इस सरकारी बैंक पर लगा 5 साल का प्रतिबंध का फैसला वापस, जानिए क्या है मामला
मध्य प्रदेश सरकार ने सरकारी बैंक बैंक ऑफ बड़ौदा पर लगाया गया 5 साल का प्रतिबंध महज 24 घंटे के भीतर वापस ले लिया है। यह फैसला अचानक लिया गया, जिससे वित्तीय हलकों में हलचल मच गई।

मध्य प्रदेश सरकार ने सरकारी बैंक बैंक ऑफ बड़ौदा पर लगाया गया 5 साल का प्रतिबंध महज 24 घंटे के भीतर वापस ले लिया है। यह फैसला अचानक लिया गया, जिससे वित्तीय हलकों में हलचल मच गई। पहले जारी आदेश में बैंक को राज्य सरकार से जुड़े सभी वित्तीय लेन-देन से बाहर कर दिया गया था, लेकिन अगले ही दिन सरकार ने अपना रुख बदल दिया।
दरअसल, 27 मार्च को मध्य प्रदेश सरकार के इंस्टीट्यूशनल फाइनेंस कमिश्नर की ओर से एक आदेश जारी किया गया था। इसमें आरोप लगाया गया कि मुख्यमंत्री किसान योजना के तहत फंड मैनेजमेंट में बैंक ने गंभीर लापरवाही की। सरकारी दस्तावेज के मुताबिक करीब ₹1,751 करोड़ की राशि एक विशेष ट्रेजरी हेड में जमा की जानी थी, लेकिन बैंक इस निर्देश का पालन नहीं कर पाया।
क्या है डिटेल
सरकार का कहना था कि इस चूक की वजह से राज्य को वित्तीय और प्रशासनिक नुकसान हुआ। इसी आधार पर बैंक ऑफ बड़ौदा को 5 साल के लिए किसी भी सरकारी कामकाज—जैसे भुगतान, फंड ट्रांसफर और अन्य वित्तीय सेवाओं—से दूर रखने का फैसला लिया गया। यह आदेश सभी विभागों, सरकारी संस्थाओं और वित्तीय एजेंसियों को लागू करने के लिए भेज दिया गया था।
हालांकि, मामला ज्यादा देर तक नहीं चला। 28 मार्च को सरकार ने एक नया आदेश जारी कर पहले वाले फैसले को तत्काल प्रभाव से रद्द कर दिया। नई चिट्ठी में कहा गया कि बैंक की ओर से दिए गए स्पष्टीकरण (representation) पर विचार करने के बाद यह निर्णय लिया गया है। यानी बैंक को एक तरह से राहत मिल गई और उस पर लगा प्रतिबंध खत्म हो गया।
प्रशासनिक फैसलों की प्रक्रिया पर भी सवाल
CNBC TV 18 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, माना जा रहा है कि बैंक ने अपनी सफाई में तकनीकी या प्रक्रियागत कारण बताए होंगे, जिसके बाद सरकार ने सख्त रुख नरम कर लिया। हालांकि अब तक बैंक की ओर से इस पूरे मामले पर कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है, जिससे कई सवाल अभी भी बाकी हैं।
बता दें कि बैंक ऑफ बड़ौदा देश के बड़े सरकारी बैंकों में शामिल है और कई राज्यों में सरकारी योजनाओं और भुगतान से जुड़ा अहम काम संभालता है। ऐसे में इतने बड़े फैसले का अचानक आना और फिर उतनी ही तेजी से वापस होना प्रशासनिक फैसलों की प्रक्रिया पर भी सवाल खड़े करता है।




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