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नए लेबर कोड कर्मचारियों और कंपनियों पर 1 अप्रैल से कैसे और कितना डालेंगे असर, 10 प्वाइंट में समझें

New Labour Codes: 1 अप्रैल 2026 से चार नए लेबर कोड लागू होंगे। इसका असर करोड़ों कर्मचारियों की सैलरी से लेकर काम के घंटों तक पर देखने को मिलेगा। एम्प्लॉयर्स पर भी इसका असर पड़ेगा। आइए 10 प्वाइंट में समझें किस पर कितना होगा असर…

Tue, 31 March 2026 11:51 AMDrigraj Madheshia लाइव हिन्दुस्तान
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नए लेबर कोड कर्मचारियों और कंपनियों पर 1 अप्रैल से कैसे और कितना डालेंगे असर, 10 प्वाइंट में समझें

1 अप्रैल 2026 से चार नए लेबर कोड लागू होंगे। वेतन, सोशल सिक्योरिटी, इंडस्ट्रियल रिलेशन और ऑकुपेशनल सेफ्टी, हेल्थ एंड वर्किंग कंडीशन कोड का उद्देश्य कंप्लायंस को सरल बनाना, वर्कर वेलफेयर बढ़ाना और राज्यों में एकरूपता लाना है। आइए इसे 10 प्वाइंट्स में समझें...

1. "वेजेज" की एक समान परिभाषा :अब बेसिक सैलरी, महंगाई भत्ता और रिटेनिंग अलाउंस जेाड़कर कुल सैलरी का कम से कम 50% होना चाहिए। पीआईबी के मुताबिक नियोक्ता भर्ती, वेजेज और समान काम के लिए रोजगार शर्तों में जेंडर (ट्रांसजेंडर पहचान सहित) के आधार पर भेदभाव नहीं करेंगे।

क्या पड़ेगा प्रभाव: अधिक भत्ते वाले एम्प्लॉयर्स पर ग्रेच्युटी, लीव एनकैशमेंट, पीएफ/ईएसआई का खर्च बढ़ेगा।

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2. सोशल सिक्योरिटी कवरेज: निश्चित अवधि, गिग वर्कर्स और प्लेटफॉर्म वर्कर्स अब सामाजिक सुरक्षा योजनाओं यानी सोशल सिक्योरिटीज के दायरे में आ जाएंगे।

क्या पड़ेगा प्रभाव: योगदान दायित्व और कंप्लॉयंस की मॉनिटरिंग बढ़ेगी।

3. फिक्स्ड टर्म के कर्मचारी अब 1 साल में ग्रेच्युटी के पात्र होंगे, पहले यह पात्रता 5 साल की थी।

क्या पड़ेगा प्रभाव: कर्मचारी एम्प्लॉयर के पास टिकेंगे, लेकिन ग्रेच्युटी की लागत बढ़ जाएगी।

4. ईज ऑफ डूइंग बिजनेस: कंसोलिडेटेड कंप्लायंस, सिंगल लाइसेंस और सेंट्रलाइज्ड ऑनलाइन फाइलिंग पहले मल्टीपल रजिस्ट्रेशन को रिप्लेस करेगा।

क्या पड़ेगा प्रभाव: प्रशासनिक बोझ कम होगा और ऑडिट आसान हो जाएगा।

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5. वर्कफोर्स मैनेजमेंट होगा आसान: छंटनी, रिट्रेंचमेंट और बंदी के लिए अनुमति सीमा 100 से बढ़कर 300 वर्कर्स हो जाएगी।

क्या पड़ेगा प्रभाव: मध्यम और बड़ी कंपनियों को वर्कफोर्स मैनेज करना आसान हो जाएगा।

6. हेल्थ, सेफ्टी और वेलफेयर के सख्त मानक: सभी प्रतिष्ठानों के लिए समान OSHWC नार्मस (सुरक्षा समिति, वेलफेयर पैसिलिटी, वर्किंग ऑवर्स आदि)।

क्या पड़ेगा प्रभाव: पॉलिसी, एसओपी और सुपरवाइजरी ट्रेनिंग में बदलाव आएगा।

7. एम्प्लॉयमेंट कांट्रैक्ट और एचआर डॉक्यूमेंटेशन स्टैंड्राइज होंगे। अप्वाइंटमेंट लेटर, रजिस्टर और एचआर डॉक्यूमेंट्स स्टैंडर्ड फार्मेट में रखना जरूरी होगा।

क्या पड़ेगा प्रभाव: सभी एम्प्लॉयमेंट कांट्रैक्ट और एचआर पॉलिसियों को संशोधित करना होगा।

8. महिला वर्कर्स के लिए नाइट शिफ्ट: सेफ्टी और ट्रांसपोर्ट की शर्तों के साथ महिलाएं सभी शिफ्ट में काम कर सकती हैं।

क्या पड़ेगा प्रभाव: कंपनियों में महिलाओं की भागीदारी बढ़ेगी और नियोक्ताओं की जिम्मेदारी।

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9. अंतर्राज्यीय प्रवासी मजदूरों के लिए क्या है: आसान रजिस्ट्रेशन, यात्रा भत्ता और वेलफेयर बेनीफिट्स की सुविधा।

क्या पड़ेगा प्रभाव: मैन्युफैक्चरिंग, वेयर हाउस और लॉजिस्टिक्स यूनिट्स को रिकॉर्ड अपडेट करने होंगे।

10. डिजिटल-फर्स्ट कंप्लायंस सिस्टम: डिजिटल रजिस्टर, ऑनलाइन इंस्पेक्शन और कम फिजिकल चेकिंग।

क्या पड़ेगा प्रभाव: एचआर या कंप्लायंस टीमों को डिजिटल सिस्टम और ऑडिट ट्रेल अपनाना होगा।

क्यों पड़ी नए लेबर कोड की जरूरत

पीआईबी के मुताबिक भारत के नए लेबर को कानूनों को सरल, बेहतर और आज के कामकाजी माहौल के हिसाब से बनाते हैं। लेबर कोड को मौजूदा आर्थिक स्थिति के अनुसार ढालना, यानी काम के बदलते तरीकों, टेक्निकल डेवलपमेंट्स और आर्थिक हकीकत के हिसाब से नियमों को आधुनिक बनाना। ये मजदूरों के अधिकारों की रक्षा करते हैं, सुरक्षा और सामाजिक सुरक्षा बेहतर बनाते हैं। बिजनेस के लिए नियमों का पालन करना आसान करते हैं और रोजगार के नए मौके पैदा करते हैं।

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