस्थितियों में स्थिर लौ बनाए रखने में अक्सर असफल रहते हैं। यही कारण है कि बीयर जैसी अल्कोहल वाली चीजें आसानी से आग नहीं पकड़तीं।
कमर्शियल एथेनॉल स्टोव गाढ़े एथेनॉल का इस्तेमाल करते हैं
हकीकत में, कमर्शियल एथेनॉल स्टोव इतने पतले मिश्रण नहीं जलाते। ये आमतौर पर 70 से 90 प्रतिशत या उससे ज्यादा गाढ़े एथेनॉल पर चलते हैं। इससे पर्याप्त मात्रा में वाष्प बनती है और बिल्कुल एलपीजी जैसी एक साफ व लगातार नीली लौ मिलती है।
रसायन विज्ञान के हिसाब से देखें तो शुद्ध एथेनॉल का फ्लैश प्वाइंट करीब 13 डिग्री सेल्सियस होता है, यानी ठंडे मौसम में भी यह आग पकड़ने लायक वाष्प दे सकता है, लेकिन जैसे-जैसे पानी की मात्रा बढ़ती है, वाष्प का दबाव कम हो जाता है और पानी गर्मी सोखकर जलने की प्रक्रिया को और कठिन बना देता है। रिचर्स यह भी बताता है कि एथेनॉल-हवा का मिश्रण तभी जलता है, जब वाष्प की मात्रा एक तय ज्वलनशील सीमा के भीतर हो।
क्या गडकरी का दावा वैज्ञानिक रूप से सही है?
अगर स्टोव में पर्याप्त सांद्रता वाला यानी गाढ़ा एथेनॉल इस्तेमाल किया जाए और बर्नर इस तरह डिजाइन हो कि फ्यूल सही ढंग से वाष्प में बदल सके तो गडकरी का दावा पूरी तरह संभव है। इसलिए केवल 7 प्रतिशत वाला मिश्रण सीधे आग नहीं देगा, लेकिन सही इंजीनियरिंग और सांद्रता के साथ तकनीक व्यवहारिक है।
क्या यह खाना पकाने का ईंधन सस्ता कर सकता है?
इसकी सस्तीपन की गारंटी पूरी तरह ईंधन की कीमत, एथेनॉल उत्पादन के पैमाने और डिस्ट्रीब्यूशन स्ट्रक्चर पर निर्भर करती है। भारत में एथेनॉल उद्योग तेजी से बढ़ रहा है, खासतौर पर गन्ना से बनने वाले एथेनॉल की वजह से और पेट्रोल में एथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम के चलते इसे बढ़ावा मिला है। समर्थकों का तर्क है कि खाना पकाने में घरेलू उत्पादित एथेनॉल का इस्तेमाल आयातित एलपीजी पर निर्भरता कम कर सकता है।




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