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सोना, शेयर, म्यूचुअल फंड समेत हर मोर्चे पर झटका देगा कच्चा तेल, क्या है आगे की राह?

विशेषज्ञों के अनुसार, पिछले 15 सालों में भारतीय बाजार ने कई बड़े संकट और युद्ध देखे हैं। हर बार बाजार इन संकट से बाहर निकलने में कामयाब रहा। कोविड संकट के दौरान भारी गिरावट देखने वाले भारतीय बाजारों ने अगले कुछ वर्षों में लगभग 21-22% तक मुनाफा दिया था।

Mon, 16 March 2026 05:55 AMDrigraj Madheshia मिंट
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सोना, शेयर, म्यूचुअल फंड समेत हर मोर्चे पर झटका देगा कच्चा तेल, क्या है आगे की राह?

पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव से निवेशकों को हर मोर्चे पर बुरी तरह झटका लगा है। विश्लेषकों का कहना है कि ऐसा पहली बार देखने को मिल रहा है, जब सभी निवेश विकल्पों (एसेट क्लास) में एक साथ गिरावट आई है। इसका प्रमुख कारण कच्चे तेल के बेतहाशा चढ़ते दाम हैं। यदि कच्चा तेल 150 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचा तो निवेशकों का जोखिम और बढ़ सकता है।

मध्य-पूर्व में जंग शुरू होने के बाद से कच्चे तेल के दाम चार साल के उच्च स्तर पर पहुंच गए हैं। संघर्ष शुरू होने के समय यह 72.48 डॉलर प्रति बैरल था, जो नौ मार्च को 65 फीसदी उछलकर 119.40 डॉलर पहुंच गया था। हालांकि, बाद में कीमतों में कुछ गिरावट आई लेकिन यह एक बार फिर 100 डॉलर के पार निकल गया है।

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि होर्मुज जलमार्ग पर आपूर्ति चार से आठ सप्ताह तक बाधित रहती है तो तेल की कीमत 110 से 150 डॉलर प्रति बैरल तक जा सकती है। ऐसी स्थिति में भारत जैसे तेल आयातक देश के लिए शेयर बाजार में भारी गिरावट जारी रहने और महंगाई उछलने का दोहरा संकट खड़ा हो सकता है।

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निवेश जोखिम बढ़ा : मध्य-पूर्व और अन्य क्षेत्रों में बढ़े संघर्ष ने कई वित्तीय निवेश विकल्पों में उतार-चढ़ाव बढ़ा दिया है, जिससे भारतीय निवेशकों को तेज झटका लग रहा है। बाजार विशेषज्ञों के मुताबिक इक्विटी शेयर, म्यूचुअल फंड, कच्चे तेल से जुड़े क्षेत्र, मुद्रा बाजार, बॉन्ड और कुछ कमोडिटी में युद्ध की वजह से जोखिम काफी अधिक बढ़ गया है। सबसे बड़ा असर शेयर बाजार पर देखने को मिल रहा है। जब भी वैश्विक स्तर पर युद्ध या तनाव बढ़ता है तो निवेशक जोखिम से बचने के लिए सुरक्षित निवेश विकल्पों की ओर रुख करते हैं।

इसके कारण शेयर बाजार में बिकवाली बढ़ जाती है। आंकड़ों के अनुसार, इस महीने विदेशी संस्थागत निवेशक (एफपीआई) भारतीय बाजार में करीब 52,704करोड़ रुपये की बिकवाली कर चुके हैं। उभरते बाजारों की तुलना में भारत से कमजोर रिटर्न की वजह से भी एफपीआई की दिलचस्पी कम हुई है।

हर बड़े झटके से उबरे

विशेषज्ञों के अनुसार, पिछले 15 सालों में भारतीय बाजार ने कई बड़े संकट और युद्ध देखे हैं। हर बार बाजार इन संकट से बाहर निकलने में कामयाब रहा। कोविड संकट के दौरान भारी गिरावट देखने वाले भारतीय बाजारों ने अगले कुछ वर्षों में लगभग 21-22% तक मुनाफा दिया था।

सोना-चांदी

पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने के बावजूद सोने-चांदी की कीमतें गिर गई हैं। फरवरी के आखिर से अब तक सोना करीब छह फीसदी और चांदी नौ फीसदी तक टूट चुकी है। इसका प्रमुख कारण डॉलर में आई मजबूती है। कच्चे तेल का कारोबार ज्यादातर डॉलर में होता है, इसलिए इसके दाम उछलने से डॉलर की मांग बढ़ जाती है। जब डॉलर मजबूत होता है तो सोने पर दबाव बढ़ता है।

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आगे की संभावना: फिलहाल बाजार का पैसा डॉलर, बॉन्ड और तेल से जुड़े निवेश विकल्प में ज्यादा जा रहा है। हालात बिगड़ने पर सोने-चांदी में तेज उतार-चढ़ाव आ सकता है।

शेयर बाजार

मार्च में अब तक घरेलू बाजार आठ फीसदी तक लुढ़क गए हैं। पिछले हफ्ते पांच फीसदी से अधिक की गिरावट आई थी। कई सालों बाद किसी एक हफ्ते में बाजार इतना गिरा है। इससे पहले 2020 में कोविड की शुरुआत में तेज गिरावट आई थी। विशेष रूप से ऑटो, बैंकिंग, मेटल और कंज्यूमर सेक्टर के शेयरों पर ज्यादा बिकवाली हुई है।

आगे की संभावना: यदि होर्मुज जलमार्ग अगले 10 दिनों तक बंद रहता है, तो कच्चा तेल 150 डॉलर तक पहुंच सकता है। ऐसी स्थिति में भारत समेत वैश्विक शेयर बाजारों में करीब 10% से ज्यादा की गिरावट आ सकती है।

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म्यूचुअल फंड पर भी दिख रहा असर

म्यूचुअल फंड पर भी असर दिख रहा है। आंकड़ों के मुताबिक, फरवरी में करीब 65.7 लाख नए एसआईपी खाते खुले, लेकिन लगभग 49.7 लाख बंद भी हो गए। इससे एसआईपी स्टॉपेज अनुपात बढ़कर करीब 76% तक पहुंच गया है।

आगे की संभावना: इक्विटी फंड में तेज उतार-चढ़ाव के कारण निवेशकों के पोर्टफोलियो का निवेश घट सकता है।

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