सैलरी सिस्टम में 5 बड़े बदलाव: 50% बेसिक पे जरूरी, खत्म होगा 6 दशक साल पुराना नियम
Changes in Payroll System: वेतन संहिता के तहत, अब मूल वेतन (महंगाई भत्ते सहित) किसी कर्मचारी के कुल सीटीसी का कम से कम 50% होना अनिवार्य है। 1 अप्रैल 2026 से, भारत में लगभग छह दशक पुराना आयकर अधिनियम 1961 अब इतिहास बन जाएगा। जानें और क्या बदलेगा…

नवंबर 2025 से लागू हुए चार राष्ट्रीय श्रम संहिताएं (लेबर कोड) और 1 अप्रैल 2026 से प्रभावी होने वाला आयकर अधिनियम 2025, हर बिजनेस के लिए अलर्ट मोड में आने का संकेत है। न्यूज एजेंसी एएनआई ने पेस्क्वेयर कंसल्टेंसी लिमिटेड के हवाले से बताया है कि अगर समय रहते इन नियमों को नहीं अपनाया गया, तो भारी जुर्माने और कानूनी पचड़ों का सामना करना पड़ सकता है।
सभी चार राष्ट्रीय श्रम संहिताएं (वेतन संहिता, सामाजिक सुरक्षा संहिता, औद्योगिक संबंध संहिता, और व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और काम करने की स्थिति संहिता) नवंबर 2025 से लागू हो चुकी हैं। इसके साथ ही, आयकर अधिनियम 2025 1 अप्रैल 2026 से प्रभावी हो रहा है, जो इसे दशकों का सबसे बड़ा पेरोल रिफार्म साइकिल बनाता है। एचआर लीडर्स, सीएफओ और पेरोल प्रोफेशनल्स के लिए तैयारी का समय अभी है।
2026 के लिए पेरोल और अनुपालन में पांच बड़े बदलाव
पहला बदलाव: 50% मूल वेतन का नियम
वेतन संहिता के तहत, अब मूल वेतन (महंगाई भत्ते सहित) किसी कर्मचारी के कुल सीटीसी का कम से कम 50% होना अनिवार्य है। इसके दूरगामी परिणाम देखने को मिलेंगे। पीएफ अंशदान बढ़ेगा, क्योंकि ईपीएफ की गणना अब इसी संशोधित वेतन पर होगी। ईएसआई की पात्रता सीमा में बदलाव से अधिक कर्मचारी इसके दायरे में आएंगे। ग्रेच्युटी और ओवरटाइम का खर्च भी बढ़ेगा, जो अब इस उच्च वेतन सीमा से जुड़ जाएगा। साथ ही, लीव एनकैशमेंट की राशि भी अधिक होगी, जिससे कर्मचारियों पर कुल खर्च बढ़ना तय है। जो कंपनियां अभी भी अधिक भत्ते और कम मूल वेतन वाली संरचना पर निर्भर हैं, उन्हें तुरंत अपने वेतन ढांचे की समीक्षा और पुनर्गठन करना होगा।
दूसरा बदलाव: नया आयकर अधिनियम 2025
1 अप्रैल 2026 से, भारत में लगभग छह दशक पुराना आयकर अधिनियम 1961 अब इतिहास बन जाएगा और उसकी जगह नया आयकर अधिनियम 2025 ले लेगा। इसके कई अहम निहितार्थ हैं। सबसे पहले, सभी पेरोल सिस्टम को नए आयकर नियमों और फॉर्म्स के अनुकूल बनाना होगा। टीडीएस कैलकुलेशन के तरीके और रिपोर्टिंग फॉर्मेट को नए सिरे से तैयार करना पड़ेगा। फॉर्म 24क्यू और फॉर्म 16 को अब नए प्रारूप में ही जेनरेट करना होगा। ऑडिट में अधिक सख्ती बरती जाएगी, इसलिए पेरोल डेटा का और ट्रेसेबल होना अनिवार्य हो गया है।
तीसरा बदलाव: पूर्ण और अंतिम निपटान सिर्फ 2 दिनों में
नए वेतन संहिता के नियमों के मुताबिक, किसी कर्मचारी के अलग होने पर सभी बकाया वेतन का भुगतान महज दो वर्किंग डेज के भीतर करना अनिवार्य हो गया है। यह नियम खासतौर पर अलगाव के समय देय अंतिम वेतन पर लागू होता है। हालांकि, ग्रेच्युटी, लीव एनकैशमेंट और रीइंबर्समेंट जैसे अन्य घटकों का भुगतान जितनी जल्दी हो सके, करना होगा। इस नियम ने पेरोल रिकंसिलिएशन को रियल टाइम में करना और एफएंडएफ प्रक्रियाओं को एचआरएमएस सिस्टम से पूरी तरह जोड़ना जरूरी बना दिया है।
चौथा बदलाव: डिजिटल रिकॉर्ड रखना अनिवार्य
अब नियोक्ताओं के लिए कर्मचारियों से जुड़े सभी रिकॉर्ड - जैसे वेतन, उपस्थिति, पीएफ/ईएसआई/एलडब्ल्यूएफ योगदान, पेस्लिप और स्टेट्यूटरी रजिस्टर को पूरी तरह डिजिटल रूप में रखना अनिवार्य हो गया है। नियामक अधिकारी अब रियल टाइम में डिजिटल निरीक्षण कर सकते हैं। अगर इन नियमों का पालन नहीं किया गया, तो 3 लाख रुपये तक का जुर्माना और बार-बार उल्लंघन पर जेल की सजा का प्रावधान है।
पांचवां बदलाव: निश्चित अवधि के रोजगार और सामाजिक सुरक्षा
नियमों के तहत अब निश्चित अवधि (फिक्स्ड टर्म) के कर्मचारी भी अपने कार्यकाल के अनुपात में सभी वैधानिक लाभों के हकदार होंगे। सबसे बड़ा बदलाव यह है कि अब सिर्फ एक साल की सेवा के बाद ही वे ग्रेच्युटी के पात्र हो जाएंगे, जबकि पहले इसके लिए पांच साल का नियम था। प्रोजेक्ट बेस या सीजनल वर्कफोर्स रखने वाली कंपनियों को अपनी देनदारियों का फिर से आकलन करना होगा।
पेस्क्वेयर की टीम का कहना है, "अधिकतर नेता किसी सेवा की लागत पर ध्यान देते हैं, लेकिन सच्चे दूरदर्शी वे होते हैं जो गलती की लागत पर ध्यान देते हैं। 2026 में यह गणित पूरी तरह बदल गया है। अनुपालन में चूक का वित्तीय और प्रतिष्ठात्मक बोझ अब इतना भारी हो गया है कि 'खुद से करना' अब सबसे महंगा विकल्प बन गया है।"




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