नीतीश का 'मार्च' से खास रिश्ता, पटना से दिल्ली तक बिहार सीएम का सियासी सफर ऐसा रहा
नीतीश कुमार जन्म नालंदा के हरनौत के कल्याण बिगहा में 1 मार्च 1951 को हुआ। 3 मार्च 2005 को वे पहली बार सीएम बने थे। 5 मार्च को उन्होंने राज्यसभा जाने का फैसला सुनाया।

Nitish Kumar Political Journey: पिछले दो दशक से बिहार की राजनीति में द मोस्ट इंपॉर्टेंट रहे नीतीश कुमार का मार्च से खास नाता है। उन्होंने एक मार्च को ही अपना 75वां बसंत पूरा किया और अगले चार दिन बाद 5 मार्च को मुख्यमंत्री का पद छोड़ राज्यसभा जाने का फैसला लेकर सबको चौंका दिया। नीतीश कुमार मार्च महीने की तीसरी तारीख को 2005 में पहली बार सीएम बने थे। बेहद सामान्य परिवार से आने वाले नीतीश कुमार ने अपनी सृजनशीलता और राज्य का कायाकल्प कर बिहार की राजनीति में एक बड़ा कद कमाया। इसके लिए उन्होंने अथक श्रम और संघर्षों का सामना किया।
उनका जन्म नालंदा के हरनौत के कल्याण बिगहा में एक मार्च 1951 को हुआ। उनके पिता कविराज रामलखन सिंह प्रख्यात स्वतंत्रता सेनानी थे और काफी लोकप्रिय थे। नीतीश कुमार ने 1972 में बिहार कालेज ऑफ इंजीनियरिंग से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में डिग्री ली। उन्होंने अपना कैरियर बिहार बिजली बोर्ड में एक अभियंता के रूप में शुरू किया, लेकिन बिहार की राजनीति उन्हें पुकारने लगी। तब तक बिहार में जेपी का आंदलन शुरू हो चुका था। लिहाजा, 1974 में नीतीश कुमार जेपी के संपूर्ण क्रांति आंदोलन से जुड़ गए। उस समय के महान समाजसेवी एवं राजनेता सत्येन्द्र नारायण सिन्हा के काफी करीबी रहे थे। इसके पहले 1973 में नीतीश का विवाह मंजू कुमारी सिन्हा से हुआ था। मंजू कुमारी पटना में एक स्कूल में अध्यापिका थीं। उनका एक बेटा निशांत हैं, जो बीआईटी मेसरा से इंजीनियरिंग में स्नातक हैं। नीतीश कुमार का उपनाम मुन्ना है।
पहला चुनाव हार गए
इसके बाद साथियों के अनुरोध पर 1977 में विधानसभा का चुनाव लड़ा, लेकिन हार गए। फिर 1980 में भी उन्हें हार का सामना करना पड़ा। तीसरे प्रयास में 1985 में चुनाव जीतकर वे पहली बार विधायक बने। 1987 में युवा लोकदल के अध्यक्ष और 1989 में जनता दल के सचिव बने। वर्ष 1990 में बिहार में लालू प्रसाद के अभ्युदय में नीतीश कुमार का सबसे बड़ा योगदान था। उनके प्रयासों से लालू प्रसाद बिहार के मुख्यमंत्री बने और नीतीश उनके सबसे बड़े सिपहसलार, लेकिन धीरे-धीरे उनके बीच दूरी बढ़ने लगी। फिर 1994 में नीतीश कुमार का रास्ता अलग हो गया। फिर उन्होंने बिहार में लालू प्रसाद के खिलाफ ही राजनीतिक अभियान का नेतृत्व किया। जार्ज फर्नांडिस के साथ मिलकर समता पार्टी बनाई और भाजपा के साथ गठबंधन किया।
17 मई 2014 को उन्होंने लोकसभा चुनाव 2014 में अपने पार्टी के खराब प्रदर्शन की जिम्मेदारी लेते हुए मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था और उसके बाद 68 वर्षीय जीतन राम मांझी ने बिहार के 23वें मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी। नीतीश कुमार ने ही मुख्यमंत्री के रूप में जीतन राम मांझी के नाम की पेशकश की थी। हालांकि, उन्होंने बिहार में राजनीतिक संकट के चलते फरवरी 2015 में फिर से मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाली। नवंबर 2015 का बिहार विधानसभा चुनाव जीता।
वर्ष 2000 में पहली बार सीएम बने
वर्ष 2000 में वे बिहार के मुख्यमंत्री बने लेकिन उन्हें सिर्फ सात दिनों में त्यागपत्र देना पड़ा। 324 सदस्यीय सदन में एनडीए और सहयोगी दलों के पास 151 विधायक थे, जबकि लालू प्रसाद के 159 विधायक थे। दोनों गठबंधन 163 के बहुमत के आंकड़े से कम थे। नीतीश कुमार ने सदन में अपनी संख्या साबित करने से पहले ही इस्तीफा दे दिया। फिर वे वर्ष 2000 में ही वे फिर से केन्द्रीय मंत्रिमंडल में कृषि मंत्री बने। मई 2001 से 2004 तक वे वाजपेयी सरकार में केन्द्रीय रेलमंत्री रहे। 2004 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने नालंदा लोकसभा सीट से जीत हासिल की। नवंबर 2005 में राष्ट्रीय जनता दल की बिहार में 15 साल पुरानी सत्ता को उखाड़ फेंकने में सफल हुए और मुख्यमंत्री के रूप में उनकी ताजपोशी हुई। वर्ष 2010 में उनके नेतृत्व में एनडीए को ऐतिहासिक जीत मिली। नीतीश जिधर रहे, जीत उधर ही रही। 2015, 2020 और 2025 विधानसभा चुनाव परिणामों ने इस उक्ति पर मुहर लगा दी।
मुख्यमंत्री के रूप में नीतीश कुमार का कार्यकाल
3 मार्च, 2000 से 10 मार्च 2000
24 नवंबर, 2005 से 25 नवंबर 2010
26 नवंबर, 2010 से 19 मई 2014
22 फरवरी, 2015 से 19 नवंबर 2015
20 नवंबर, 2015 से 26 जुलाई, 2017
27 जुलाई, 2017 से 12 नवंबर 2020
16 नवंबर, 2020 से 9 अगस्त 2022
10 अगस्त, 2022 से 28 जनवरी, 2024
28 जनवरी, 2024 से 19 नवंबर, 2025
20 नवंबर 2025 से अबतक।
नीतीश कुमार की सियासी पारी
● 1977: जनता पार्टी की टिकट पर हरनौत से पहली बार विधानसभा का चुनाव लड़े, हार गए
● 1980: हरनौत से ही दूसरी बार विधानसभा का चुनाव लड़े, हार गए
● 1985: हरनौत से विधानसभा का चुनाव जीते, पहली बार विधायक बने
● 1987: युवा लोकदल के अध्यक्ष बने
● 1989: जनता दल के महासचिव बने
● 1989: बाढ़ से लोकसभा सांसद बने, पहली बार सांसद बने
● 1990: केन्द्र में कृषि व सहकारिता राज्यमंत्री बने
● 1991: लोकसभा के लिए चुने गए, दूसरी बार सांसद बने
● 1991: संसद में जनता दल के उपनेता बने
● 1996: लोस का चुनाव जीता
● 1998: रेल मंत्री बने (सड़क परिवहन का अतिरिक्त प्रभार)
● 1999: सांसद बने, 5वीं बार जीता
● 1999: सड़क परविहन मंत्री बने
● 1999: कृषि मंत्री बने
● 2000: बिहार के 29वें सीएम बने
● 2001: कृषि मंत्री बने
● 2001: रेल मंत्री बने
● 2004: नालंदा से सांसद बने, छठी बार सांसद बने
● 2005: बिहार के मुख्यमंत्री बने
● 2016: जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने
● 2023: जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने
● 2024: मुख्यमंत्री पद की शपथ ली
● 2025: मुख्यमंत्री पद की शपथ ली
जदयू के गठन के 12 वर्ष बाद बने राष्ट्रीय अध्यक्ष
नीतीश कुमार पहली बार 10 अप्रैल 2016 को शरद यादव के स्थान पर जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने थे। पार्टी का गठन अक्टूबर, 2003 में हुआ था। इस तरह पार्टी के गठन के 12 वर्षों से भी अधिक समय के बाद वह इसके अध्यक्ष बने थे। पार्टी के गठन से लेकर नीतीश कुमार के अध्यक्ष बनने तक शरद यादव इस पद पर थे। 30 अक्टूबर 2019 को नीतीश कुमार दूसरी बार पार्टी के अध्यक्ष बने और 27 दिसंबर 2020 तक इस पद पर रहे। 27 दिसंबर 2020 से 31 जुलाई, 2021 तक आरसीपी सिंह पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे। केंद्र में मंत्री बनने के बाद आरसीपी सिंह जदयू का अध्यक्ष का पद छोड़ दिया। इसके बाद ललन सिंह जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने। वह दोबारा 10 दिसंबर, 2022 को पार्टी अध्यक्ष बने थे। 29 दिसंबर, 2023 को फिर नीतीश कुमार ललन सिंह की जगह जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने।
1985 में पहली बार विधायक बने
वे पहली बार 1985 में विधायक बने। 1987 में वे युवा लोकदल के अध्यक्ष बने। 1989 में उन्हें बिहार में जनता दल का सचिव चुना गया और उसी वर्ष वे नौवीं लोकसभा के सदस्य भी चुने गए थे। 1990 में वे पहली बार केन्द्रीय मंत्रिमंडल में बतौर कृषि राज्यमंत्री शामिल हुए। 1991 में वे एक बार फिर लोकसभा के लिए चुने गए और उन्हें इस बार जनता दल का राष्ट्रीय सचिव चुना गया तथा संसद में वे जनता दल के उपनेता भी बने। 1989 और 2000 में उन्होंने बाढ़ लोकसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया। 1998-1999 में कुछ समय के लिए वे केन्द्रीय रेल एवं भूतल परिवहन मंत्री भी रहे और अगस्त 1999 में गैसल में हुई रेल दुर्घटना के बाद उन्होंने मंत्रीपद से इस्तीफा दे दिया।




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