Parallel CIRP under the IBC can proceed against debtor and corporate guarantor SC rules लोन के गारंटर की भी अब बढ़ेगी मुश्किलें, सुप्रीम कोर्ट ने दिया है बड़ा आदेश, Business Hindi News - Hindustan
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लोन के गारंटर की भी अब बढ़ेगी मुश्किलें, सुप्रीम कोर्ट ने दिया है बड़ा आदेश

यह फैसला आईसीआईसीआई बैंक और भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) सहित प्रमुख वित्तीय संस्थानों द्वारा अलग-अलग इंफ्रास्ट्रक्चर और रियल एस्टेट कंपनियों के खिलाफ दायर अपीलों के एक समूह के बाद आया है।

Fri, 27 Feb 2026 12:25 AMDeepak Kumar लाइव हिन्दुस्तान
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लोन के गारंटर की भी अब बढ़ेगी मुश्किलें, सुप्रीम कोर्ट ने दिया है बड़ा आदेश

डिफॉल्ट की स्थिति में कर्ज लेने वाले और इसके गारंटर, दोनों की मुश्किलें बढ़ जाएंगी। सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक आदेश में यह बात कही है। उन्होंने कहा कि एक ही कर्ज के लिए मूल कर्जदार और उसके कॉरपोरेट गारंटर दोनों के खिलाफ एक साथ दिवाला कार्यवाही चलाई जा सकती है। न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने अपने फैसले में कहा कि दिवाला एवं ऋण शोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी) के तहत ऐसा कोई वैधानिक प्रतिबंध नहीं है जो वित्तीय कर्जदाता को अपने बकाया की वसूली के लिए समानांतर कार्रवाई शुरू करने से रोकता हो।

क्या कहा गया है फैसले में?

न्यायमूर्ति दत्ता ने 47 पृष्ठ के फैसले की शुरुआत में लिखा कि न्यायाधीश को मनमाने ढंग से नए नियम बनाने का अधिकार नहीं है। न्यायमूर्ति दत्ता ने कहा- ऋणदाता द्वारा अपने कर्ज के लिए गारंटी प्राप्त करने के औचित्य को पूरी तरह से समझना उचित जान पड़ता है। आईबीसी के अंतर्गत अधिकारों से संपन्न वित्तीय ऋणदाता को इन अधिकारों का प्रयोग करने में सक्षम होना चाहिए। इसी प्रकार, निर्णय लेने वाले प्राधिकरण का यह दायित्व है कि वह आवेदन की स्वतंत्र रूप से, उसके गुणों के आधार पर जांच करे।

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इस फैसले ने भारतीय अनुबंध अधिनियम के उस मूलभूत सिद्धांत की पुष्टि की है जिसमें कहा गया है कि जमानतदार (गारंटर) का दायित्व मूल कर्जदार के दायित्व के बराबर होता है। इसमें कहा गया कि यदि किसी कर्जदाता को एक दिवाला प्रक्रिया समाप्त होने के बाद ही दूसरी शुरू करने के लिए मजबूर किया जाता है, तो गारंटी का मूल उद्देश्य ही विफल हो जाएगा। फैसले में कहा गया कि इसका मतलब यह होगा कि अंतरिम अवधि में गारंटर को ऋण चुकाने से छूट मिल जाएगी, जिसका प्रावधान आईबीसी में नहीं है।

क्यों लिया गया फैसला?

यह फैसला आईसीआईसीआई बैंक और भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) सहित प्रमुख वित्तीय संस्थानों द्वारा अलग-अलग इंफ्रास्ट्रक्चर और रियल एस्टेट कंपनियों के खिलाफ दायर अपीलों के एक समूह के बाद आया है। इसने आईसीआईसीआई बैंक और एसबीआई की उन अपीलों को स्वीकार कर लिया, जिनमें पहले गारंटरों के खिलाफ दिवाला कार्यवाही रोक दी गई थी। इसने कंपनियों के निदेशकों की उन अपीलों को खारिज कर दिया, जिनमें उन्होंने अपनी कंपनियों के खिलाफ समानांतर कार्यवाही रोकने का अनुरोध किया था।

इस फैसले में आवेदनों के मूल्यांकन पर विशेष ध्यान दिया गया। इसमें कहा गया कि निर्णय लेने वाले प्राधिकरण को प्रत्येक आवेदन की योग्यता के आधार पर जांच करनी चाहिए। इसमें यह भी कहा गया कि ऋणदाता संहिता के तहत अनुमत उपायों का उपयोग कर सकते हैं। पीठ ने कहा कि समानांतर सीआईआरपी तब तक जारी रह सकता है जब तक कि यह कानूनी रूप से मान्य हो। इस फैसले से यह स्पष्ट हो गया कि एक ही ऋण के लिए कोई वैधानिक रोक नहीं है।

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