अफसरों से लेकर जनप्रतिनिधियों के काफिले में नहीं कम हुए वाहन
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नागरिकों से वाहनों के कम उपयोग और डीजल-पेट्रोल की खपत में कमी की अपील की है। लेकिन अधिकारी और नेता अपनी बड़ी गाड़ियों के साथ चल रहे हैं, जिससे आम जनता में नाराजगी है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि नेता सादगी अपनाएं, तो जनता भी अनुसरण करेगी।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में देशवासियों से अपील की है कि वे वाहनों का कम से कम प्रयोग करें और डीजल-पेट्रोल की खपत में कटौती करें। उनका उद्देश्य न केवल देश की अर्थव्यवस्था को मजबूती देना था, बल्कि पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक बड़ा कदम बढ़ाना भी था। लेकिन, यह नसीहत केवल उन आम नागरिकों के लिए ही बन कर रह गयी है, जो पहले से ही महंगाई की मार झेल रहे हैं। आपके अपने अखबार हिन्दुस्तान द्वारा की गई पड़ताल में जो तस्वीरें सामने आईं, वे सत्ता और व्यवस्था के दोहरे चरित्र को उजागर करती हैं।
सत्ताधारी नेताओं की वाहनों की संस्कृति
अफसरों से लेकर जनप्रतिनिधियों के काफिले में वाहनों की संख्या कम नहीं हुई है। सांसद और डीएम-एसपी के साथ पहले की तरह ही स्कॉट वाहन चल रहे हैं। बुधवार को जिला कलेक्ट्रेट में जिला अनुश्रवण समिति की महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई थी। बैठक का मुख्य एजेंडा विकास कार्यों की समीक्षा करना था, लेकिन बैठक से पहले कलेक्ट्रेट परिसर का नजारा कुछ और ही कहानी बयां कर रहा था। सत्ताधारी दलों के दिग्गज नेता जब अपनी चमचमाती एसयूवी और गाड़ियों के लंबे काफिले के साथ पहुंचे, तो ऐसा लगा मानो बचत की अपील हवा-हवाई बन कर रह गई है। हैरानी की बात यह रही कि कोई भी नेता कार-पूलिंग या शेयरिंग की बचत भरी व्यवस्था पर अमल करते नहीं दिखे। अधिकारियों का लाव-लश्कर भी चल रहा सरकारी तेल पर नेताओं से अलग, जिले के आला अधिकारियों का रवैया भी पीएम की सलाह की अनदेखी वाला ही दिखा। बैठक में शामिल होने आए अधिकारियों के साथ उनके सुरक्षा गार्ड और एस्कॉर्ट गाड़ियों का पूरा दस्ता मौजूद था। सुरक्षा के नाम पर गाड़ियों की कतार अब भी दिख रही है। कुल मिला कर पूर्व में जो व्यवस्था थी, वही वर्तमान में भी दिख रही है। इसमें कोई भी बदलाव नहीं दिख रहा है।
जनता की नाराजगी
पड़ताल के दौरान जब आम लोगों से इस बारे में बात की गई, तो जनता में स्पष्ट रूप से नाराजगी और उदासीनता देखी गई। बीमाकर्मी निशांत कुमार ने कहा कि जब वे देखते हैं कि सत्ताधरी नेता और अधिकारी बड़ी-बड़ी गाड़ियों में सड़कों पर घूम रहे हैं, तो वे खुद को त्याग करने के लिए प्रेरित महसूस नहीं करते। एक तरफ पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतें मध्यम वर्ग की कमर तोड़ रही हैं, वहीं दूसरी तरफ वीआईपी संस्कृति इस संकट को नजरअंदाज कर रही है। इधर, रेलवे कर्मी आलोक कुमार ने कहा कि यदि सरकार वाहन कम करने की बात करती है, तो उसे सार्वजनिक परिवहन को इतना सुदृढ़ करना चाहिए कि लोग निजी वाहनों को छोड़ सकें। पर्यावरण और अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा भारी बोझ
विशेषज्ञों की राय
विशेषज्ञ शिक्षाविद वीरेन्द्र कुमार का मानना है कि भारत अपनी जरूरत का लगभग 85% कच्चा तेल आयात करता है। यदि प्रधानमंत्री की अपील पर अमल करते हुए ईंधन की खपत में 10% की भी कमी आती है, तो देश के विदेशी मुद्रा भंडार पर पड़ने वाले बोझ को काफी कम किया जा सकता है। इसके अलावा, सड़कों पर बढ़ते वाहनों का काफिला वायु प्रदूषण और ट्रैफिक जाम की समस्या को और भयावह बना रहा है। भूगोलवेत्ता प्रो.अनुज कुमार कहते हैं कि बदलाव ऊपर से नीचे की ओर आता है। यदि नेता और प्रशासनिक अधिकारी अपनी जीवनशैली में सादगी अपनाएं और छोटे कार्यक्रमों में कम से कम गाड़ियों का उपयोग करें, तो जनता स्वतः ही इसका अनुसरण करेगी। छोड़नी होगी दिखावे की संस्कृति प्रधानमंत्री की सलाह निस्संदेह राष्ट्रहित में है, लेकिन इसे सफल बनाने की जिम्मेदारी केवल आम जनता के कंधों पर नहीं डाली जा सकती। यह बातें करते हुए सामाजिक कार्यकर्ता सुधीर सिंह कहते हैं कि नेता और अधिकारियों द्वारा अब भी पूर्व की तरह ही वाहनों का उपयोग जारी है, जिससे यह साफ है कि सादा जीवन और उच्च विचार के नारे अब केवल भाषणों तक सीमित हैं। अगर हम वास्तव में भविष्य की पीढ़ियों के लिए एक स्वच्छ पर्यावरण और मजबूत अर्थव्यवस्था चाहते हैं, तो इसकी शुरुआत व्यवस्था के अभिन्न अंगों को ही करनी होगी। अन्यथा व्यवस्था से जुड़े लोगों ने खुद को उदाहरण के रूप में पेश नहीं किया तो जनता के लिए ऐसी अपीलें केवल एक राजनीतिक जुमला बनकर रह जाएंगी। (नवादा से राजेश मंझवेकर)
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