₹1438 करोड़ के बैंक फ्रॉड में नया मोड़: जाली दस्तावेजों से लोन, निष्क्रिय कंपनियों को बेचा माल
Bank Fraud: प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा एक निजी ट्रेडिंग फर्म में कथित ₹1,438 करोड़ के बैंक फ्रॉड मामले की जांच में चौंकाने वाले खुलासे हुए हैं। जांच के दौरान पता चला है कि आरोपी कंपनी के लेनदेन के पिछले फॉरेंसिक ऑडिट में कई अनियमितताएं पहले ही उजागर हो चुकी थीं।

प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा एक निजी ट्रेडिंग फर्म में कथित ₹1,438 करोड़ के बैंक फ्रॉड मामले की जांच में चौंकाने वाले खुलासे हुए हैं। जांच के दौरान पता चला है कि आरोपी कंपनी के लेनदेन के पिछले फॉरेंसिक ऑडिट में कई अनियमितताएं पहले ही उजागर हो चुकी थीं।
फॉरेंसिक ऑडिट में क्या पाया गया?
हिन्दुस्तान टाइम्स ने ऑडिट रिपोर्ट के हवाले से बताया है कि जिस समय आरोपी कंपनी उशदेव इंटरनेशनल लिमिटेड (UIL) अपने कर्जों का भुगतान करने में चूक कर रही थी, उसी दौरान उसने यूनाइटेड किंगडम, वर्जिन आइलैंड्स और सिंगापुर में सात विदेशी संस्थाएं बनाई थीं। अधिकारियों ने बताया कि भारतीय स्टेट बैंक के नेतृत्व वाले बैंकों के एक समूह की शिकायत के अनुसार, इन विदेशी संस्थाओं ने वित्त वर्ष 2017-18 में ₹8,400 करोड़ का राजस्व अर्जित किया था। बैंकों के इसी समूह ने अप्रैल 2013 से मार्च 2018 के बीच कंपनी को ऋण सुविधाएं स्वीकृत की थीं।
ऑडिट में यह भी सामने आया कि 2017-18 के दौरान, आरोपी फर्म ने यूके स्थित तीन फर्मों को ₹421 करोड़ का माल बेचा, जबकि लेन-देन की अवधि के दौरान ये तीनों कंपनियां निष्क्रिय (डॉरमेंट) थीं।
बैंकों ने कब उठाया सवाल?
बैंकों के समूह ने 2 अक्टूबर 2016 को यूआईएल के लोन एकाउंट को एनपीए घोषित कर दिया था। इसके बाद, उन्होंने अप्रैल 2013 से मई 2018 के बीच हुए लेन-देन का उल्लिखित फॉरेंसिक ऑडिट कराया। खातों में अनियमितताएं सामने आने के बाद, नवंबर-दिसंबर 2019 में आरोपी कंपनी के ऋण खातों को धोखाधड़ीपूर्ण करार दिया गया।
ईडी और सीबीआई की जांच
ईडी की यह जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) की बैंक सुरक्षा और धोखाधड़ी सेल द्वारा जुलाई 2022 में यूआईएल, उसके दो निदेशकों और अज्ञात सरकारी अधिकारियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर पर आधारित है। ईडी ने अब तक इस मामले में ₹176.37 करोड़ की संपत्ति कुर्क की है।
कैसे हुआ कथित घोटाला?
मेटल बिजनेस में लगी यह कंपनी कथित तौर पर दिसंबर 2015 से जनवरी 2016 के बीच वित्तीय संकट से गुजर रही थी। ईडी अधिकारियों के मुताबिक, कंपनी ने एसबीआई के नेतृत्व वाले बैंक समूह से जाली व्यापारिक दस्तावेज पेश करके लोन और ऋण सुविधाएं हासिल की थीं। ये दस्तावेज ऐसे कारोबारी लेन-देन दिखाते थे, जिनके आधार पर बैंकों ने फंड जारी कर दिए, जबकि हकीकत में वे लेन-देन कभी हुए ही नहीं थे।
यूआईएल को कई तरह की सुविधाएं मिली थीं
यूआईएल को कई तरह की ऋण सुविधाएं मिली थीं, जिनमें कैश क्रेडिट, लेटर ऑफ क्रेडिट (एलसी) और बायर्स क्रेडिट शामिल थे। ईडी जांच में खुलासा हुआ कि एलसी के जरिए मिले फंड को शेल कंपनियों और आरोपियों द्वारा नियंत्रित आपूर्तिकर्ता संस्थाओं के पास भेज दिया गया, जो सिर्फ बिचौलिए का काम कर रही थीं। इसके बाद यह पैसा कई संस्थाओं के जरिए घुमाया गया और कथित तौर पर बिना किसी कॉमर्शियल औचित्य के सर्कुलर ट्रांजैक्शन के जरिए वापस समूह की कंपनियों में भेज दिया गया।
जांचकर्ताओं ने यह भी पाया कि कैश क्रेडिट फंड का एक बड़ा हिस्सा एडवांस पेमेंट के बहाने संबंधित संस्थाओं को हस्तांतरित कर दिया गया। इनमें से कई फर्म या तो निष्क्रिय थीं या वैध कारोबार में संलग्न नहीं थीं।
जांच में आगे यह भी खुलासा हुआ कि एलसी की राशि का इस्तेमाल आयात से जुड़े बायर्स क्रेडिट लोन को चुकाने के लिए किया गया, जिन्हें बाद में संबंधित विदेशी संस्थाओं को पुनः निर्यात कर दिया गया। कथित तौर पर इस निर्यात से हुई कमाई को भारत वापस नहीं लाया गया, बल्कि इसे विदेशी सहायक कंपनियों और संबंधित फर्मों में भेज दिया गया।




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